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सिलसिला इस्तीफों का

Bhola Tiwari May 28, 2019, 11:24 AM IST टॉप न्यूज़
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 प्रशान्त करण

 सत्रहवीं लोकसभा के आम चुनाव सम्पन्न हो गए।पश्चिम बंगाल में काफी हंगामे और खूनखराबे की खबर भी आयी।नहीं आती तो पता ही नहीं चलता कि वहाँ मतदान की प्रक्रिया पूरी हुई।परिणाम भी आ गए।अब सेहरा बाँधने और ठीकरा फोड़ने का मौसम आ गया।इसी परम्परा के निर्वहन में चल पड़ा सिलसिला इस्तीफों का।हर प्रदेश से इस बारे में खबरें पढ़ने को मिलने लगी है।सिलसिला पर्व भक्तिभाव और राजनैतिक परम्पराओं के साथ मनाया जा रहा है।कोई इस्तीफा माँग रहा है तो कोई दे रहा है।कोई माँगने पर दे रहा है तो कोई बिना माँगे।इस्तीफा मानो भारतीय सनातन परम्पराओं के दान जैसा हो चला है।लोग इस्तीफा देने की बात घोषित कर पाप धो रहे हैं और पुण्य कमाने के चक्कर में हैं।दान की बात भी सनातन संस्कृति में इसी तथ्य पर आधारित है।पर इस्तीफे वाला मामला थोड़ा अलग है।दान से बिरले ही मना करते हैं।पर इस्तीफे के साथ यह बात नहीं है।इधर इस्तीफा दिया नहीं,सिर्फ घोषणा की,उधर मनाने वाले पहले से सेट किए हुए हैं।इस्तीफे की घोषणा होते ही मनाने वालों को जगाकर उनके कर्तव्यबोध को झकझोरा जाता है।बेचारा कई बार बेमन से ही सही इस्तीफे को स्वीकार न करने की प्रार्थना करने का बयान अखबारों में छपवा देता है।इस्तीफा देने वाला उसे सबसे पहले पढ़ लेता है और फिर बड़ी तेजी से अपना इस्तीफा जनहितार्थ और लोगों के दबाब में वापस लेने की घोषणा कर बैठता है।कोई विरोध नहीं करता।सभी सम्बंधित इसकी प्रशंसा करने लगते हैं और इस्तीफे देने वालों की प्रतिष्ठा में कशीदे पढ़ने लगते हैं।यह खेल बड़ा मजेदार होता है।क्रिकेट की भाषा मे कहा जाए तो बैट्समैन भी खुद,बॉलर भी स्वयं,अंपायर भी खुद,फील्डर भी खुद। सभी खिलाड़ी तो अपने ही हैं और अंपायर सेट है।बिना भेदभाव के यह खेल बड़े आत्मविश्वास से चल रहा है।

       मेरी बालकोनी से एक खेल का स्थान दिखता है।आजकल गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं।बच्चे पढ़ाई से आज़ाद हैं।घरवाले उनके घर में लगातार रहने से परेशान।इसलिए सुबह ही बैट बॉल देकर घर से बाहर कर देते हैं।बेचारे बच्चे खेलें नहीं तो और क्या करें।खेल शुरू होता है।एक दबंग बच्चा बैटिंग करने लगता है।कमजोर लड़के को बॉल फेंकने को कहा जाता है।वह बॉल फेंकता है।दबंग बच्चा आउट हो जाता है।सारे खिलाड़ी चिल्लाते हैं नो बॉल है।बच्चा अपने साथियों को आँख मार कर इशारा करता है।दबंग बैट लेकर जाने लगता है।अंपायर और सारे खिलाड़ियों के मनाने पर रुक जाता है।फिर बैटिंग करने लगता है।मुझे यह खेल इस्तीफे वाले खेल की तरह लगने लगा है।

   अनुभवी जी ने एक अखिल भारतीय विरोधी पार्टी बना रखी है।पार्टी के अध्यक्ष वही हैं।अपनी पसंद के हाँ में हाँ मिलाने वालों को पद दे दिया गया है।सब का भरण पोषण अनुभवी जी करते हैं।सभी पदधारियों और सदस्यों को मुफ्तखोरी की लत लगी है।उनकी पार्टी चुनाव लड़ती है और बुरी तरह पराजित हो जाती है।अनुभवी जी मुखिया पद से प्रत्याशी के रूप में हार जाने पर अपने इस्तीफे की घोषणा पार्टी की बैठक में करते हैं।इसे खुद ही अध्यक्ष की हैसियत से नामंजूर कर देते हैं।फिर से इस्तीफे पर अड़ जाते हैं।अध्यक्ष की हैसियत से अध्यक्ष भी इस्तीफा नहीं मंजूर करने पर अड़े रहते हैं।बड़े बूढ़े पदधारी उन्हें मनाते हैं और कहते हैं कि उन्हें युवा मार्गदर्शन की जरूरत है।उम्मीदवार अनुभवी जी अध्यक्ष के और सीनियर पदधारियों के बहुत दबाब के कारण इस्तीफा वापस लेने की मीडिया में घोषणा कर देते हैं।सभी का भरण पोषण चलने लगता है।अनुभवी जी का अनुभव काम आता है।सभी पदधारी यही खेल बारी बारी से खेलते हैं।महीने भर बाद यथास्थिति वही पुरानी वाली कायम हो जाती है।सभी जहाँ थे वहीं काबिज रहते हैं।अनुभवी जी जहाँ थे,वहीं हैं और पार्टी के चन्दे को बढाने की जुगत लगाने में व्यस्त हो जाते हैं।

     इस्तीफे का यह मौसम महीने भर चलेगा।फिर बयानबाजी की पंतग उड़ाने और मनगढ़ंत आरोप लगाने का खेल अनवरत चलेगा।यह हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन चुका है।इसके खत्म होने पर हमें लगेगा ही नहीं कि हम आज़ाद भारतवर्ष की लोकतंत्र का मजा और मनोरंजन का लाभ उठा रहे हैं।

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