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अब चलता हूँ, निश्ता कर लूँ

Bhola Tiwari May 22, 2019, 8:15 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

अभी एक भारत के स्कूलों पर लेख पढ़ा, तो मैंने देखा भोजन का जिक्र नहीं है। हालांकि भारतीय विद्यालयों में डब्बा ले जाने का पुराना रिवाज है। खानेदार डब्बे जिसमें एक खाने में पराठे (या रोटी), दूजे में सब्जी, तीसरे में भुजिया। दक्खिन में इडली/अप्पम और सांभर। या ब्रेड और कुछ फल। बच्चों के इस लंचबॉक्स में एक नीरसता है, और अक्सर खत्म नहीं होते। मैंने शायद जिक्र किया है कि स्पेन में एक महिला अपने बच्चे को पीठ पर मुक्के मार रही थी कि डब्बा खत्म नहीं किया। इस मार से बचने के लिए कई भारतीय अक्सर अपना भोजन किसी नाले में बहा कर आते। एक इटली के मित्र ने भी यही कहा कि स्कूल का नाश्ता खत्म कर के ही घर पहुँचना होता, अन्यथा माँ नाराज हो जाती।

नॉर्वे में यह ‘निश्ता’ (शायद नाश्ता से जुड़ा) कहलाता है। इसमें तेल-घी वर्जित है। ब्रेड, ख़ास तरह के मेयोनेज़ और फल या मांस के सलामी। यही हर बच्चा ले जाता है। इसमें फल स्कूल में ही आ जाते हैं, जिसकी मासिक फ़ीस है। जापान और चीन में तो बाकायदा स्कूल में ताजा भोजन बनाया जाता है कि गरम-गरम मिले। चीन में मुफ्त है, जापान में फीस है।

यह बातें इसलिए कही कि बच्चे का खाना या न खाना महत्वपूर्ण है। और यह भी कि खाना एक सा हो। अक्सर कुछ दबंग लड़के भोजन लूट भी लेते हैं। बच्चे को भी लगता है कि जान छूटी, खत्म हुआ। ऐसे बुलंद लड़के पहचानना मुश्किल नहीं, जब बचपन से मोटापे की समस्या बढ़ रही है। इस कारण यूरोप के देशों में भोजन बाहर मैदान में नहीं, शिक्षकों के सामने स्कूल के अंदर ही खिलाते हैं। शिक्षक भी देख लेते हैं कि कौन खा रहा है, कौन नहीं। बल्कि समूह में बच्चे खा ही लेते हैं। और यही आदत आगे कॉलेज़ और ऑफ़ीस तक चलती रहती है। अब चलता हूँ, निश्ता कर लूँ।

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