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काला रजिस्टर

Bhola Tiwari May 30, 2019, 6:45 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

कभी धर्मवीर भारती ने गुनाहों का देवता लिखा था । खुद धर्मवीर भारती इसे एक अपरिपक्व उपन्यास मानते रहे , पर उन दिनों यह उपन्यास पांच सबसे ज्यादा विकने वाले साहित्य में एक अहम स्थान रखता था । धर्मवीर भारती कवि , कहानीकार , उपन्यासकार , काव्य नाटक और रिपोर्ताज लेखक थे । साहित्य के हर विधा पर उनकी लेखनी अबाध गति से दौड़ती रही । आम तौर पर ऐसे हरफन मौला लोग किसी एक विधा में भी माहिर नहीं होते । उन पर Jack of all and master of none की कहावत चरितार्थ होती है । किंतु धर्मवीर भारती हर विधा में माहिर थे । उन्होंने सूरज का सातवां घोड़ा (उपन्यास ) , अंधायुग ( काव्य नाटक ) , बंद गली का आखिरी मकान (कहानी संग्रह ) , कनुप्रिया ( काव्य संकलन ) , ठेले पर हिमालय ( गद्य संकलन ) और नदी प्यासी थी ( नाटक ) लिखा और साहित्य की हर विधा को अपना सर्वोत्तम दिया ।

धर्मवीर भारती एक बहुत अच्छे सम्पादक भी थे । उन्होंने धर्मयुग को कुछ हजारों से लाखों तक पहुंचाया । उन दिनों  

इस पत्रिका में क्या नहीं छपता था ? धर्म , राजनीति , साहित्य , कला और फिल्म सब कुछ । धर्मवीर भारती ने अपने काल में बहुत से नये लेखकों को गढ़ा । उन्हें मांज धो के चमकाया । उन्हें इस कबिल बनाया कि वे सिर उठाकर कह सकें कि वे भी लेखकों की जमात में शामिल हैं । धर्मयुग में धारावाहिक उपन्यास भी छपते थे ।शिवानी की "नदी और सीपियां "और भीष्म साहनी की "कड़ियां " भी धर्मयुग में धारावाहिक छपे थे । इन दोनों उपन्यासों के छपने से धर्मयुग की बिक्री बहुत बढ़ गयी । साथ हीं इन दोनों लेखकों को भी बहुत प्रचार प्रसार मिला था ।

धर्मयुग में खेल जगत , बैठे ठाले व कार्टून कोना ढब्बूजी आदि स्थायी काॅलम होते थे । आबिद सुरती कहानी , व्यंग्य , उपन्यास आदि सभी साहित्यिक विधाओं पर हाथ आजमा चुके थे , पर उन्हें स्थापित किया तो " कार्टून कोना ढब्बू जी " ने । इसमें धर्मवीर भारती का हाथ सबसे ज्यादा है । धर्मवीर भारती ने हीं उन्हें कार्टून बनाने के लिए प्रेरित किया था । जब कोई धर्मयुग खरीदता था तो उसे पीछे से पलटना शुरू करता था ताकि वह सबसे पहले कार्टून कोना ढब्बू जी पढ़ सके । धर्मवीर भारती को जब लगता था कि किसी शहर विशेष में धर्मयुग की विक्री कम होने लगी है तो वह उस शहर विशेष पर विशेषांक या कोई लेख निकलवा देते थे । विक्री पुन: उस शहर में यथावत पहुंच जाती या बढ़ जाती थी ।

धर्मयुग को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले धर्मवीर भारती की गणना एक तानाशाह सम्पादक के रूप में होती थी । जिस भवन में धर्मयुग का दफ्तर था , उसी भवन में अंग्रेजी पत्रिका Illustrated weekly का भी दफ्तर था । उस दौर में इस पत्रिका के सम्पादक खुशवंत सिंह थे । जिस दिन धर्मयुग के दफ्तर से जोर जोर से बोलने और हंसने की आवाजें आती थीं तो खुशवंत सिंह समझ जाते थे कि आज धर्मवीर भारती अपने दफ्तर में नहीं हैं । धर्मवीर भारती पर आरोप था कि वे अपने स्टाफ से घुलते मिलते नहीं हैं । वे हर पल अपने केबिन में बैठे बैठे दरवाजे की एक सूराख से स्टाफ पर नजर रखते थे । किसी के काम में कहीं जरा भी ढिलाई नजर आती उसे एक मेमो मिल जाता । वह मेमो एक काले रजिस्टर के मार्फत स्टाफ को दिया जाता , जिसमें मेमो पाने वाले को हस्ताक्षर करने पड़ते । जब काला रजिस्टर कार्यालय में आता तो सभी को सांप सूंघ जाता । जाने किसकी आज जिबह होगी ? का प्रश्न हर किसी के दिमाग में कौंध जाता । धर्मवीर भारती से मिलने के लिए केबिन में पर्ची भेजनी पड़ती । बुलाने पर हीं कोई केबिन में जा सकता था । 

रवीन्द्र कालिया को धर्मयुग में भेजने वाले उनके गुरू मोहन राकेश थे । रवीन्द्र कालिया उन दिनों सरकारी नौकरी में थे । सरकारी नौकरी छोड़कर उन्हें धर्मयुग में नौकरी करने आना पड़ा । दरअसल धर्मवीर भारती ने रवींद्र कालिया की कुछेक हिंदी कहानियां पढ़ीं थीं । उनसे प्रभावित होकर उन्होंने रवींद्र को मोहन राकेश के मार्फत् धर्मयुग के लिए बुलवाया था । रवींद्र कालिया को धर्मवीर भारती का यह तानाशाही पूर्ण रवैया पसंद नहीं आया । वे कुछ वर्षों तक नौकरी करने के बाद धर्मयुग को बाॅय बाॅय कह दिया । अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ने का रवींद्र कालिया को अब मलाल होने लगा था । उन्होंने पिता से कुछ आर्थिक मदद लेकर इलाहाबाद में एक छापाखाना खोला । कम हीं सही पर इसी आमदनी से उनकी जीविका चलने लगी ।

रवींद्र कालिया के पास धर्मवीर भारती का प्रस्ताव आया था । वे रवींद्र कालिया को पुन: धर्मयुग में लेना चाहते थे । कारण , धर्मवीर भारती इस बात से दुःखी थे कि लगी लगायी सरकारी नौकरी छोड़कर रवींद्र कालिया को आज उनकी वजह से छापाखाना चलाना पड़ रहा है । रवींद्र कालिया ने विनम्रता पूर्वक प्रस्ताव ठुकरा दिया था । बाद में उन्होंने धर्मवीर भारती को केंद्र में रखकर एक कहानी लिखी -" काला रजिस्टर " । काला रजिस्टर में धर्मवीर भारती के तानाशाही का चित्रण था । यह कहानी उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी बन गयी । " गालिब छुटी शराब "रवींद्र कालिया की आत्म कथा है । इस किताब में भी रवींद्र कालिया ने धर्मवीर भारती के साथ अपने सम्बंधों को विस्तार से लिखा है ।

धर्मवीर भारती का अपना व्यक्तिगत जीवन भी सुखी नहीं था । पहली पत्नी कांता भारती से उनकी कभी नहीं निभी । उनको तालाक देकर धर्मवीर भारती ने पुष्पा भारती से शादी की थी । कांता भारती ने भी धर्मवीर भारती से अपने सम्बंधों को लेकर एक उपन्यास लिखा था - रेत की मछली । " रेत की मछली " का वाक्य विन्यास व भाषा की असहजता खटकती है । कांता भारती एक स्थापित साहित्यकार नहीं थीं । लेकिन उनके लेखन से धर्मवीर भारती के व्यक्तित्व के छुपे रहस्य उजागर होते हैं । इस पुस्तक में कांता ने अपने मन की भड़ांस निकाली है । धर्मवीर भारती ने कभी भी इस पुस्तक के तथ्यों को न तो स्वीकार किया और न हीं कभी प्रतिकार किया।

मेरा व्यक्तिगत मत है कि धर्मवीर भारती का तानाशाही पूर्ण रवैया धर्मयुग के बेहतरी के लिए था । यह तानाशाही उन्होंने धर्मयुग को विस्तार देने व उसे सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए गढ़ा था । आज के बाॅस भी वही कर रहे हैं , जो धर्मवीर भारती ने किया था । हमारे सुरक्षा बलों में यही सिखाया जाता है कि अपने जूनियर का कल्याण अवश्य करो , पर उससे दूरी बनाकर । इससे अनुशासन सही रहता है । स्टाफ पर नजर रखने के लिए वे सूराख की मदद लेते थे तो आज वही काम बाॅस के लिए सी सी टी वी कैमरा कर रहा है । आज भी मेमो धड़ल्ले से मिलते हैं , जिसे मजाक में लव लेटर कहा जाता है ।

धर्मवीर भारती के समय में धर्मयुग काफी फला फूला , पर इसका सबसे बड़ा नुकसान धर्मवीर भारती को हुआ । उनकी रचनात्मकता का ह्रास होने लगा । कांता भारती के उपन्यास " रेत की मछली " के प्रकाशन के बाद तो धर्मवीर भारती बिल्कुल टूट गये । वे बीमार रहने लगे थे । कहना असंगत नहीं होगा कि इलाहाबाद का वह हंसमुख व्यक्ति , उसका खिलंदड़ा अंदाज मुम्बई आकर खो गया । उन्होंने अपने एक अजीज मित्र को लिखा था - इलाहाबाद के धर्मवीर भारती की रचनात्मकता यहां खो गयी है । आधा घंटा भी लिखता हूं तो सिर दर्द होने लगता है । तीन गम्भीर हार्ट अटैक झेलने के बाद धर्मवीर भारती ने 4 सितम्बर 1997 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था ।

मुम्बई से धर्मवीर भारती इलाहाबाद आए , लेकिन उनका शरीर नहीं , उनकी अस्थियां आयीं । रबींद्र कालिया ने श्रद्धांजलि स्वरूप उन पर एक लेख लिखा था - मुट्ठी भर खाक बनकर धर्मवीर भारती इलाहाबाद पहुंचे । आज धर्मवीर भारती , रवींद्र कालिया और कांता भारती इस दुनियां में नहीं हैं , पर इतिहास में यह बात दर्ज हो चुकी है - एक था धर्मयुग , एक थे धर्मवीर भारती ।

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