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सुन ले अरजिया हमार हे छठी मैया !!

Bhola Tiwari Nov 20, 2020, 1:47 PM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

पटना :  न कार्तिकसमो मासः न देवः केश्वात्परः।

            न वेदसदृशं शाश्त्रं न तीर्थ गंगाया समं।।

             पद्दम पुराण (120 / 23-24)

अर्थात – कार्तिक के समान कोई मास नहीं है, श्रीविष्णु से बढ़ कर कोई देव नहीं, वेद के तुल्य कोई शास्त्र नहीं है न ही गंगा के सामान कोई अन्य तीर्थ है।

शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक के मध्य जितने भी अनुष्ठान की जो भी परंपरा है उनका प्रत्यक्ष संबंध हमारे जीवन एवं देनान्दिनी से है, जिसकी केंद्र बिंदु होता है मनुष्य, समाज और प्रकृति। चाहे वह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाने वाली गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट–महोत्सव होता हो, या फिर कार्तिक मास के शुक्लपक्ष के द्वितीय को आयोजित होने वाली यमद्वितीय(भैया-दूज) हो या कार्तिक मास के शुक्ल षष्ठी जो मुख्यतः सूर्योपासना से जुडी हुई है। या फिर कार्तिक शुक्ल अष्टमी को विशेष रूप से आयोजित की जाने वाली गाय पूजन हो या कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन आँवले के वृक्ष के निचे पूजा एवं ब्राहमण भोजन का महात्म हो या कि कार्तिक शुक्ल एकादसी के पवित्र दिवस पर क्षीर सागर में शयन कर रहे भगवान् विष्णु का जागना(देवोत्थापनी एकादसी ) हो या भीष्म पंचक व्रत हो या कार्तिक पूर्णिमा का पवित्र गंगा स्नान।

लोक-आस्था के इस महापर्व छठ में षष्ठी के दिन फल-पुष्प, पकवान आदि नैवेद्द लेकर नदी तट पर सूर्य का पूजन कर सूर्य को सायंकालीन अर्ध्य प्रदान किया जाता है। गंगा को दीपदान होता है। दुसरे दिन सूर्योदय के समय सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है। छठ पर्व हमें प्रकृति के साथ जुड़ने का संदेश देता है। छठ पर्व में केवल प्राकृतिक कंद मूल, फल-फूल, बांस की बनी सूप-डाला का किया जाता है।

सूर्य के बगैर हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। संसार में प्रकाश का रत्रोत ही है, यदि सूर्य ना होता तो पृथ्वी भी सभी की तरह बेजान होती। धरती पर आने वाले सभी जीव-जंतु प्रकृति पर निर्भर है किंतु प्रकृति का वजूद खुद सूर्य पर निर्भर है। अगर सूर्य की किरणें पर न पहुँचे तो धरती का विनाश हो जाएगा, चारों ओर अंधकार छा जाएगा, पृथ्वी पर भयानक प्रलय छा जाएगा और पृथ्वी पर से जीवन का नामोनिशान ही मिट जाएगा। सूर्यदेव जीवंत रुप में हम सभी के जीवन चक्र में शामिल है। कलियुग मे सूर्य ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देख सकते हैं। वैसे तो सूर्य को प्रात: में अर्घ्य प्रदान करने का हिंदू धर्म में विधान है पर इसका महत्त्व कार्तिक और चैत्र मास की षद्ठी तिथि को और भी बढ़ जाता है। यह विज्ञान सम्मत है कि जो व्यक्ति सूर्य को नित्य जल अर्पित करता है उसे चर्म रोग कभी नहीं होता। सूर्य को जल देते समय सूर्य की किरणे जल से टकरा कर हमारे शरीर पर पड़ती है, जिससे असंख्य हानिकारक जीवाणुओं का नाश हो जाता है और हमारा शरीर पूर्ण रूप स्वस्थ्य हो जाता है।


एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत-रामायण काल में हुई थी। सूर्य पुत्र कर्ण घंटों पानी में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ देते थे कुछ कथाओं के अनुसार अपना सबकुछ गंवा देने के बाद जब पाण्डव वनवास काल में थे तब द्रौपदी ने छठ व्रत कर राज-पाट की पुन: प्राप्ति हेतु मन्नत मांगी थी। वहीं रामायण के अनुसार लंका पर विजय प्राप्त करने के पश्चात जब राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या वापस आए थे तो सीता माता ने कार्तिक मास शुक्ल पक्ष बच्ठी तिथि को छठ व्रत की थी। पुराणों के अनुसार राजा प्रियवद ने पुत्र की प्राप्ति के लिए छठ का व्रत किया था।

सृष्टि में विधाता की वैज्ञानिक दृष्टि सर्वत्र द्रष्टव्य है। यहाँ अनगिनत विविधताएँ हैं, किंतु कुछ भी निरर्थक नहीं है। हर वस्तु की कुछ ना कुछ सार्थकता है, उपयोगिता है। ऐसी विविधताओं से भरी सृष्टि में ‘मानव’ उसका चरम निदर्शन है। मानव के साथ शेष प्रकृति का सहचरी भाव भी है और अनुचरी भाव भी। यह दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं, यथा- मनुष्य वृक्ष-वनस्पतियों का पौधारोपण करके, उन्हें खाद-पानी देकर उनका पालन-पोषण करता है, तो वृक्ष-वनस्पति अपने बीज, फल आदि भोज्य पदार्थ प्रदान कर मानव के पालन-पोषण का आधार बनते हैं। इसी प्रकार मनुष्य प्रकृति के प्रति श्रद्धावनत होता आया है। दिव्य और उपयोगी शक्तियों के परस्ती पूज्य भाव से ओत-प्रोत रहना स्वभाविक भी है। इसी के परिणामस्वरूप वृक्ष-पूजा, नदी-पूजा सदा से की जाती रही है। वैदिक साहित्य में इसके निदर्शन भरे पड़े हैं।

अपनी श्रद्धा और आदरांजलि समर्पित करते हुए मानव को वृक्ष-पूजा, नदियों के पूजा के समय उन्हें दिव्य शक्तियों का अनुभव होता रहा है, जिसके कारण उसकी अन्तश्चेतना प्रभावित होती है। किसी भी तत्व में दिव्यत्व का अनुभव हमारी आत्मा को शांति प्रदान करता है। प्राचीन मान्यता है कि पेड़-पौधे और नदियों में देवी देवताओं का निवास रहता है। जहाँ तक वृक्ष-नदियों के सांस्कृतिक महत्व की बात है, हमारे पूर्वजों ने इसे शुभ-कार्य तथा उत्सवों से जोड़कर रखा है ताकि इसे पूजनीय बनाये रखा जा सके। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा-स्नान एवं अन्य नदियों में स्नान की महत्ता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

शायद ही दुनिया के किसी देश, संप्रदाय और धर्म में डूबते हुए सूर्य के प्रति नतमस्तक होने की प्रथा या प्रचलन मिलती है। समूची मानवता उगते हुए सूर्य को प्रणाम करती है अर्थात जो वर्तमान में शक्तिशाली हैं, प्रभावशाली हैं उनका ही समाज में आदर-सम्मान होता है परंतु सिर्फ और सिर्फ सनातन धर्म में और वह भी विशेषकर अखंड बिहार ही एकमात्र भूमि है जहाँ अस्त होते हुए सूर्य के प्रति भी हम नतमस्तक होते हैं अर्थात छिन्न-भिन्न हो रही उस पीढ़ी, जिव-जंतु और प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये गए उन सभी चीजों के प्रति हम हम कृतज्ञ भाव से अपनी आदरांजलि अर्पित कर हम कृत-कृत होते हैं और अपना आभर प्रदान करते हुए उनके अनुभवों से सिंचित होते हुए उनकी छत्रछाया में बढ़ते हुए हम अपनी आने वाली नयी पीढ़ी का स्वागत करते हैं।

प्राचीन काल से लेकर आजतक ऋषियों-मुनियों, विद्वानों, महाकवियों ने जितना गंगा पर लिखा उतना अन्य विषयों पर नहीं। आर्य संस्कृति में गायत्री, गीता एवं गाय की जो प्रतिष्ठा है, वह समन्वित देवनदी गंगा में विद्यमान है। महाभारत में इसे त्रिपथगामिनी और रघुवंश, कुमारसंभव एवं ‘शाकुंतल' नाटक में त्रिस्त्रोता कहा गया है। आदिकवि वाल्मीकि ने इसे ‘त्रिपथगा’ कहा है। यह स्वर्ग-लोक, मृत्यु-लोक पाताल-लोक को पवित्र और करती हुई प्रवाहित होती है।

गढ़ा त्रिपथगा नाम दिव्या भागीरथीति च।

त्रीन् पथो भावयन्तीति तस्मात् त्रिपथगा स्मृता।

(वा. रा. 1 /44 /6)

हजारों वर्षों से भारत को धन-धान्य से पूर्ण करने वाली जिस गंगा-जल के स्पर्श होने पर मनुष्य के सारे पाप एक क्षण में ही दग्ध हो जाता हैं, जो सैकड़ों योजन दूर से भी गंगा-गंगा कहता है, वह सब पापों से मुक्त होकर श्रीविष्णु-लोक को प्राप्त होता है आज वही पतित-पवन गंगा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है जल-प्रदूषण के गम्भीर संकट को नहीं रोका गया तो एक दिन गंगा समाप्त हो जायगी और बिना गंगा के भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कार्तिक मास के षष्ठी के सायंकाल में अस्ताचलगामी और सप्तमी को उदयीमान सूर्य को अर्ध्य देते हुए वाकई हम यह आत्मसात करते हैं कि इस पृथ्वी पर नष्ट हो रहे और नए पुष्पित हो रहे हर चीज का अपना एक महत्व है और महात्म है।

प्रकृति ने हमे जीवन-यापन खुशी से करने के लिए सभी प्रकार के उपाय किए, किंतु मानव धीरे-धीरे प्रकृति से कटता गया और अपनेजीवन के को तनावग्रस्त कर लिया। आधुनिक युग के चकाचोौंध हम अपनी जड़ों और परम्पराओं से कट रहे हैं। ऐसे में छठ व्रत सांस्कृतिक विरासत और आस्था को बनाए रखने तथा संयुक्त परिवार और समाज में एकता और एकरुपता को बनाए रखने के लिए कारगर साबित होती है। छठ पूजा में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। 

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