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लोक कथाएँ आज के बच्चे नहीं सुनते ...

Bhola Tiwari Sep 28, 2020, 8:09 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली  : लोक कथाओं का उद्भव कब और कैसे हुआ , इसकी कोई जानकारी नहीं है । लेकिन मेरा मानना है कि जब भाषा लिखित रुप में नहीं थी , उससे बहुत पहले से लोक कथाओं का अस्तित्व था । विष्णु शर्मा का पंचतंत्र तो बहुत दिनों बाद आया ,वह भी लिपिबद्ध रुप में । भाषा लिखाई से पहले सुनाई जाती थी । जो भाषा लिपिबद्ध नहीं की जाती, उसे भाषा नहीं बोली कहा जाता है । आज भी बहुत सी बोलियां हैं जो पढ़ी नहीं बोली व सुनी जातीं हैं । ऐसी हरेक भाषा या बोली की अपनी अपनी लोक कथाएँ हैं, जो वहाँ के फिजाओं में अपनी पहचान बना चुकीं हैं । इन लोक कथाओं को किसने लिखा है , इस बावत किसी को कोई जानकारी नहीं है । ये पीढ़ी दर पीढ़ी सुनी सुनाई जा रहीं हैं । इसे यूँ कहें कि यह एक विरासत है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थांतरित होती रहती है ।

हमने बचपन में आंगन में बिछी खटिया पर सोकर इन लोककथाओं का श्रवण किया है । तारों भरी रात में दादी/ नानी से मनुहार कर करके इन कथा कहानियों का रसास्वादन किया है । ऐसी कथाएँ आम तौर पर गद्य में होतीं हैं । कुछ केवल पद्य में भी होतीं हैं । यथा - सोरठी वृजभार । इसे गाकर सुना जाता है और कई रातों तक सुना जाता है । इसी तरह से कुछ लोककथाओं में गद्य व पद्य दोनों का समावेश होता है । कथा का अधिकांश भाग गद्य में होता है और बीच बीच में फिलर के तौर पर दो तीन पक्तियां पद्य की होतीं हैं ।

लोक कथाओं को सुनने के लिए हुंकारी पारी जाती है । सुनाने वाला कथा सुनाता जाता है और आपको "हूँ या हां" कहना पड़ता है । बिना हुंकारी पारे कथा सुनाने वालों को मजा नहीं आता । कथा सुनाने वाली दादी/ नानी नाराज हो जातीं हैं । ऐसे में उनकी चिरौरी करनी पड़ती थी । तब जाकर वे मानतीं थीं और कथा पुनः रफ्तार पकड़ती थी । कई बार कथा सुनाते सुनाते ये दादी/ नानी सोने लगतीं थीं । उन्हें पुनः जगाया जाता था । फिर उन्हें कथा का वह प्रकरण बताना पड़ता था , जिसे सुनाते सुनाते वह सो गयीं थीं । कहानी पुनः शुरू होती । आखिर में वह अपने अंजाम तक पहुँचती ।

हमारी लोककथाएं सुखांत होतीं हैं । यदि किसी फिल्म या नाटक का अंत दुःखांत होता है तो वह जनता में लोकप्रिय नहीं होता । हमें बचपन से सुखांत की आदत पड़ी होती है , इसलिए बड़े होकर हम सुखांत हीं देखना/ सुनना चाहते हैं । हमारे समाज में एक कहावत प्रचलित है " अंत भला तो सब भला "। इसलिए सभी अंत भला हीं चाहते हैं । बेशक आम जिंदगी में ऐसा नहीं होता है , पर हमारी सोच सुखांत चाहती है । आम जिंदगी में क्या होता है , इसे हमारी सोच नहीं सोचती । कथा कहानी का अंत सुखांत होता है तो बड़ी बूढ़ी को कथा के अंत में कहना पड़ता है -

" जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सात जनम सात मुदई ( दुश्मन) के भी बहुरे " 

इतना कहने के बाद दादी/ नानी यह भी कहा करतीं थीं- 

" कथा गईल बन में, सोच अपना मन में "

कई बार कथा कहने वालों का कथा कहने का मूड नहीं होता तो वे लघु कथाओं पर आ जाते थे । कुछ कथाएँ एक एक पंक्ति की भी होतीं थीं । कुछेक बानगी देखिए- 

1 ) एगो रहे जतनी, कथा मोरे अतनी 

 2) एक चींटी थी । उसने हाथी से कहा - 

हमरा के कचरिए जनि रे! ( मुझे कुचल मत देना) 

 हाथी ने कहा था - 

हम देखतानी रे ! ( मैं तुझे देख नहीं पा रही हूँ )

3) एक ढेला और पत्ते में करार हुआ था । बारिश होगी तो पत्ता ढेले को ढंक देगा । इससे ढेला गलने से बच जाएगा । अगर आंधी आई तो ढेला पत्ते को दबा देगा और उसे उड़ने से बचा लेगा । लेकिन कुदरत को कुछ और हीं मंजूर था । एक दिन आंधी और पानी दोनों साथ साथ आईं । ऐसे में पत्ता उड़ गया और ढेला गल गया । ऐसे में कोई किसी की मदद नहीं कर सका।

लोक कथाओं को लिपि बद्ध करने का चलन आजकल हुआ है। पहले नहीं था । पहले ये कथाएँ स्मरण के आधार पर सुनाई जातीं थीं । स्मरण के आधार पर ये कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी सुनी सुनाई जातीं रहीं हैं । अक्सर ये कथाएँ राजाओं और गरीब ब्राह्मणों को केंद्र में रखकर कही जातीं थीं । राजा के बारे में कहा जाता था -

" एक राजा थे । बहुत प्रतापी राजा थे । उनकी कोई संतान नहीं थी ,,,,"

गरीब ब्राह्मणों पर कथा यूँ कही जाती थी - 

" एक बाबाजी ( ब्राह्मण) थे । बहुत गरीब थे । लेकिन उनको एक सिद्धि हासिल थी । वे दिन भर भिक्षाटन करते तो सवा सेर अनाज का उपार्जन करते । यदि घड़ी भर भी भिक्षाटन करते तो भी सवा सेर हीं उपार्जन कर पाते ,,,, "

ये लोककथाएं बिना पंख व पैर के सात समंदर पार विदेश भी पहुँच गयीं हैं । इस पार कराई में वे अपने मूल कथानक से बेशक थोड़ी बहुत विचलित हो गयीं हों , पर उनकी आत्मा आज भी कायम है । आज भी वहाँ की फिजाओं में इनकी मूल खूश्बू विद्यमान हैं ।

आज संचार क्रांति के युग में बच्चे लोककथाओं को बिल्कुल भी नहीं सुनते । उनको इनमें कोई रुचि हीं नहीं दिखती । हमारे पास पैसा है । हम बच्चों की बहुत देखभाल करते हैं । हमने उन्हें मोबाइल खरीद के दे रखा है । वे शांत चित्त हो मोबाइल पर वीडियो गेम खेला करते हैं । ऐसे बच्चों के बारे में आदिल मंसूरी कहते हैं- 

चुपचाप बैठे रहते हैं 

कुछ बोलते नहीं 

बच्चे बिगड़ गये हैं 

बहुत देखभाल से 

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