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11 देवी मंदिर जहां नवरात्र में दर्शन करने से माता भरती हैं भक्तों की झोली

Bhola Tiwari Oct 17, 2020, 5:21 AM IST टॉप न्यूज़
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नई दिल्ली : देवी मां के दर्शन करने के लिए किसी दिन विशेष की जरूरत नहीं होती बस श्रद्धा चाहिए लेकिन नवरात्र को खास माना गया है। बात चाहे वासंतिक नवरात्र की हो या फिर शारदीय। इन दिनों में मां के दर्शन और पूजन से विशेष फल मिलता है। आज हम माता रानी के कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां शारदीय नवरात्र में मां की विशेष कृपा पाने के लिए भक्‍तों की भारी भीड़ लगी रहती है। इस नवरात्र तीर्थयात्रा की योजना बना रहे हैं तो ये 11 स्थान ऐसे हैं जहां जाकर आप अपनी मुरादों की झोली भर सकते हैं।

1. मां वैष्णो का पावन दरबार

जम्मू में स्थित त्रिकूट पर्वत पर मां वैष्णो का निवास है। यहां माता वैष्णो देवी लक्ष्मी, सरस्वती और काली के साथ विराजमान हैं। कलियुग में माता वैष्णो का दर्शन बड़ा ही पुण्यदायी माना गया है। भगवान श्रीराम ने त्रेतायुग में देवी त्रिकूटा जिन्हें माता वैष्णो कहते हैं उन्हें इस स्थान पर रहकर कलियुग के अंत तक भक्तों के कष्ट दूर करने का आदेश दिया था। उस समय से देवी अपनी माताओं के संग यहां वास करती हैं और भगवान के कल्कि अवतार का प्रतीक्षा कर रही हैं। नवरात्र में माता के इस दरबार में दर्शन कर पाना बड़े ही सौभाग्य से होता है।

2. प्रसिद्ध चमत्‍कारी धाम मां पीतांबरा देवी 

मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित मां पीतांबरा सिद्धपीठ है। इसकी स्‍थापना 1935 में स्‍वामीजी ने की थी। यहां मां के दर्शन के लिए कोई दरबार नहीं सजाया जाता बल्कि एक छोटी सी खिड़की है, जिससे मां के दर्शन का सौभाग्‍य मिलता है। यहां मां पीतांबरा देवी तीन प्रहर में अलग-अलग स्‍वरूप धारण करती हैं। यदि किसी भक्‍त ने सुबह मां के किसी स्‍वरूप के दर्शन किए हैं तो दूसरे प्रहर में उसे दूसरे रूप के दर्शन का सौभाग्‍य मिलता है। मां के बदलते स्‍वरूप का राज आज तक किसी को नहीं पता चल सका। इस इसे चमत्‍कार ही माना जाता है। यूं तो हर समय ही यहां भक्‍तों का मेला सा लगा रहता है लेकिन नवरात्र में मां की पूजा का विशेष फल बताया गया है। कहा जाता है कि पीले वस्‍त्र धारण करके, मां को पीले वस्‍त्र और पीला भोग अर्पण करने से भक्‍त की हर मुराद यहां पूरी होती है।


3. अद्भुत रहस्‍यमयी मां त्रिपुर सुंदरी 

बिहार के बक्‍सर में तकरीबन 400 साल पहले ‘मां त्रिपुर सुदंरी’ मंदिर का निर्माण हुआ था। कहा जाता है कि इसका निर्माण तांत्रिक भवानी मिश्र ने किया था। यहां मंदिर में प्रवेश करते हैं अद्भुत शक्ति का आभास होता है। साथ ही मध्‍य रात्रि में मंदिर परिसर से आवाजें आनी शुरू हो जाती हैं। पुजारी बताते हैं कि यह आवाजें मां की प्रतिमाओं के आपस में बात करने से आती हैं। हालांकि इस मंदिर से आने वाली आवाजों पर पुरातत्‍व विज्ञानियों ने कई बार शोध भी किया गया लेकिन उन्‍हें कुछ नहीं मिल सका। इसके बाद यह शोध भी बंद कर दिए गए। वासंतिक हो या शारदीय यहां साधकों की भीड़ लगी रहती है।

4. दुर्गा परमेश्‍वरी मंदिर

मंगलूरू स्थित दुर्गा परमेश्‍वरी मंदिर को एक खास परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां पर अग्नि केलि नाम की एक परंपरा के तहत भक्‍त एक-दूसरे पर अंगारे फेंकते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा आज से नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही है। जानकारी के अनुसार ये खेल दो गांव आतुर और कलत्तुर के लोगों के बीच खेला जाता है। मंदिर में सबसे पहले देवी की शोभा यात्रा निकाली जाती है, जिसके बाद सभी तालाब में डुबकी लगाते हैं। फिर अलग- अलग गुट बना लेते हैं। अपने अपने हाथों में नारियल की छाल से बनी मशाल लेकर एक दूसरे के विरोध में खड़े हो जाते हैं। फिर मशालों जलाकर इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। नवरात्र पर यहां भक्‍तों की भारी भीड़ रहती है।

5. शक्तिपीठ मां दंतेश्‍वरी मंदिर

छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में स्‍थापित मां दंतेश्‍वरी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्‍यता है कि इस स्‍थान पर मां सती का दांत गिरा था। इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और मंदिर का नाम दंतेश्‍वरी मंदिर पड़ा। बता दें कि देवी मां के इस मंदिर में सिले हुए वस्‍त्र पहनकर जाने की मनाही है। यहां केवल लुंगी और धोती पहनकर ही देवी मां के दर्शन किया जा सकता है। मंदिर की स्‍थापना के बारे में कहा जाता है कि एक अन्‍नम देव नाम के राजा हुए, जिनपर देवी की कृपा थी। स्‍थानीय निवासी बताते हैं कि दंतेश्‍वरी मां ने राजा को वरदान दिया कि वह जहां तक जाएंगे वहां तक उनका राज्‍य होगा, लेकिन शर्त यह है कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। इसके बाद राजा आगे-आगे और मां उनके पीछे चलीं। चलते-चलते राजा का साम्राज्‍य काफी फैलता गया। लेकिन एक जगह नदी को पार करते समय राजा को लगा कि मां उनके पीछे नहीं आ रही हैं तो वह मुड़ गए। इसके बाद मां वहीं रुक गई और उन्‍होंने कहा कि शर्त के मुताबिक राजा पीछे मुड़ गया है इसलिए अब वह आगे नहीं जाएंगी। अब यहीं पर विराजेंगी। तब से ही मां दंतेश्‍वरी मंदिर के पास स्थित नदी के किनारे मां के चरण चिन्‍ह मौजूद हैं। नवरात्र के दिनों में यहां दूर-दूर से भक्‍तजन आते हैं।

6. दक्षिणेश्‍वर काली मंदिर

कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित यह मंदिर भक्‍तों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। इस मंदिर की स्‍थापना के बारे में कहा जाता है कि जान बाजार की जमींदार रानी रासमणि को मां काली ने स्‍वप्‍न में दर्शन दिया साथ ही मंदिर निर्माण कराए जाने का भी निर्देश दिया। इसके बाद 1847 में दक्षिणेश्‍वर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। यह मंदिर स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस की कर्मभूमि भी रही है। यूं तो यहां सालभर भक्‍त आते-जाते रहते हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में यहां पर देवी के दर्शन का विशेष लाभ माना गया है।

7. करणी माता मंदिर

राजस्‍थान के बीकानेर से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर स्थित माता करणी मंदिर अद्भुत है। इसे चूहों वाला मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जानते हैं। यहां भक्‍तों को चूहों का जूठा किया हुआ प्रसाद खिलाया जाता है। मां करणी को मां दुर्गा का अवतार माना गया है। साल 1387 में एक चारण परिवार में करणी माता का जन्‍म हुआ। इनका बचपन का नाम रिघुबाई था। विवाह के बाद जब उनका मन सांसरिक जीवन से ऊब गया तो उन्‍होंने अपना पूरा जीवन देवी की पूजा और लोगों की सेवा में अर्पण कर दिया गया। 151 वर्ष तक जीवित रहने के बाद वह ज्‍योर्तिलीन हो गईं। इसके बाद भक्‍तों ने उनकी मूर्ति स्‍थापित करके पूजा करनी शुरू कर दी। यहां तकरीबन 20हजार चूहे हैं। कहते हैं कि यह करणी माता की संताने हैं, यह सुबह की मंगला आरती और शाम की संध्‍या आरती में जरूर शामिल होते हैं। यहां मां को चढ़ाने वाले प्रसाद को पहले चूहों को खिलाते हैं। इसके बाद भक्‍तों में बांटते हैं। नवरात्र में यहां खूब भीड़ लगती है।

8. श्रीसंगी कालिका मंदिर

मंदिर कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है। इस मंदिर की स्‍थापना के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्‍थापना प्रथम शताब्‍दी में की गई थी। मां के इस मंदिर में काली के स्‍वरूप की उपासना की जाती है। कहा जाता है कि मां के इस दरबार से कभी भी कोई भक्‍त खाली हाथ नहीं लौटा। यहां वासंतिक और शारदीय नवरात्र में श्रद्धालुओं की जबरदस्‍त भीड़ होती है।

9. नैना देवी मंदिर 

नैनीताल में नैनी झील के किनारे बसा है देवी मां का यह अनुपम मंदिर। कहा जाता है कि इसी झील में देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसके चलते ही यहां पर नैना देवी मंदिर का निर्माण हुआ। यह शक्तिपीठ है। इस मंदिर में दो नेत्र हैं, जो मां नैना देवी को दर्शाते हैं। यहां सालभर भक्‍त आते-जाते रहते हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में यहां पर देवी के दर्शन के लिए लंबी लाइनें लगती हैं। कहते हैं कि आज तक कोई भी भक्‍त मां नैना देवी के दर से खाली हाथ नहीं लौटा।


10. श्री महालक्ष्‍मी मंदिर 

कोल्‍हापुर में स्‍थापित यह मंदिर प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण चालुक्‍य साम्राज्‍य के द्वारा करवाया गया माना जाता है। इस मंदिर में मां के महालक्ष्‍मी के स्‍वरूप की आराधना की जाती है। यहां भगवान विष्‍णु मां के साथ विराजते हैं। इसके अलावा इस मंदिर की खासियत है कि यहां सूर्य भगवान साल में दो बार मां महालक्ष्‍मी के चरणों को छूकर पूजा करते हुए दिखाई देते हैं। इस दौरान इस मंदिर में 3 दिन का विशेष उत्‍सव भी होता है। यह दृश्‍य हर साल ‘रथ सप्‍तमी’ पर लोगों को जनवरी माह में देखने को मिलता है। कहते हैं कि इस मंदिर में भक्‍त के मन में जो भी विचार आता है, मां की कृपा से वह पूरा जाता है।

11. ज्‍वाला देवी

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्‍थापित यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि यहां पर माता सती की जीभ गिरी थी। इस मंदिर में मां ज्‍योति के रूप में स्‍थापित हैं। यही वजह है कि इसे ज्‍वाला देवी मंदिर कहा जाता है। मंदिर में जलने वाली जोत के बारे में कहा जाता है कि यह दिया सदियों से जल रहा है। इसे जलाने के लिए किसी भी तरह के तेल या घी की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह प्राकृतिक रूप से जलता रहता है। यहां मांगी गई भक्‍तों की हर मुराद पूरी होती है।

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