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सहिष्णुता शक्ति का पर्याय

Bhola Tiwari Oct 17, 2020, 6:01 AM IST कॉलमलिस्ट
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कामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव निरंकुश

रांची : सहिष्णुता है-असहयोग। विरोधी के साथ न प्रवृत्ति करो, न निवृत्ति करो, किन्तु उपेक्षा करो। क्रोध करने वाले के साथ क्रोध नहीं, उसकी उपेक्षा करो। सहिष्णुता का एक अर्थ है- सहन करके सुधार के लिए अवसर देना। किसी व्यक्ति की तुच्छता को सहन करना उसको बिगाड़ना नहीं, वरन् उसे सुधरने का अवसर देना है। प्रश्न है कि क्या अन्याय को भी सहन करें ? इसका उत्तर है- अन्याय को सहन मत करो पर उसका प्रतिकार सहिष्णुता से हो। सहिष्णुता का एक अर्थ है- मानसिक शांति। विरोधी विचार व परिस्थितियां व्यक्ति को अशांत करती है। विपरीत विचारों, स्थितियों व व्यवस्थाओं को सहन करें। इससे मानसिक शांति भंग नहीं होगी और यदि व्यक्ति शांत है तो विश्व शांति भी संभव है।

सहिष्णुता की आवश्यकता

संयोग-वियोग की इस दुनिया में सहिष्णुता ही त्राण है। विरोधी व्यक्तियों, विरोधी विचारों, विरोधी परिस्थितियों के बीच यदि व्यक्ति सदैव प्रतिक्रिया ही करता रहेगा तो अपनी क्षमताओं का उपयोग वह विकास के लिए कब करेगा? इसलिए सहिष्णुता प्रतिक्रिया इसके लिए आवश्यक है।सुविधाओं के विकास के साथ व्यक्ति की सहनशीलता भी समाप्त हो गई है। व्यक्ति में धैर्य नहीं, शक्ति नहीं, सहन करने की क्षमता नहीं, अधीरता है, इसलिए भी सहिष्णुता की अपेक्षा है। सुविधावाद जो अन्तत: हिंसा की ओर धकेलता है, सहिष्णु बनकर ही उससे बचा जा सकता । सहिष्णुता के विकास से ही अनुशासन का विकास संभव है। अनुशासनहीनता की समस्या किसी एक राष्ट्र की नहीं, वरन् पूरे विश्व की है। सहिष्णुता के विकास से अनुशासनहीनता समाप्त होती चली जाएगी। सहिष्णुता व्यक्ति में शक्ति का वर्द्धन भी करेगी जो अन्तत: उसे समता के आदर्श तक पहुंचा सकेगी।

       सहिष्णुता का अर्थ है सहन करना और असहिष्णुता का अर्थ है सहन न करना। सभी यह जानते हैं कि सहिष्णुता आवश्यक है और चाहते भी हैं कि सहिष्णुता का विकास हो। विचार इस पर करना है कि कहां अवरोध है ? सहिष्णुता एक भावनात्मक शक्ति है। भाव इन्द्रिय चेतना और मन से परे होता है। मन भाव से संचालित होता है और इन्द्रियां भी भाव से संचालित होती है। भाव सबसे ऊपर है। जो व्यक्ति सहिष्णुता का विकास करना चाहे उसे अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। जब सहन करने की शक्ति कम लगे तो सोचना चाहिए कि कहीं मेरे शरीर के अवयवों में कोई विकृति तो नहीं हुई है, कोई दोष तो नहीं आया है ? उसे वह भोजन नहीं करना चाहिए, जिससे अग्नि तत्व का उद्दीप्न हो, जिससे सहन करने की शक्ति घट जाए और वासना बढ़ जाए। आहार का विवेक आवश्यक है। आहार में वायु और अग्नि का संतुलन होना चाहिए। अग्नि तत्व को बढ़ाने वाला आहार न हो और वायु तत्व की अति करने वाला आहार न हो। 

       सहिष्णुता केवल उपदेश से नहीं बढ़ेगी। तत्व विद्या के अनुसार हमारी पांच अंगुलियां- कनिष्ठा जल तत्व, अनामिका पृथ्वी तत्व, मध्यमा आकाश तत्व, तर्जनी वायु तत्व और अंगुष्ठ अग्नि तत्व की प्रतीक हैं। इनके योग से भी असहिष्णुता को कम किया जा सकता है। जब यह लगे कि सहन करने की शक्ति कम है तब हम यह प्रयोग करं। जल तत्व अग्नि तत्व को शांत करने वाला है, उत्तेजना को शांत करने वाला है। अगर इसका आधा-पौन घंटा प्रयोग करं तो सहिष्णुता की शक्ित में काफी अंतर आ सकता है। लोग कहते हैं कि दिमाग गर्म हो गया, दिमाग ठंडा क्यों नहीं रहा? कारण स्पष्ट है कि अग्नि तत्व बढ़ गया, दिमाग गर्म हो गया। दर्शनकेन्द्र, ज्योतिकेन्द्र, शांतिकेन्द्र और ज्ञानकेन्द्र- ये चार मुख्य केन्द्र हैं, जहां ध्यान कर हमार नकारात्मक भावों- असहिष्णुता, अहंकार, कपट, लोभ, घृणा, भय, अतिभय, वासना, का परिष्कार किया जा सकता है। परिष्कार करने के ये साधन हैं। ध्यान का एक महत्वपूर्ण प्रयोग है सहिष्णुता की अनुप्रेक्षा, जो बहुत प्रचलित है। उसका भी हम प्रयोग कर सकते हैं।

        सहनशीलता काशाब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व 

सहिष्णुता है। स्वयं के विरुद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार करना असहिष्णुता है। बताया जाता है कि सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को दंभी या अहंकारी बनाती है। 

       अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है। सहिष्णुता जीवन शक्ति का पर्याय है। आज हर छोटी बड़ी बातों पर उत्तेजना , आक्रोश , हिंसा के परिदृश्य व्याप्त हैं। प्राचीन काल और मध्य युग में अहिंसा और सहिष्णुता पर जो जीवन बुद्ध , महाबीर ने जिया उसी को नई इबारत में हमें जीना है। किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी पक्ष द्वारा हिंसक मार्ग के अनुसरण को उन्होंने यह कह कर नकारा कि सात्विक दृष्टि से जब सब एक ही परमात्मा के अंश हैं ,आस्था एक ही है तो फिर विद्वेष , प्रतिहिंसा और प्रतियोगिता क्यों ? जिस समाज के पास वेदवाणी से लेकर गांधी तक अहिंसावादी विचारों की धरोहर हो , वहां इतनी असहिष्णु ता और हिंसा क्यों ?

        दूसरे के प्रति असहिष्णुता और वैर भाव देखनेवाला व्यक्ति समाज का अहित बाद में और अपना अहित पहले करता है। मन में शान्ति और आसुरी तत्व दोनों एकसाथ रह ही नहीं सकते। हिंसात्मक विचार और विकार मन से शान्ति को उखाड़ कर अपना स्थान और सामान्य बनाते आए है।

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