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"क्या कांशीराम के बिना "बसपा" उनके मिशन से भटक गई है?

Bhola Tiwari Oct 27, 2020, 1:28 PM IST राष्ट्रीय
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : उ.प्र के उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी की करारी हार हुई है।बसपा को एक भी सीट नसीब नहीं हुई,कोढ़ में खाज तो ये हुई कि 06 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई।लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के बल पर दस लोकसभा सीट जीतने वाली बसपा फिर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।बसपा को उ.प्र के अलावा महाराष्ट्र और हरियाणा में भी मुंह की खानी पड़ी है जबकि दोनों प्रदेशों में बसपा सुप्रीमो मायावती ने स्वंय प्रचार किया था।

उ.प्र में बसपा ने चार बार सरकार बनाई है और चारों बार हीं मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं मगर आज ये आलम है कि रामपुर, लखनऊ कैंट,जैदपुर, गोविंदनगर, गंगोह और प्रतापगढ़ में बसपा के उम्मीदवार बुरी तरह हारे हैं और उनकी जमानत तक जब्त कर ली गई हैं।दलित मायावती के वोट बैंक हुआ करते थे मगर आज दलितों का भी मायावती से मोहभंग हो गया है।आज दलित समाज भाजपा के साथ अपना भविष्य देख रहा है और देखे भी क्यों नहीं मायावती ने साठ से अधिक दलित जातियों में केवल चमार,पासी,दुसाध और मल्लाह जाति जो दलितों में दबंग हैं,अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं उसी के लिए थोडा बहुत किया है, शेष तो उपेक्षित रहे हीं हैं।कांशीराम ने सभी दलितों और शोषितों को अपने पाले में कर लिया था मगर मायावती की नीतियों और उपेक्षा के कारण ये बसपा से दूर होते गए और आज परिणाम सबके सामने है।

दलित नेता कांशीराम ने बसपा का निर्माण एक मिशन के तहत किया था, दलित समाज को एकजुट करने के पीछे उनकी एक सोच थी मगर मायावती ने कांशीराम के सपनों को सरेबाजार पैसों के खातिर नीलाम कर दिया।बहुजन के मिशन और सत्ता के सर्वजन का फर्क ही कांशीराम और मायावती के बीच का फर्क है।बसपा के गठन पर कांशीराम ने नारा दिया था "जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी",लेकिन जब मायावती बसपा अध्यक्ष बनीं तो उन्होंने नारा बदल दिया और कहा "जिसकी जितनी तैयारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी"।

कांशीराम ने हमेशा दलितों और शोषितों की राजनीति की और नारा दिया "जो बहुजन की बात करेगा,वह दिल्ली पर राज करेगा" मगर मायावती की नजर हमेशा कुर्सी पर रही और वह कुर्सी के लिए सर्वजन की राजनीति करने लगीं और उन्होंने नारा दिया "सर्वजन के सम्मान में, बीएसपी मैदान में"।"सोशल इंजीनियरिंग" के मार्फत उन्हें सत्ता तो मिली मगर मलाई स्वर्ण समाज खा गया और दलित मुँह देखते रह गए।कांशीराम ने बसपा में अनुशासन को प्राथमिकता दी थी क्योंकि राजनीति में आने से पहले वे रक्षा मंत्रालय की संस्था डीआरडीओ में कार्यरत थे।वहाँ सैनिक अनुशासन में काम होता था।वे संगठन भी इसी अनुशासन से चलाते थे।

कांशीराम ने सेकेंड लाईन लीडरशिप को आगे किया और उन्हें विभिन्न जिम्मेदारी सौंपी।उन्होंने मायावती, सोनेलाल पटेल, बरखूराम वर्मा, आर.के.चौधरी, गाँधी आजाद आदि नेताओं पर भरोसा दिखाया और वे उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे मगर मायावती ने इन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी समझा और उनपर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का झूठा आरोप लगाकर पार्टी से बाहर कर दिया।मायावती हर उस व्यक्ति को सामने से हटाने लगीं जो उनका प्रतिद्वंद्वी बन सकता था।

मायावती को दौलत की इतनी भूख है कि वो पार्टी का टिकट तक बेचने लगीं।इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि कभी बसपा बेहद गरीब लोगों को टिकट देती थी आज धनाढ्य पैसा देकर टिकट खरीदने लगे।मायावती का ये फार्मूला एक दो चुनाव तक तो कारगर साबित हुआ मगर बाद में जनता ने उन्हें ठेंगा दिखाना शुरू कर दिया।आज ये आलम है कि गरीब और मध्यमवर्गीय नेता बसपा से टिकट लेने की सोचते भी नहीं हैं।अब बसपा के टिकट पर चुनाव लडना हार को सुनिश्चित करना हीं है।

कांशीराम ने अपने मिशन को पैसे से बिल्कुल अलग रखा था मगर मायावती ने दौलत के खातिर तमाम तरह के भष्टाचार किये।मायावती के भाई आनंद कुमार ने दोनों हाथों से दौलत कमाया।दो साल पहले विभिन्न जाँच टीमों ने आनंद कुमार की 400 करोड़ की संपत्ति जब्त कर ली थी।दिल्ली के पास नोएडा में आनंद कुमार ने सात एकड की जमीन उस समय कब्जाई थी,जब मायावती मुख्यमंत्री थीं।मायावती के भाई आनंद कुमार और उनकी पत्नी विचित्रा के पास तकरीबन 1350 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति है।

मायावती का लूटेरा भाई आनंद कुमार 1996 में नोएडा प्रशासन में सात आठ सौ रू. माहवार पर नौकरी करता था मगर जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो वह नौकरी छोडकर जमीन की खरीदफरोख्त करने लगा और कुछ हीं दिनों में वो करोडपति बन बैठा।कभी मायावती के घनिष्ठ सहयोगी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मायावती से बातचीत का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर उन्हें लगभग बेनकाब कर दिया था।मायावती उनसे पैसों की डिमांड कर रहीं थीं।

मायावती ने लखनऊ में दलित समाज के बडे लोगों की मूर्तियां लगवाने में बडा भष्टाचार किया।स्कूटर और मोटरसाइकिल के नंबरों पर पत्थरों से लदे ट्रकों की डिलीवरी दिखलाकर खूब पैसा कमाया गया।इस मामले की जाँच सीबीआई कर रही है और आज नहीं तो कल मायावती को भष्टाचार के मामले में जेल जाना तय है।

बसपा में मायावती के कार्यशैली के खिलाफ सुगबुगाहट कांशीराम के रहते हीं शुरू हो गई थी मगर बिमारी से जूझ रहे कांशीराम ने तब मायावती का हीं पक्ष लिया था।एक तो बीमार थे दूसरे मायावती पर पूरी तरह आश्रित भी हो गए थे।सबसे पहले मायावती की शिकायत कांशीराम के सबसे पूराने और विश्वसनीय साथी डा.मसूद अहमद ने कांशीराम से की।तब कांशीराम ने मायावती का हीं पक्ष लिया।मायावती ने डाँ.मसूद अहमद को पार्टी से हीं नहीं निकाला बल्कि सरकारी आवास से उनका सामान बाहर फेंकवा दिया था तब जनता ने मायावती का क्रोध पहली बार देखा था।2001 में बसपा के वरिष्ठ नेता और कांशीराम के बेहद खास आर.के.चौधरी को मायावती ने बेइज्जत कर पार्टी से बाहर कर दिया।इसी तरह बाबूराम कुशवाहा भी बाहर हुऐ थे।

2012 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था कि कुछ लोग मेरे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहें हैं।मैं मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हूँ और पूरे दिल से उनका अनुसरण कर रही हूँ।

लोकसभा चुनाव के पहले मायावती और अखिलेश यादव ने गठबंधन कर चुनाव लडा था मगर अपेक्षित परिणाम नहीं आने पर मायावती ने गठबंधन तोड दिया।जिस बसपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी गठबंधन करने पर बसपा को दस सीटें मिलीं।थोडी सफलता मिलने पर मायावती को भ्रम हो गया कि लोग बसपा से जुडने लगे हैं और बसपा अकेले अगला विधानसभा चुनाव जीत सकती है।इसी भ्रम में पडकर मायावती गठबंधन से अलग हुईं थीं मगर पहली बार विधानसभा चुनाव लड रही बसपा को लोगों ने आईना दिखला दिया है।मायावती का भ्रम शीसे की तरह चकनाचूर हो गया और अब वह भाजपा और सपा पर अनर्गल आरोप लगा रहीं हैं।

जिस दलित समाज पर उन्हें गुमान था,आरएसएस ने उसे पूरी तरह अपनी तरफ कर लिया है।दिन में सपने देखने वाली मायावती को पता हीं नहीं लगा कब जमीन उसके पैरों तले खिसक चुकी है।दौलत की चाह और अपने अहंकार के चलते मायावती ने कांशीराम के मिशन को सरेबाजार निलाम कर दिया।बसपा के संस्थापक कांशीराम हमेशा परिवारवाद से दूर रहे मगर मायावती ने अपने भाई-भतीजे को लाकर कांशीराम के सपने को चकनाचूर कर दिया है।निकट भविष्य में बसपा का पुनरूद्धार मुझे तो नहीं दिख रहा है, अगर आपको कोई उम्मीद नजर आ रही हो तो अवश्य मायावती को शुभकामनाएं दें।

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