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BIG NEWS : बिरसा को न भगवान कहिये और न वीर राष्ट्रीय नायक। बिरसा की लड़ाई आज भी जारी है। आपसे और अन्य सूबेदारों से मोदीजी!

Bhola Tiwari Nov 18, 2020, 12:16 PM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : बिरसा भगवान नहीं थे। न अवतारी थे। एक आम आदिवासी की तरह स्वाभिमानी थे। देसज मूल्यों पर मर मिटनेवाले एक जूनूनी थे। लेकिन आज पूरे एक पृष्ठ का छपा विज्ञापन बिरसा के नाम समर्पित है। यानी बिरसा को भगवान ने गोद ले लिया। प्रधानमंत्रीजी से लेकर सूबेदारों द्वारा दी गयी तमाम प्रकार की तसल्लियाँ दिख रही हैं कि उलगुलान के उस योद्धा को हम नमन करते हैं। 

लोकतंत्र विडम्बनाओं का महिमा मचाती है। शोक को उत्सव बना देती है। आपदा प्रबंधन का यह गौरव काल है। लिहाजा, विडम्बनाओं का आंकलन क्यों न हो। जल,जंगल, जमीन, जन और जानवर के रूहानी, जज्बाती संबंधों पर टिकी आदिवासी समाज की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था लाजवाब है, आज भी। सरकार भी विज्ञापनों में स्वीकार करती है कि आजादी का मकसद आदिवासियों को बिरसा ने समझाया। उन्हें जगाया। जब धर्म, संस्कृति और समाज की निजता खतरे में थी तब बिरसा बाबू ने उन सब की हिफाज़त की चिंता की। सक्रिय हुए। और शहीद हुए। विज्ञापन में सरकसर उनके इस बलिदान को देश की आजादी की लड़ाई के साथ जोड़कर देखती है। क्योंकि इसी तर्क के आधार पर बिरसा की एक राष्ट्रीय छवि गढ़ी जा सकती है। इसी आधार पर उनके जन्मदिन को जनजाति गौरव दिवस घोषित किया जा सकता है। क्योंकि आदिवासियों को हिन्दू घोषित करना है।

बिरसा के वंशज अभी ज़िंदा हैं। बिरसा की आत्मा अभी ज़िंदा है। उन तमाम इलाकों में, महकमों में जहां आदिवासी अपने समाज की हिफाजत, उसकी निजता, प्रभुता से लेकर उन मूल्यों को बचाने के लिए उसी तरह तत्पर हैं, जिस तर्ज पर बिरसा सक्रिय रहे। लेकिन बिरसा बने इन आदिवासियों को नक्सली, राष्ट्र विरोधी और यहां तक कि विदेशी एजेंट तक कहने की छूट मीडिया और नगरीय समाज के पास है। चूंकि सरकार भी ऐसा ही मानती है। कभी बांध के नाम पर, कभी बिजली घर के नाम पर और कभी बाघों को बसाने के नाम पर उन आदिवासियों को मूल से उखाड़ा जाता है। एक नहीं, चार चार बार। लेकिन सवाल है कि विद्रोह बिरसा ने किया तो राष्ट्रीय नायक कहलाये लेकिन लोकतंत्र के कायदे में रहकर आंदोलित आदिवासी आज राष्ट्रद्रोही क्यों खके जा रहे हैं।

बिरसा के देस में मतलब झारखण्ड में आदिवासी कल्याण का जितना भी फण्ड आया, खर्च किया गया। नतीजा सामने है। आज भी संतोषी की मौत भूख से होती है। बिरहोर बन्दर मारकर खाते है, अपना पेट पोसते हैं। कुछ साल पहले लकड़ियां और नेवले खाने की खबरें आयी थीं। रोजगार के अभाव में झारखण्ड की बेटियां महानगरों की कोठियों में अपनी जवानी के अच्छे दिन सेक्स की बंधुआ बनकर काटतीं हैं। एक आदिवासी मंत्रालय है, जिसके दायरे में ऐसे मुद्दे नहीं आते। वह छात्रवृत्तियां बांटकर, होस्टल खोलकर और आदिवासियों की सुंदर छवियां परोसकर लोकतंत्र को सफल बना रही है। बिरसा अचंभित हैं। बिहार में कैमूर के आदिवासी उद्वेलित और आंदोलित हैं। वहाँ बाघों का बसेरा बनेगा। दर्जनों गांव उजाड़े जाने की खबर है। आदिवासी मान नहीं रहे, तो उनपर गोलियां बरसायी गयी हैं। 

कमाल की दोगली व्यवस्था है। बिरसा का कहा अबुआ दीशुम, अबुआ राज यानी अपना देस, अपना राज, याद है लेकिन उन आदिवासियों को कभी सलमा जुडूम तो कभी मलिक मकबूजा देकर उन्हें राष्ट्रद्रोही कहने में तुम्हे शर्म नहीं आती। पता नहीं, इतना फरेब लाते कहां से हो, ईसाई बनते आदिवासियों को लेकर छातियाँ पीट लोगे लेकिन नियोगी कमिटी की रिपोर्ट पर अमल नहीं करोगे शिवराज सिंह जी। झारखण्ड में आठ साल की अवधि में 703 एनजीओ को 18 हजार करोड़ का विदेशी अनुदान किस काम आया, भाजपा सत्ता में रहकर पता नहीं कर पायी और न विपक्ष में बैठे पता करने की उसकी इच्छा शक्ति है कि इतने पैसे गए कहां?

बिरसा को इंसान रहने दीजिए। बिरसा के पुश्तों को इंसान मानिए। बिरसा न हिन्दू थे और न ईसाई। बल्कि बिरसा की लड़ाई इसी अंग्रेजियत के खिलाफ थी। विडम्बना है कि आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र फला फूला नहीं तो राधा सहजता से रोजलिना बनती चली गयी। यह लड़ाई लम्बी चलेगी। क्योंकि यह लड़ाई संजातीय पहचान की है। जय बिरसा, जय आदिवासी भारत।

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