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••••••तो लोग समझ जाते कि अब मृत्यु आ गया

Bhola Tiwari May 26, 2019, 9:42 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

आज एक इक्यानवे वर्ष की महिला मरीज बन कर अल्ट्रासाउंड के लिए आई। वो उम्र के हिसाब से स्वस्थ तो दिख रही थी, उन्होंने कहा कि वो जीवन में कभी डॉक्टर के पास नहीं गयी। फिर हँस कर कहा कि उनके सारे टैक्स बरबाद गए। क्योंकि यहाँ स्वास्थ्य तो मुफ्त ही है तो पूरे जीवन में हजारों दफे जा सकती थी। उन्हें लगा कि अब उनकी एक्सपायरी आ गयी।

अब यह ‘एक्सपायरी’ वाली बात जम गयी। हम कुछ भी सामान लेते हैं, तो उसकी एक नियत ‘एक्सपायरी’ होती है। पाँच साल, दस साल। यह तमाम प्रयोग वगैरा से निकलता होगा। गर बीच में कुछ गड़बड़ हो गया, तो कंपनी वापस नया सामान दे देगी। तो मनुष्यों के भी अलग-अलग ब्रांड, अलग-अलग मॉडल बन कर आते होंगे। जापानी मनुष्य पर सौ साल का ठप्पा, तो भारतीय पर अस्सी, और किसी अन्य देश पर साठ। बाकी, कोई कम-ज्यादा चल गया और बात है। पर उतने साल औसतन बिना रोग चल जाएगा, इसकी गारंटी तय कर ईश्वर पैक कर भेजते होंगे। 

यह भी होता है कि वाशिंग मशीन की गारंटी है पाँच साल, पर आपने उसकी सफाई नहीं की। रेत वाले कपड़े खूब डाल दिए। मशीन फ़ेल। मतलब शरीर की गारंटी शर्तों के साथ है कि उसे एक नियत तरीके से ही प्रयोग किया जाए, मेन्टेन किया जाए। तभी चलेगा।

पर क्या स्वस्थ जीने वालों की एक्सपायरी नहीं आएगी? डॉक्टर से बीच-बीच में सर्विसिंग कराते रहने से शायद बेहतर रहे। लेकिन उन सबको जोड़ कर ही गारंटी मिलती है। पुराने जमाने में सुना है, लोग एक दिन कहते कि अब खाट बाहर कर दो, मैं मरने वाला हूँ। आईसलैंड में मैंने लिखा कि जब मुंडेर पर कौवा आकर कुछ देर बैठ जाता, उड़ाते न उड़ता, तो लोग समझ जाते कि अब मृत्यु आ गया। वो खुशी-खुशी मर जाते। 

तो आज उन महिला को भी यही लगा होगा, तभी तो जीवन में पहली बार यह इच्छा हुई कि डॉक्टर को देख आऊँ। मुझे जाँच में कारण भी मिल गया, और उन्होंने भी चेहरा पढ़ लिया। यहाँ तो बताना भी होता है, पर उनमें एक रत्ती भय नहीं, अवसाद नहीं। मुस्कियाती गप्पियाती निकली। जैसे उनके लिए यह सब एक योजना के मुताबिक चल रहा हो। एक्सपायरी डेट उनके पैकेट पर पहले से लिखा हो, और वो चल कर आ गयीं हो कि अब समय हो गया।

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