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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के पराभव के कारण

Bhola Tiwari May 24, 2019, 12:02 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

साल 1977,विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार होती है और वहाँ के लोकप्रिय मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे को इस्तीफा देना पड़ता है।वामपंथी दलों की तरफ से ज्योति बसु मुख्यमंत्री बनते हैं।उन दिनों पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद मुख्य समस्या थी,कल-कारखानों में पारिश्रमिक बेहद कम मिलते थे।मजदूर संगठन बेहद निष्क्रिय थे या फैक्ट्री मालिकों से मिले थे।

ज्योति बसु ने सत्ता संभालते हीं नक्सलियों पर अंकुश लगाना शुरू किया, जो मान गए उन्हें मुख्यधारा में वापस ले लिया गया जो न माने बंदूकों ने उन्हें शांत कर दिया था।वामदलों ने मजबूत मजदूर संगठन बनाकर मिल मालिकों को उचित पारिश्रमिक देने को बाध्य कर दिया, सरकार बैकडोर से मजदूर यूनियन का सपोर्ट करती रही।

पश्चिम बंगाल में बिहार, उ.प्र से आए मजदूरों के बीच जिनकी संख्या लाखों में थी वामपंथी पार्टियों बेहद लोकप्रिय हो गई।ये सारे वामदलों के कोर वोटर बन गए थे।

बांग्लादेश के उदय के पहले से हीं बांग्लादेशी मुसलमानों का पलायन पश्चिम बंगाल, आसाम में होता रहता था,पश्चिम बंगाल की ज्योति बसु सरकार ने उन्हें राज्य में बसाकर उनको अपना वोटर बना लिया।बांग्लादेशियों को बसने के लिए जगह दी जाती थी और उनके वोटरकार्ड, राशनकार्ड बनाकर उपकृत कर दिया जाता था।वे सभी वामपंथियों को हमेशा वोट करते थे।

ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों के कमजोर होने पर घुसपैठियों के साथ वही सलूक किया जो वामपंथी करते थे।ममता बनर्जी ने भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाकर उन्हें अपना वोटर बना लिया।अवैध घुसपैठ पर आम बंगाली बेहद चिंतित थे, उनको लगता था कि उनके सीमित संशाधन पर बाहरियों का कब्जा हो रहा है।दूसरे वह ममता बनर्जी के तृष्टिकरण के नीति से बेहद खफा थे।वोट के लिए मुसलमानों को बहुत से मामले में हिंदुओं पर तरहीज दी जाती थी।दूर्गापूजा के विसर्जन के समय बीते कुछ सालों से हमेशा विवाद होता रहा है,भाजपाइयों का आरोप था कि ममता मुसलमानों का पक्ष लेती हैं।ये बात भी आम बंगालियों को समझ आने लगी थी,अब इसमें कितनी सच्चाई है ये शोध का विषय है।सरस्वती पूजा के समय बवाल भी आग में घी डालने का काम किया।

भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल अस्मिता से जुडा नागरिकता(संशोधन)विधेयक और नेशनल रजिस्टर आँफ सिटीजंस(NRC)जैसे मुद्दे को खूब जोरदार तरीक़े से उठाया जो काफी असरदार साबित हुआ।बंगाली भद्रजनों को लगा कि भाजपा उनके हितों की बात कर रही है।

पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आदिवासी इलाकों में पांव फैलाने शुरू कर दिए थे ये ममता बनर्जी से छूपा नहीं था मगर इसके दुष्परिणाम इतने दुखदायी होगे ममता भी भांप न सकीं।विश्व हिंदू परिषद ने गैर बंगाली भाषी लोगों में गहरी पैठ बना ली थी और वे जय श्रीराम और मंदिर जैसे लोकलुभावन नारों के बीच अपने को रोज मजबूत करने लगे थे।

आप लोकसभा चुनाव का परिणाम देखेंगे तो झारखंड से सटे लगभग सभी जिलों में भाजपा ने बडी जीत दर्ज की है।बंगाल में जितने हिंदी भाषी लोग थे सभी ने आँख बंदकर भाजपा को समर्थन दिया है।वहाँ कौन कैंडिडेट है ये सवाल महत्वहीन था लोग बस मोदी और कमल के फूल को अपना मानकर मतदान किए।

ममता बनर्जी की बौखलाहट समझ में आती है, जिस सीपीएम से लड़कर वो मुख्यमंत्री बनीं हैं उसकी विरासत इतनी आसानी से भाजपा को देने के लिए वो कतई तैयार नहीं हैं।वो भाजपा के साथ वही सलूक कर रही थीं जो उनके साथ वामपंथियों ने किया था।ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में जो एक बार सत्ता से बेदखल होता है जनता उसे हाशिये पर रख देती है।आप पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का उदाहरण देख सकते हैं, उसके बाद लगभग तैंतीस साल राज्य में शासन करने वाले वामपंथियों का आज राज्य से सुपडा साफ हो गया है।ममता बनर्जी इस वजह से ज्यादा भयभीत हैं और उनकी चिंता समझी जा सकती है।

वामपंथी तो तृणमूल कांग्रेस से खार खाएं हैं हीं, कांग्रेस के वोटरों ने भी तृणमूल का बिल्कुल साथ नहीं दिया।ममता बनर्जी का ये आरोप बिल्कुल सही है कि बंगाल में वामपंथियों और कांग्रेस के वोटरों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया।

आज भाजपा के पास लोकसभा के 19 सीट हैं और 39.8%वोट शेयर हैं।भाजपाई कहते हैं कि लोकसभा तो सेमीफाइनल है और विधानसभा फाइनल है।भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव वाकई दिलचस्प होगा और ये ममता बनर्जी के अस्तित्व की लडाई होगी ये ममता भी समझ गईं हैं।

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