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दास्तान -ए-दिल्ली

Bhola Tiwari May 24, 2019, 9:08 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

दिल्ली दहलीज से बनी है । दहलीज फारसी का शब्द है । इसका मतलब चौखट होता है । जब घर में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले पांव चौखट पर हीं पड़ता है । जितने भी विदेशी आए , वे इस दहलीज के सहारे हीं भारत में प्रवेश किए । अहमद फराज के इस शेर में दहलीज का सुंदर चित्रण किया गया है -

जिंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला ,

तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा ।

कुछ लोगों को मानना है कि दिल्ली तोमर राजा ढिल्ली के नाम पर बनी है । ढिल्ली ने दिल्ली के केंद्र में गड़ी एक कील को खुदवाने की कोशिश की । कहते हैं कि यह कील एक अभिशाप के तहत गाड़ी गई थी । जो भी इसके साथ छेड़खानी करता उसका सर्वनाश हो जाता । तोमर राजा ढिल्ली ने भी इसके साथ छेड़खानी की । उनका भी वही हश्र हुआ । उनका राज पाट सब चौपट हो गया । इसके बाद यह कहावत मशहूर हो गयी - 

किल्ली तो ढीली भई ।

तोमर हुए मतिहीन ।

दिल्ली को बसाने वाले पाण्डव थे । उन्होंने हीं यहां इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया था । आज भी इस नगर के अवशेष मौजूद हैं , जिसे पाण्डव का किला कहते हैं । कुछ इतिहासकार इस किले को शेरशाह सूरी द्वारा बनवाया हुआ मानते हैं , लेकिन 1955 और 1969 की खुदाई से यह स्पष्ट हो गया है कि इसी जगह पर इन्द्रप्रस्थ नगरी का अस्तित्व था । खुदाई में महाभारत कालीन वर्तन मिले हैं । 1000 ईसवी से लगायत इस दिल्ली पर गोरी , तुगलक , खिलजी और मुगल वंश के शासकों का शासन रहा । इन शासकों ने अपना रूतबा कायम करने के लिए दिल्ली के हर कोने में अपनी राजधानी बनाई । लालकोट , महरौली , सिरी , तुगलकाबाद , फिरोजाबाद , दीन पनाह और शाहजहानपुर आदि सात शहरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं , जो अलग अलग शासकों की कहानियां अपने अंतस में समेटे हुए हैं ।

अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कोलकाता नगर में बसाई थी । जार्ज पंचम ने अपनी ताजपोशी के जश्न के लिए जो स्थान चुना वह दिल्ली थी । उनकी ताजपोशी को एक यादगार लमहा बनाने के वास्ते ऐतिहासिक दिल्ली से बेहतर और कोई जगह हो हीं नहीं सकता था । साथ हीं उन्होंने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली ले जाने की भी सोची । वे ऐतिहासिक दिल्ली से जुड़कर इतिहास का एक हिस्सा बनना चाहते थे । कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थांतरित करने की योजना अंग्रेजों ने काफी गोपनीय रखी थी । उन्हें डर था कि कहीं आजादी के दीवाने ऐन वक्त पर रंग में भंग न कर दें । जार्ज पंचम की ताजपोशी के लिए दिल्ली शहर से दूर बुराड़ी का इलाका चुना गया । भारत के सभी राजे रजवाड़ों , नवाबों को बुलाया गया । उनके ठहरने के लिए अस्थायी शिविरों का निर्माण किया गया था । एक पूरा शहर यहां बस गया । रोशनी से भरपूर यह क्षेत्र जगमग कर रहा था । शरारती तत्वों की धर पकड़ पहले हीं हो चुकी थी ।

चादनी चौक से जार्ज पंचम की सवारी शान से निकली थी । उनकी एक झलक पाने के लिए मानो पूरी दिल्ली उमड़ी जा रही थी । लोगों ने स्वेच्छा से अपने घरों में बंदनवार बनाए थे । उनमें रोशनी की थी । सड़कों पर जगे चराग उनका अभिनंदन कर रहे थे । जार्ज पंचम की शान की सवारी बुराड़ी पहुंची , जहां उनका राज्याभिषेक हुआ । तकरीबन वहां 80 हजार के लगभग भीड़ थी । इसी खुशी के माहौल में जार्ज पंचम ने उद्घोषणा की - हम बेहतर ढंग से प्रशासन करने के लिए भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित करने जा रहे हैं । खूब तालियां बजीं । वह दिन 11-12 दिसम्बर 1911 की मध्य रात्रि थी । सुबह घोषणा हुई । लोग एकाएक समझ नहीं पाए कि भारत के इतिहास में एक और अध्याय जुड़ने का वे साक्षी बन चुके हैं । अंग्रेजों ने शाहजहाॅनपुर में अपनी राजधानी बनाई , जिसका नाम नई दिल्ली पड़ा । सड़कें चौड़ी बनाई गईं । उनके किनारों पर आर्नामेण्टल प्लांट लगाये गये । वायसराय हाऊस ( वर्तमान राष्ट्रपति भवन ) , नेशनल वाॅर मेमोरियल ( इंडिया गेट ) की संरचना की गई । 

दिल्ली किसी की नहीं रही । जिसने इसे अपनाया वह उसके लिए बेगानी साबित हुई । यह दिल्ली कई बार उजड़ी व बसी है । सम्भवत: यह विश्व का पहला शहर रहा जो उजड़ने बसने के बीच भी खड़ा रहा । इसका वजूद हमेशा बना रहा । कोलकाता से दिल्ली राजधानी ले जाना अंग्रेजों को रास नहीं आया । दिल्ली सचमुच हीं उनके लिए बेगानी साबित हुई । इसके राजधानी बनने के 36 साल बाद हीं अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तरा समेटना पड़ा । 1947 में भारत आजाद हो गया । आज दिल्ली आजाद हवा में सांस ले रही है । आज दिल्ली बहुत खुश है ।

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