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जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते

Bhola Tiwari May 28, 2019, 11:15 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी झा

हमने कभी जुगनू से भरे एक पेड़ को देखा था . उस पर असंख्य जुगनू टिमटिमा रहे थे . मैं बलिया शहर से अपने गांव जा रहा था . रास्ते में चेन पुलिंग हुई . ट्रेन खड़ी हुई . शुक्र था कि हम ट्रेन की छत पर बैठे थे. इसलिए उस नयनाभिराम दृश्य को बड़ी शिद्दत से देख पाये . शाहरुख खान की तरह ट्रेन की छत पर कूद कूद कर छैंया छैंया गा रहे होते तो शायद वह दृश्य कभी नहीं देख पाते . इस दृश्य को देखकर मुझे जुगनुओं के बारे में जानने की परम अभिलाषा हुई . जुगनू को अंग्रेजी में Fire fly कहा जाता है , जब कि हिंदी मे इसे खद्योत कहते हैं . आपने खद्योत पर वह प्रसिद्ध दोहा तो अवश्य पढ़ा होगा , जिसमें आजकल के कवियों की तुलना खद्योत से की गई है ...

सूर सूर , तुलसी शशि , उडगन हैं केशव दास .

अब के कवि खद्योत सम ,जंह तंह करत प्रकाश .

मुझे पता चला कि केवल नर जुगनू के हीं पंख होते हैं .मादा के पंख नहीं होते . इसलिए वह उड़ नहीं पाती . वह पेड़ पर हीं बैठी रहती है . नर जुगनू मादा को रिझाने के लिए रोशनी विखेरते हैं . वैसे उन्हें भोजन की तलाश में भी रोशनी की जरूरत होती है . वे छोटे कीट व वनस्पतियों का भोजन करते हैं. नर जुगनू की रोशनी की अावृति से मादा उसे लाखों जुगनुओं में भी पहचान लेती है . वह उस नर जुगनू को " साथी है खूबसूरत , मौसम को ये खबर है " मान अपना दिल दे बैठती है . इसके अतिरिक्त नर जुगनू को मादा को मेहर के तौर पर अपने शरीर से एक थैली निकाल कर भी देनी पड़ती है . इस थैली में शुक्राणु व अन्य भोज्य पद्यार्थ होते हैं . थैली जितनी बड़ी होती है , प्यार उतना हीं ज्यादा परवान चढ़ता है . इस पर अभी और शोध करना बाकी है .मादा अपने अण्डे पेड़ों की छाल में या जमीन के अंदर देती है .

पहले यह माना जाता था कि जुगनुओं के शरीर में फासफोरस होता है , जिससे रोशनी होती है . सन् 1667 में इटली के राबर्ट वाॅयल ने यह खोज की कि इस रोशनी की वजह एक ल्यूसीफेरेस नामक प्रोटीन है. यह रोशनी हरा ,पीला व लाल कई रंगों को समेटे हुए है. वर्तमान समय में जब सारे जंगली कीट शहर की तरफ रुख कर रहे हैं , ऐसे में जुगनू का जंगल या देहात में हीं रहना - आश्चर्य का विषय है . इसका ठेठ गवईं अंदाज हमें भा गया है . यह बहुत हीं सीधा होता है ,जो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता . इसे आप अपनी हथेली पर भी रख सकते हैं . थ्रिल महसूस कर सकते हैं .शहर के लोग इस थ्रिल से अनजान व महरूम रहते हैं. रोशनी करने वाला पद्यार्थ इसके पेट के निचले हिस्से में रहता है , जो आक्सीजन के साथ मिलकर रोशनी विखेरता है . इसमें रोशनी के लिए एक उत्प्रेरक भी होता है .

पुराने जमाने में रात की रोशनी के लिए लोग जुगनुओं को पकड़ कर एक वर्तन में एकत्र कर लेते थे . इस वर्तन को ऊपर टांग देते थे .वर्तन में नीचे की तरफ सूराख होता था , जिससे रोशनी छनकर नीचे आती थी. इसे गरीब की झोपड़ी का लालटेन कहा जाता था .द्वीतिय विश्व युद्ध के समय जापान में यह विधि ब्लैक आउट के समय या दूर दराज के इलाके में कार्यरत फौजियों द्वारा अपनायी जाती थी . 

अंत भला तो सब भला . इसलिए लेख के अंत में जुगनू पर एक धांसू सा शेर ..

ढूंढ लेते हैं , अंधेरों में भी मंजिल अपनी .

जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते .

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