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देवी

Bhola Tiwari Oct 26, 2020, 8:45 AM IST टॉप न्यूज़
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निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव

रांची  :  शरद नवरात्र समाप्त हो गया है। इस पर्व के अवसर पर नव दिनों तक देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी भारत ही नहीं सर्वत्र की आदिम देवता हैं, क्योंकि सभ्यता का आदि रूप सर्वत्र मातृसत्ता प्रधान रहा है।हरप्पा-मोहनजोदड़ो से बहुत पूर्व वह हमारे आदिम लोकायत संस्कृति में प्रवेश करती हैं, जहाँ से हमारे 'सामूहिक मन' का प्रारंभ होता है। उनका रूप सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता गया, मिट्टी के धूह और अनगढ़ पिंड, उपल ढेरी तथा प्रस्तर-खण्ड से लेकर त्रिकाल व्यापी निरंजना, पराशक्ति, त्रिपुरसुंदरी के रूप में। भारतीय मनीषा ने कर्मकांड, धर्म, दर्शन, साहित्य और कला के माध्यम से इस देवी के रूप को रूपं-रूपं-प्रतिरूपं विभु-अणु दोनों' आयामों में आविष्कृत किया है। देवी अपनी क्रियाशक्ति के 'संधिनी-संवित्-ह्लादिनी' तीनों रूपों में हमारे सामूहिक मन को निदेशित करती रही हैं। किन्तु हमारे समूहिक मन में सभ्यता के जन्म के बहुत पूर्व से देवी मातृमूर्ति के रूप में स्थित रही हैं।

'गोंडवाना प्रदेश' नर्मदा के पश्चिम में विंध्यारण्य और शोणांचल से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। 'गोंड' जो निषाद यानी ऑस्ट्रिक कुल की प्रतिनिधि जाति है इस क्षेत्र की मूल निवासी थे। आज भी इस भूभाग में ऑस्ट्रिक कुल की ही

जनजातियाँ निवास करती हैं। आज गोंडवाना से तात्पर्य उस भू-भाग से है, जिसमें शोण-नर्मदा का अंचल, ओड़िसा का गंजाम, झारखण्ड का उत्तरी और दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल, बिहार का रोहतासगढ़ और अंशतः पश्चिम बंगाल के दामोदर घाटी का अंचल आदि आते हैं। भारतीय देवी का प्रथम अवतरण श्यामावतरण था। यह अवतरण इसी गोंडवाना प्रदेश में हुआ था।आज भी हम आरती में 'ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी' गाते हैं। इसी गोंडवाना प्रदेश की सीमा पर विंध्यारण्य में 'विंध्यवासिनी' के रूप में महामातृका का निवास है जो सम्भवतः देश के आदिम शक्तिपीठों में से एक है। यहीं पर आदिम निषाद के मानस में देवी के महा अवतरण के प्रथम स्पंदन की अनुभूति, अत्यंत अनगढ़ रूप में सही, हुई।

आदिम निषाद ने देवी को मृत्यु, यंत्रणा, रोग, शोक की अधिष्टात्री के रूप में देखा। उस समय संपूर्ण विंध्यारण्य महिषारण्य था। इन निषादों ने ही महिष मर्दन कर जंगली महिष को पालतू बनाया। इसी विंध्यारण्य गोंडवाना अरणा भैंसों का अंचल था और महिषमर्दिनी देवी के मिथक का अंकुरण यहीं निषाद कल्पना में हुआ होगा। आदिम निषाद ने कहीं पर महिष को मित्रभाव से देखा और देवता मान लिया, जैसे संथालों के 'टांड बोरो' और कहीं शत्रु भाव से देखा और असुर मान लिया और एक शक्ति की कल्पना की जो इसका मर्दन करे। इस शक्ति को उन्होंने 'चंडी' कहा। मुंडा जनजाति 'चांडीबोड्न' की पूजा करते हैं। उरांव 'चांड़ी' देवी की पूजा करते हैं। संथाल समुदाय के लोग नवरात्र के दौरान दासायं पर्व मनाते हैं। इस पर्व में देवी जाहेर-एरा की पूजा करते हैं। वे इस इन्हें शक्ति और लक्ष्मी कर देवी मानते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के गाँवों में आज भी चण्डी थान मौजूद हैं। संथाल गाँवों में चण्डी थान की तरह जाहेर थान होते हैं। ऐसा लगता है कि आदिम निषाद ने महिष मर्दन के लिए महिषमर्दिनी चण्डी की कल्पना की होगी और इस कल्पना पर कालांतर में आर्यों की दशभुजा शुक्ल वर्णा दुर्गा का आरोपण हुआ।

  सांस्कृतिक विकास जब कृषि जीवी स्तर पर पहुँचा तो उसमें देवी के 'महीमाता' रूप की कल्पना उद्भूत हुई। इस कल्पना का चरम विकास 'गौरी', 'अन्नपूर्णा', 'शाकम्भरी दुर्गा' के बिम्बों में पुराणकारों ने उपस्थित किया। साहित्य में उस देवी को ही असुरों की देवी माया और देवों की माता अदिति माना गया है। आगे चलकर इसे 'श्री' या लक्ष्मी कहा जाने लगा।

अथर्वेद से पूर्व देवी के श्वेत और श्याम रूपों का उल्लेख 'श्रीसूक्त', 'उषासूक्त', एवं' 'रात्रिसूक्त' में हुआ है। ये देवी के मूलबिम्ब को उपस्थित करते हैं। इस प्रकार, देवी के पौराणिक कल्पना का मूल उत्स जहाँ एक ओर ऋग्वेद के सूत्रों में है, वहीं दूसरी ओर लोकवार्त्ता में। दशभुजी कांचनवर्णा अग्निवर्चसा दुर्गा के बिम्ब का विकास एक विमिश्रित संस्कारगत घटना है। द्राविड़ों की सिंहवाहिनी मातृका पर आर्य प्रतिभा ने आलोकवर्णी सौन्दर्यमयी जाज्ज्वल्यमान उषा का आरोपण कर दिया है। उषा का दशदिशाव्यापी 'विस्तार-भाव' और 'प्रभा-भास्वरता-भाव' से शुक्लवर्णा दशभुजी दुर्गा का विकास हुआ। इसका संकेत एक लोकगीत इन पंक्तियों में भी मिलता है-

    " कवन देवी पहिरिले रतन घंघरिया

               त कवने दखिना रंग छींटिया हो ना

       दुरगा त पहिरिले रतन घंघरिया

               चंडी पहिरिले दखिना रंग छींटिया हो ना।"

वह कौन-सी देवी है जो रतन घंघरा पहने छमछम चलती है और वह कौन-सी देवी है जो दक्षिणी नीलांबरी में आवेष्टित है। एक है स्पष्ट, व्यक्त और खुली हुई और सगुण, दूसरी है गुह्य, ढंकी हुई और रहस्यमय। इस गीत में यह बात अत्यंत साधारण ढंग से कही गयी है कि यह दशभुजी दुर्गा अपने मूल रूप में आर्यों की अरुणा या उषा ही है।

देवी के पौराणिक रूप का चरम विकास मिलता है मार्कण्डेय पुराण के सप्तशती-श्लोकों वाले अंश में जिसे 'चण्डी' या 'दुर्गा सप्तशती' कहते हैं। देवी के पौराणिक रूप काली, दुर्गा, पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी आदि इतना परिचित है कि इसके विषय में कुछ कहने जी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि भारत में देवी का रूप हमारे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ सौम्यतर, सुन्दरतर और सूक्ष्मतर होता गया है।

   (यहआलेख कुबेर नाथ राय के निबंधों पर आधारित है।)

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