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प्रकृति का आभार व्यक्त करने का पर्व छठ

Bhola Tiwari Nov 17, 2020, 7:51 AM IST टॉप न्यूज़
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अलका मिश्रा

बोकारो : छठ वास्तव में सूर्योपासना का पर्व है। इसलिए इसे सूर्य षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सूर्य की उपासना उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। सूर्योपासना यानि प्रकृति की आराधना करते हुए कृतज्ञता वयक्त करना जिसके कारण धरती पर जीवन संभव है।इस पर्व के आयोजन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी


 सृष्‍ट‍ि की अधिष्‍ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्‍ठी है। षष्‍ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्‍यायनी भी है। इनकी पूजा नवरात्र में षष्‍ठी तिथि को होती है। षष्‍ठी देवी को ही स्‍थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है।

प्रकृति की शुद्धता बनाए रखने का प्रयास

दरअसल, छठ पर्व प्रकृति की आराधना और उसकी शुद्धता बनाए रखने का ही एक प्रयास है जिसे धार्मिक अनुष्ठान का रुप दिया गया है।हमारी ऊर्जा का श्रोत है सुर्य और कार्तिक माह के शुक्ल षष्ठी में शुद्ध जल में खड़े होकर अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व है लेकिन प्रकृति की शुद्धता अब है कहाँ..बहते हुए नाले और प्रदूषित नदियों में अनुष्ठान पुरा किया जा रहा।क्या ही अच्छा होता कि दुनियाभर के तामझाम, दिखावे आदि से दूर हटके प्रकृति की शुद्धता व संतुलन बरकरार रखने की ही कोशिश की जाती।


जात-पात से परे हमारे आध्यात्मिक श्रेष्ठता का द्योतक

 इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामा‍जिक रूप से अत्‍यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्‍पष्‍ट है।

सूर्यषष्‍ठी व्रत में लोग उगते हुए सूर्य की भी पूजा करते हैं, डूबते हुए सूर्य की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा करते हैं।* इसमें कई तरह के संकेत छिपे हैं। ये पूरी दुनिया में भारत की आध्‍यात्‍म‍िक श्रेष्‍ठता को दिखाता है।

प्रकृति के इस त्योहार का मूल रुप से दूर होना ही हमारे विनाश का कारण

   दरअसल, भौतिकता और दिखावे की दौड़ में हम प्रकृति के इस पवित्र त्यौहार के मूल रुप से दूर होते जा रहे।यह पर्व हमारी धार्मिक श्रेष्ठता को विश्व में स्थापित करता व विश्व के कल्याण का संदेश देता है।प्रकृति है तभी जीव सुरक्षित है और जीव है तभी यह ब्रह्मांड है।यह पर्व सार्वभौमिकता से जुड़ा हुआ है न कि छुद्र स्वार्थ से लेकिन अज्ञानतावश लोग इसके मूलरूप से दूर होते जा रहे।प्रकृति का हर रोज विनाश हो रहा और कंक्रीटों की भयानकता बढ़ती जा रही,प्राकृतिक जल को प्रदूषित कर हम बोतलबंद जल को ज्यादा अहमियत दे रहे।छठ पर्व के बहाने अब लोग सूर्य का दर्शन कर ले रहे वरना कंक्रीटों से बने अट्टालिकाओं में सूर्य की किरण कहाँ मुहैया।चलो..छठ एक बहाना ही सही लेकिन इसी बहाने बहुत सी असूर्यम्पश्याओं को भी सूर्य के दर्शन हो जाते हैं।

कोरोना वायरस का कहर इसपर भी हावी

 इस वर्ष कोरोना वायरस के कहर से छठ भी अछूता नहीं रहा।कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे को देखते हुए सरकारी आदेशानुसार सार्वजनिक तालाबों, जलाशयों, नदी व अन्य जल निकायों में छठव्रतियों के डुबकी लगाकर स्नान करने पर रोक लगा दी गई है।मास्क, सेनेटाइजर का इस्तेमाल करते हुए एवं सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए छठ मनाने की अनुमति दी गई है।इसे धार्मिक आस्था पर प्रहार मानते हुए भक्तों में रोष व्याप्त है और इसका विरोध होना भी शुरु हो गया है।

    बहरहाल, धार्मिक आस्था के अलावे यदि वैज्ञानिक नजरिए से भी देखा जाए तो एक बात स्पष्ट है कि प्रकृति पूजन की महत्ता वाले इस त्योहार में सूर्य उपासना सर्वोपरि है और सूर्य की किरणों में वह तेज है जो किसी भी संक्रमण पर नियंत्रण कर सकता है।प्रकृति से खिलवाड़ और गलत उपयोग का ही परिणाम है कोरोना ! इसलिए सरकारी नियमों का प्रकृति के नियमों पर ज्यादा हस्तक्षेप ना होना ही मानव हित के लिए बेहतर है।

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