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पीपल....

Bhola Tiwari Oct 22, 2020, 7:05 AM IST कॉलमलिस्ट
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कबीर संजय

नई दिल्ली  : जब मैं छोटा बच्चा था। मेरे पैर छोटे थे। दूरियां बड़ी थीं। लेकिन, मैं कहीं भी जाता था। वो मुझे दूर से देखता रहता था। उसके होने से मुझे आश्वस्ति होती थी। मैं भी उसे दूर से देखता रहता था। फिर जब घर की याद आती थी तो मैं सीधे उसकी तरफ ही चल पड़ता था। चाहे कहीं से भी हो, धीरे-धीरे मैं उसके पास पहुंच जाता। वो मेरे घर के ऊपर तना हुआ था। खूब विशाल। इतना कि लगता कि जैसे मेरे घर पर उसने अपनी छाया कर रखी हो। मैं उसे दूर से किसी झंडे की तरह ही देखकर पहचान जाता। हां, मेरे घर वाला पीपल यही है। 

पीपल का वह पेड़ मुझे मेरे घर की पहचान कराता था। उसके होने से मुझे हमेशा यह भरोसा बना रहता था कि मैं कहीं भटकने वाला नहीं है। मैं खेलने के लिए कई बार दूर भी निकल जाता। एकांतप्रिय मन न जाने कहां भटकता फिरे। लेकिन, उसे देखकर मैं घर वापस आ जाता। उसके आस-पास कई सारे पेड थे। वो अकेला नहीं खड़ा था। खुद मेरे घर में नीम के तीन, जामुन का एक, जंगल जलेबी का एक, बेल का एक, अनार के दो, शरीफे का एक और अमरूद के कम से कम तीन पेड़ मौजूद थे। इसके अलावा, कनेर और करौंदा के भी पेड़ थे। पीपल का वह पेड़ उन सबके अभिभावक जैसा खड़ा था। 

उनमें सबसे ज्यादा विशालकाय और सबसे ज्यादा घना। उसका मोटा तना मेरे जैसे कई बच्चों के गोल घेरे में पकड़ने में भी नहीं आने वाला था। इसीलिए हमारी कभी हिम्मत उस पीपल के पेड़ पर चढ़ने की नहीं हुई। चढ़ने के लिए नीम के पेड़ मेरे प्रिय थे। उनके ऊपर बैठकर मैं कई बार चुप-चाप अपने घर की गतिविधियां देखा करता था। कौन आ रहा है, कौन जा रहा है। कभी नाराज होता तो जाकर किसी डाल पर बैठ जाता। क्या किसी को मेरी याद आएगी। कोई मुझे खोजेगा। 

लेकिन, धीरे-धीरे मैं बड़ा हो रहा था। लोगों को रहने के लिए ज्यादा जगहों की जरूरत पड़ती जा रही थी। उन्हें पहले के कच्चे घर अब कम रास आने लगे थे। उन्हें पक्के मकानों की जरूरत थी। पीपल के ढेर सारे साथी संगाती एक-एक करके उसका साथ छोड़ गए। इसके बाद भी वो अपनी जगह पर वैसे ही शान से खड़ा था। उसके तने के ठीक नीचे एक छोटा सा मंदिर था। चबूतरा था। जहां हर मंगलवार और शनिवार को आसपास के ही लोग पूजा करते थे। भगवान की इस पूजा ने उसकी जान बचाई हुई थी। 

मुझे याद है कि जब मैं छोटा था, उस समय रात को छत पर सोने का बहुत चलन था। दिन भर की तपती छत पर शाम के समय ही पानी डाल दिया जाता था। ताकि, वो थोड़ा ठंडी हो जाए। फिर रात के समय पूरा का पूरा परिवार छत पर कुछ कुछ दूरी पर दरी या कथरी बिछा लेता था। कई बार रात के समय भी गरम-गरम लू वाली हवा चलती रहती। लेकिन, धीरे-धीरे हवा ठंडी हो जाती। उसी हवा में हम सोते। कई बार मच्छरों की वजह से नींद हराम हो जाती। 

तो हमारी अम्मा हाथ के पंखे को हांकती हुई पेड़ों की तरफ देखते हुए पेड़ों को अपनी पत्तियां हिलाने-डुलाने के लिए आग्रह करती। कुछ तो हवा चले। लेकिन, किसी को हमारे आग्रह की परवाह कहां। कई बार रात में सोते समय ही आंधी आ जाती और हम बिस्तर समेटकर नीचे भागते। कई बार आलस और नींद इतना हावी होती कि आंधी के समय भी चादर मुंह पर लपेटकर पड़े रहते कि कुछ देर में धूल शांत हो जाएगी। लेकिन, तभी आंधी के साथ ही मोटी-मोटी बूंदे पड़ने लगतीं और हर किसी को तुरंत ही भागना पड़ता। हमारी इस हरकत पर पीपल का वो पेड़ जोर-जोर से तालियां बजाता। उसके पत्तों की तड़-तड़ हमें दूर से सुनाई पड़ती। 

कभी जाड़े की किसी रात जब अंधेरा पूरी तरह से शांत होता था, तब तेजी से चलती हवाएं पीपल के पत्तों से होकर गुजरती थी। सांय-सांय की आवाज आती थी। पीपल का पेड़ आसमान में किसी दैत्य की तरह सिर उठाए दिखता था। रात के समय कभी नींद खुल गई और बाहर पेशाब करने जाना होता तो मैं उसकी तरफ देखने से बचता था। कहते थे कि रात के समय पीपल के पेड़ पर भूतों-पिशाचों की मीटिंग होती है। वे तय करते हैं कि किस दिन किधर का रुख करना है। मैं चुप-चाप डरते-कांपते हुए किसी तरह से नजरे बचाते हुए बाहर जाता और फिर लौटकर चुपचाप अपने बिस्तर में आकर घुस जाता। 

फिर जब हम कुछ बड़े हुए तो उसने दूसरी ही मुसीबतें खड़ी करनी शुरू कर दी। उसकी ऊंची डालियों पर ढेर सारे गिद्ध बैठा करते थे। मैं अपनी छत पर से पतंग उड़ाता था तो अक्सर ही मेरी पतंग उसकी ऊंची डालियों में फंस जाया करती थीं। कई बार ऐसा भी होता था कि मैं अपनी पतंग को आसमान में खूब ऊंचाई पर ले जाता, मेरी पतंग खूब संतुलित होकर हल्के-हल्के झूमते हुए अपनी खुशी प्रगट कर रही होती। लेकिन, तभी पीपल के पेड़ से उड़ान भरने वाले गिद्ध मेरी पतंग की डोर अपने पंखों में लपेट ले जाते। उनके पंखों में फंसकर पहले तो दूर तक मेरी पतंग जाती, फिर डोर टूट जाती। मेरी पतंग को न जाने वे कहां लेकर जाकर छोड़ देते। उन नामुराद गिद्धों को मैंने हर दिन सौ-सौ गालिया दी हैं। 

मुझे वो दिन आज भी याद है जब हमारे मोहल्ले में पहली बार टीवी आई। पहले ही कह चुका हूं कि ढेर सारे पेड़ों को काटकर ढेर सारे लोगों के रहने की जगह बनाई जा चुकी थी। ढेर सारे मकान बने हुए थे। अब वहां पर पेड़ों से पहचान नहीं थी, मकान ही मकान दिखते थे। एक डाक्टर साहब थे। मरहम पट्टी करते थे। प्रैक्टिस अच्छी थी। डिग्री का तो पता नहीं, लेकिन सब उन्हें डाक्टर साहब ही कहते थे। कहा जाता था कि वो पंजाबी है। पता नहीं क्या मुसीबत रही होगी कि वे हमारे मोहल्ले में रहने के लिए चले आए। 

उनके यहां पहली बार टेलीवीजन आया। शायद उनके किसी रिश्तेदार उन्हें दिया था। उस टेलीवीजन को लगाने की कवायद शाम के चार-पांच बजे से ही शुरू हो गई। घर के बाहर ही एक मेज पर टीवी रख दिया गया। उसे बिजली दी गई। लेकिन, उसमें खिर-खिराहट के अलावा कुछ नहीं आती रही। लेकिन, उस खिर-खिराहट को देखने के लिए भी पूरे मोहल्ले के लोग खड़े हो गए। हम बच्चे तो उस ब्लैक एंड व्हाइट टेलीवीजन से निकलने वाली नीली रोशनी को किसी चमत्कार की तरह देखते रहते। कोई कहता कि अभी बारिश हो रही है। बारिश के बाद टीवी आएगी। घंटों इंतजार के बाद भी उस सिगनल नहीं मिले। आसपास के सबसे ऊंची जगह पर एंटीना बांधने के बावजूद।

अगले दिन इससे निकलने का भी उपाय सूझा। मोहल्ले के नौजवान लोगों ने बांस की एक बड़ी सी लग्गी में एंटीना बांध लिया और उसे ले जाकर पीपल की सबसे ऊपर डाल पर बांध दिया। उसके बाद टीवी पर जब चैनल सेट करने की कोशिश की गई तो उसमें यदा-कदा एक-दो चित्र दिखने लगे। काफी मशक्कत के बाद कुछ चीजें दिखने लगीं। कृषि दर्शन भी देखने के लिए लोग घंटों बैठे रहा करते थे। और रविवार के दिन पिक्चर आती तो मेला लग जाता। चित्रहार भी देखने का पता नहीं कैसा उत्साह था। हमारी हालत का जरा अंदाजा लगाइये भला कि ये वो जमाना था कि जब रुकावट के लिए खेद है का बोर्ड भी लोग एक-एक घंटे तक चुपचाप धैर्य के साथ टकटकी लगाए हुए देख लिया करते थे।  

फिर जब वीडियो आया तब भी उसी पीपल की छांव में कई बार वीडियो लगा होता। रात भर जागकर लोग तीन फिल्में देखते थे। रात नौ बजे वीडियो पर पिक्चर शुरू होती तो आखिरी पिक्चर समाप्त होते-होते सुबह का धुंधलका होने लगता। मुझे अभी भी याद है कि उन तीन फिल्मों में नगीना बड़ी लोकप्रिय थी। लेकिन, जब उसमें बीन की धुन बजती तो लोग आस-पास चिंहुककर निगाह रखने लगते कि कहीं से सांप न निकल आए। उनमें बड़ा दृढ़ विश्वास था कि बीन की आवाज से आकर्षित होकर सांप वहां पर आ सकता है। उनमें से किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि सांप लगभग बहरा होता है और उसके सुनने का यह तरीका ही नहीं है। 

पीपल के उस पेड़ पर गिलोय की ढेर सारी जटाएं झूलती रहती थीं। हम उसे गुरुच कहा करते थे। तब बाबा रामदेव का पदार्पण नहीं हुआ था। लेकिन, हमारे बड़े-बूढ़े उन लताओं का औषधीय महत्व जानते थे। किसी को बुखार होता तो गुरुच को उबालकर उसका पानी पिलाया जाता था। उसकी भाप दी जाती थी। हमारे घर के नीम के पेड़ पर भी गिलोय की ऐसी ही लतर चढ़ी हुई थी। 

लेकिन, पता है कि न कि लोगों की जरूरतें बढ़ती जाती हैं, उन्हें रहने के लिए ज्यादा मकान चाहिए होते हैं। पक्के मकान चाहिए होते हैं। तो मेरा वह नीम का पेड़ तब तक नहीं रहा था। वो इन्हीं इच्छाओं के आगे शहीद हो चुका था। 

और पीपल का पेड़ अपने सारे साथी-संगातियों को खो चुके बूढ़े-बुजुर्ग की तरह जर्जर आज भी वहीं खड़ा है। मकानों की जरूरतों ने उसकी कई भुजाओं की बलि ले ली। 

लेकिन, मायूस सा आज भी वो खड़ा है। क्या अब भी जब कभी रात होती है तो वह वैसे ही अपने पत्तों से तालियां बजाता है। 

क्या अब भी जब जाड़े की रातों में शरीर को काटने वाली हवाएं चलती हैं तो अपने घरों में दुबके लोगों की वैसे ही चिंताएं करता है। 

क्या पता....

( तस्वीर मेरे वाले पीपल की नहीं )

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