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बुद्धम् शरणम् गच्छामि

Bhola Tiwari May 23, 2019, 7:09 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

बिम्बिसार मगध के राजा थे । उन्होंने हर्यक वंश की नींव डाली थी । वे बुद्ध के समकालीन , बुद्ध के अनुगामी , संरक्षक और मित्र सब कुछ थे । बिम्बिसार ने विवाह नीति को अपना कर अपने साम्राज्य का ज्यादातर विस्तार किया था । उन्होंने कोशल प्रदेश के राजा प्रसेनजीत से अपनी बहन का व्याह किया था । साथ हीं प्रसेनजीत की बहन महाकोशला से भी शादी की थी । प्रसेनजीत ने इस विवाह में विम्बिसार को दहेज में काशी का क्षेत्र दान में दिया था । यह दान महाकोशला के सौंदर्य प्रसाधन में होने वाले खर्च के निमित्त था । बिम्बिसार ने वैशाली के शासक चेतक की बेटी चेलना से भी शादी की थी । वैशाली भी उसके राज्य का हिस्सा हो गया था । इसी प्रकार उसने खेमा , सीलव और जयसेना से भी शादी की थी । बदले में उनके राज्य का अहम हिस्सा पाया था । उसने वैशाली की नगरवधू आम्रपाली को भी अपने रंगमहल में रखा था । आम्रपाली से एक पुत्र भी हुआ था , जो बड़ा होकर आयुर्वेदाचार्य जीवक के नाम से मशहूर हुआ । बिम्बिसार ने जीवक को महात्मा बुद्ध के देख रेख के लिए नियुक्त किया था । जीवक ने बुद्ध की पुरानी कब्ज की समस्या जड़ से खत्म कर दी थी ।

आम्रपाली के जैविक माता पिता का कुछ अता पता नहीं था । वह आम के बाग में नवजात शिशु के रुप में एक किसान दम्पति को मिली थी । किसान दम्पति ने उसका लालन पालन किया और नाम रखा - आम्रपाली । आम्रपाली के बारे में बताते हैं कि उसके जैसा अतीव सुंदरी आज तक नहीं हुई । उसकी सुंदरता के चर्चे पूरे उत्तर भारत में थी । दूर दूर से युवक उससे शादी करने के लिए आने लगे थे । कई राजा महाराजाओं ने भी उसके पास विवाह संदेश भिजवाया था। आम्रपाली किसी की भी न हो सकी । वह जिसकी होती उसे अन्य का कोप भाजन होना पड़ता । बेकार का खून खराबा होता । इसलिए वह सर्व सम्मति से वैशाली की नगर वधु बना दी गयी । नगर वधू जो सबकी हो , पर उसका कोई न हो । वह गणिका बना दी गयी । ऐसा करते समय आम्रपाली की किसी ने मंशा नहीं पूछी । बिना उसकी सम्मति के उसे सर्व भोग्या बना दिया गया ।

बिम्बिसार ने भी आम्रपालि के रुप के चर्चे सुने । वे भी वेश बदलकर आम्रपाली के अंतःपुर में जा पहुंचे । बिम्बिसार एक कुशल संगीतज्ञ भी थे । आम्रपाली भी रुप यौवन की स्वामिनी होते हुए एक कुशल नृत्यांगना भी थी । बिम्बिसार के संगीत के धुन पर वह इस तरह नाची की पूरी प्रकृति नाच उठी । दोनों का प्रेम शिखर पर पहुंचा । पहली बार आम्रपाली का हृदय किसी के लिए धड़का था। बिम्बिसार मगध लौट गए । बिम्बिसार दुबारा एक सैनिक के रुप में आम्रपाली के पास पहुंचे । वह सैनिक जो घायल था । आम्रपालि ने उसकी सेवा सुश्रुषा की । सैनिक ठीक हो गया । अबकी बार बिम्बिसार अकेले नहीं लौटे । साथ में आम्रपाली भी थी । आम्रपाली के नाम से नगर वधू का विशेषण खत्म हो गया था । वह बिम्बिसार के अंतःपुर की मल्लिका बन गयी थी । साथ हीं साथ वह उसकी हृदय स्वामिनी भी बन गयी थी ।

बिम्बिसार का पुत्र था अजातशत्रु । उसे एक गणिका को राजकुल की बधू बनाना रंच मात्र भी नहीं भाया । वह क्रोधित हो उठा । इस क्रोधाग्नि में घी डालने का काम किया बुद्ध के प्रबल प्रतिद्वंदी व उनके चचेरे भाई देवदत्त ने । वह नहीं चाहता था कि बिम्बिसार बुद्ध को राज्याश्रय प्रदान करे । अजात शत्रु ने बिम्बिसार को कारागार में डाल दिया । आजातशत्रु स्वंय राजा बन बैठा । उसने अपना राज्य विस्तार उत्तर पश्चिम की तरफ किया । पूर्वोत्तर में राज्य का विस्तार बिम्बिसार पहले हीं कर चुका था । अजातशत्रु भी बौद्ध था । लेकिन उसने देवदत्त के कहने में आकर अपने पिता बिम्बसार पर काफी अत्याचार किए । पिता को कारागार डालने में अजातशत्रु का भी हित था । वह नहीं चाहता था कि बिम्बिसार के मरने के बाद उसका बड़ा भाई दर्शक राजा बने । बिम्बिसार से कारागार में मिलने के लिए केवल अजातशत्रु की मां महाकोशला हीं जा सकती थी । महाकोशला पति के लिए भोजन छुपाकर ले जाने लगी । जब अजातशत्रु को पता चला तो उसने मां की कड़ी निगरानी करनी शुरु कर दी । अब बिम्बिसार को भोजन मिलना बंद हो गया । महाकोशला ने इसका तोड़ निकाला । वह नहाकर अपने शरीर में शहद लगाकर पति से मिलने जाने लगी । इस शहद को चाटकर बिम्बिसार जीवित रहने लगा ।

एक दिन अजातशत्रु को गुप्तचरों से पता चला कि बिम्बिसार ने अपने जीवन काल में हीं अजातशत्रु को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था । यह सुन अजातशत्रु के मन में बहुत ग्लानि हुई । वह स्वंय एक लोहे का दण्ड लेकर पिता की बेड़ियों को काटने कारागार की तरफ चल पड़ा । अजातशत्रु के आने की सूचना बिम्बिसार को भी मिली । उसे अजातशत्रु के हृदय परिवर्तन के बारे में कुछ नहीं पता था । उसने किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत हो आत्महत्या कर ली । पति की मौत की सूचना पाकर महाकोशला के भी प्राण पखेरु उड़ गये । बिम्बिसार और महाकोशला की मृत्यु की खबर पाकर प्रसेनजीत को बहुत दुःख हुआ । उसने अपने जीजा व बहन की मौत का बदला लेने के लिए अपने हीं भांजे अजातशत्रु पर चढ़ाई कर दी । प्रथमतः तो प्रसेनजीत हार गया । उसे भागकर श्रावस्ती जाना पड़ा । द्वितीय क्रम में प्रसेनजीत की जीत हुई । वह अपने भांजे का कोई अनिष्ट नहीं चाहता था । वैसे भी अजातशत्रु पाश्चाताप की अग्नि में जल रहा था । अबकी बार प्रसेनजीत ने अपनी बेटी की शादी अजातशत्रु से कर दी । दहेज में फिर काशी को अपनी बेटी के सौंदर्य प्रसाधन के लिए दान दे दिया ।

प्रसेनजीत की भी स्थिति बिम्बिसार की तरह हीं हुई । उसके स्वंय के बेटे विडूडभ ने सेनापति दीर्घ कारायण के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया । उसने धोखे से पिता को कैद कर लिया । मां मल्लिका के बीच बचाव करने से उसकी मुक्ति तो हुई , पर उसे देश निकाला की सजा हुई । देश निकाला की सजा मल्लिका ने भी ली ताकि पति के साथ रह सके । विडूडभ ने माता पिता के पाथेय ( मार्ग व्यय ) के लिए एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएं दीं । प्रसेनजीत का स्वाभिमान इसके लिए तैयार नहीं था । उसने मल्लिका से उस मुद्रा को वापस करने को कहा । उसने पत्नी से कहा था - " तुम माली की बेटी हो । तुम्हें कुसुमों की माला बनाने की कला आती है । हम माला बनाकर उसे बेचकर अपना पाथेय पूरा कर लेंगे ।" व्यवहारिक मानस वाली पत्नी ने वे मुद्राएं नहीं लौटायीं । नाना प्रकार की ऊंच नीच की बातें समझाकर उसने पति को वह स्वर्ण मुद्राएं साथ ले जाने के लिए मना लिया । प्रसेनजीत का शरीर बूढा हो गया था । वह मार्ग की कठिनाइयों को झेल नहीं सका । एक दिन वह धर्मशाला में सोया तो सोया हीं रह गया । पत्नी मल्लिका भी उसके शव पर वहीं ढेर हो गयी थी । दोनों पति पत्नी बौद्ध मतावलम्बी थे । वे दोनों एक साथ बुद्धम् शरणम् गच्छामी हो गये ।

आम्रपाली भी बिम्बिसार की मौत के बाद बौद्ध भिक्षुणी बन गयी थी ।

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