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शाहीनबाग की दादी " टाइम" की दरोगा क्यों?

Bhola Tiwari Sep 26, 2020, 11:31 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ प्रशांत राजावत

(सम्पादक मीडिया मिरर)

नई दिल्ली : सबसे पहले ये बता दें कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली के शाहीनबाद में तकरीबन सौ दिन विरोध प्रदर्शन चला। प्रदर्शन में शामिल एक बुजुर्ग महिला विलकिस को विश्वप्रसिद्ध पत्रिका टाइम मैग्जीन ने विश्व की सौ प्रभावशाली शख्सियतों में शामिल किया है। इस सूची में भारत से विलकिस (82) के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अभिनेता आयुष्मान खुराना शामिल हैं। बताते चलें कि विश्व की कुछ प्रमुख पत्र पत्रिकाएं ऐसी सूचियां निकालते रहते हैं। इनकी सूची की अपनी विशेष प्रतिष्ठा है विश्वभर में।

भारत में भी फेम इंडिया,इंडिया टुडे भी ऐसी सूची जारी करती रही है। मुद्दे पर आते हैं। भारत में काम कर रही विदेशी मीडिया की कार्य़प्रणाली पर मेरी थोड़ी बहुत नजर रहती है। खासतौर पर वो किस तरह के मसलों को तवज्जों देते हैं अपनी कवरेज में, ये मैं विशेष तौर पर जानना चाहता हूं। इसके लिए मैं सीधे तौर पर न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द डॉन, अल जजीरा आदि अन्य विदेशी मीडिया संस्थानों के भारतीय प्रमुखों के निजी गतविधियों पर नजर रखता हूं। उनका कहां जाना है, किस तरह के लोगों के बीच उठना बैठना है, कैसी पार्टियों का वो हिस्सा हैं। दिल्ली में किस विचारधारा से उनका मेल खाता है आदि पर मैं नजर रखता हूं।

न्यूयार्क टाइम्स के भारत ब्यूरो प्रमुख को मैंने काफी लम्बे समय तक अध्ययन की दृष्टि से फॉलो किया। मैंने पाया कि भारत माने कश्मीर समस्या, भारत माने एंटी मुस्लिम कवरेज, भारत माने हिंदू मुस्लिम मामले। ज्यादा उनकी रिपोर्ट्स इन्ही मामलों के इर्द गिर्द थीं। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार द डॉन के स्थानीय ब्यूरो की रिपोर्ट्स मैं लगातार पढ़ता हूं उनको चुन चुनकर सिर्फ वही कवर करना है जिसमें कश्मीर हो, मुस्लिमों पर अत्याचार व भेदभाव की पुष्टि हो, अल्पसंख्यकों की नजरअंदाजी हो। मैंने आजतक डॉन में ऐसी रिपोर्ट नहीं देखी जो मुस्लिम हिंदू एकता की बानगी हो या जिससे भारत और पाक के रिश्तों में सुधार की संभावना बनती है। पत्रकार की एक भूमिका ये भी हो सकती है कि वो दो दुश्मन देशों के बीच बेहतर संबंधों के लिए पुल का काम कर सकते हैं। पर ऐसा नहीं दिखता। इतना ही नहीं अगर हम एक दफा ये मान भी लें कि संस्थानों से जुड़े पत्रकारों पर संस्थान की नीति का दबाव होता होगा, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों को मैंने देखा जो ऐसे मसले सामने रखते हैं जिनसे भारत में हिंसा, भेदभाव, हेट स्पीच, धर्म संप्रदाय विरोध आदि की बात हो वही मसले ये कवर करते हैं। बरखा दत्त अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के लिए नियमित लिखती हैं उनके आलेख भी कभी इस दिशा में नहीं देखे गए कि भारत में कुछ संभावना दिख रही है या बहुत कुछ बुरा है तो थोड़ा अच्छा भी है और वो अच्छा ये है। अच्छे की बात न स्वतंत्र पत्रकार बताते और न सम्बद्ध पत्रकार।

मुझे याद है रवीश कुमार को जब मैगसायसाय अवार्ड मिला, तो एक धड़े ने खुलेतौर पर कहा कि ऐसे तमाम अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हिंदुत्व विरोधियों, वामपंथियों, राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलने वालों को मिलते हैं। अभी पिछले दिनों पुलित्जर अवार्डों की घोषणा हुई तो कश्मीर के छायाकारों को तस्वीरों के लिए पुरस्कार मिला। हालांकि दोनों फोटो पत्रकार विदेशी मीडिया के लिए ही काम करते थे कश्मीर से। इस घटना के बाद भी मुझसे एक प्रोफेसर ने कहा कि भारत में अशांति, कमतरी, हिंसा, अव्यवस्था दिखाने वालों को ही विदेशों में सम्मान मिलता है। इन दोनों फोटो पत्रकारों ने तस्वीरों में दिखाया था कि कैसे सीएए के दौरान कश्मीर का आम आदमी परेशान रहा और शासन ने जबरदस्ती की। हालांकि गौरतलब बात ये है कि कश्मीर में विदेशी या देशी मीडिया अक्सर ये रिपोर्ट करता है कि आम आदमी पर कैसे मिलेट्री या प्रशासन, पुलिस की सख्ती या दबाव है लेकिन मिलेट्री या पुलिस को पत्थरबाजों ने कैसे यातनाएं दी इस पर कोई रिपोर्ट या तस्वीर कभी नहीं होती। फौजी बेमौत औऱ बेरहमी से मार दिए जाते हैं उनपर कोई रिपोर्ट कभी नहीं लिखी जाती। फौजी कैसे रिस्क लेकर ऑपरेशन को अंजाम देते हैं, या स्थानीय नागरिक किस तरह से फौजियों के खिलाफ माहौल तैयार करते हैं इस पर कोई रिपोर्ट नहीं ही होती।

मेरा एक मोटा मोटी जो निष्कर्ष है कि विदेशी मीडिया जाहिर तौर पर भारत की बेहतर चीजों की प्रस्तुति से बिल्कुल किनारा करके चलता है। पता नहीं ये कौन सी पॉलिसी के तहत वो करता है, या तो दक्षिण एशिया के सबसे सबल देश को वो नहीं चाहता कि वैश्विक स्तर पर लोग बेहतरी व मजबूती के लिए भी जानें। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, वैश्विक कंपनियां सभी मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर आंकलन करती हैं किसी भी राष्ट्र का। लोग भी मीडिया के आधार पर ही देश व वहां केलोगों की छवि मन में गढ़ते हैं। भारत को आज भी विदेशी मीडिया एक आतंकित, गरीब, पिछड़ा, अति पाखंडी, धार्मिक अहिंसा से भरा हुआ देश के रूप में दिखाता है। भारत में इसरो की सफलता हो, बॉलीवुड का विस्तार हो, सिनेमा के प्रयोग हों, ट्रांसपोर्ट सुविधा या स्वच्छ भारत की नींव हो, योग का अंतरराष्ट्रीय करण हो, या शख्सियत विशेष का मामला। ऐसे कवरेज तकरीबन न के बराबर विदेशी मीडिया कवर करता है। शाहीन बाग की दादी को टाइम ने सूची में जगह देकर समूचे विश्व को एक विमर्श दे दिया कि भारत के केंद्र में सीएए है, औऱ उसकी विरोधी टाइम की हीरो। टाइम उसे विश्व की सौ प्रभावशाली शख्सियतों में मान बैठा।

मेरी समझ बहुत व्यापक तो नहीं है। लेकिन इन सूचियों के पीछे एक स्ट्रेटजी काम करती है। कोई माने या न मानें। बेहतर होगा भारत में विदेश मामलों के ख्यात जानकार वैदिक, आकार पटेल, हर्ष मंदर जैसे लोग इस पर टिप्पणी करें। पर दादी को टाइम की सूची में शामिल करने के पीछे की कहानी बड़ी व्यापक है। आप इससे ये समझ सकते हैं कि कैसे मुद्दों पर विश्व के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों की नजर होती है। वो दादी को दरोगा बनाकर क्या बताना चाहते हैं विश्व को। दादी को हीरो दिखाने व बताने के बाद सीएए को लेकर राष्ट्रों की भारत के प्रति क्या सोच निर्मित हो सकती है। भारत की पूर्ण बहुमत वाली निर्वाचित सरकार द्वारा मान्य कानून के विरोध में खड़ी महिला को आप वैश्विक हीरो घोषित कर रहे हैं। ये यूं नही है। भारत में आज भी धर्म, संप्रदाय, मजहब, कौम, जाति आदि के मुद्दे शीर्ष पर हैं और हम इन्ही के इर्द गिर्द हैं। दादी इसका वैश्विक प्रतीक बना दी गई हैं। टाइम भारत के टाइम के साथ दादी के बहाने कुछ ऐसे घड़ी सेट कर रहा है। पूरे आलेख में मैंने ये बिल्कुल नहीं कहा कि दादी का नामांकन गलत है या सीएए सही या गलत है। लेकिन दादी को दरोगा बनाना टाइम में यूं ही नहीं है...बस यही कहना है। इसके अलावा एक औऱ बात मैं बता दूं मैं लम्बे अरसे से महसूस कर रहा हूं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया निगरानी संस्थाएं कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिज्म और रिपोर्ट्स बिदाउट बार्डर भी जिस इशू को अंतरराष्ट्रीय पटल पर रखते हैं उनमें भी हिंदू मुस्लिम इशू प्रमुख हैं। अभी हाल ही में कांरवां के पत्रकारों को मारपीट मामले पर दोनों संस्थाओं ने प्रमुखता से ध्यान दिया और उठाया लेकिन इस इशू में अन्य पत्रकार ( जो की राष्ट्रवादी विचारधारा के थे) उनको पक्षों को भी नहीं सुना व रखा गया। कश्मीर में हाल ही में एक महिला फोटो पत्रकार को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला बहादुरी पूर्ण पत्रकारिता के लिए। ये महिला पत्रकार भी प्रशासनिक गतिविधियों के दबाव में खुद को बताती रही हैं। मैं नहीं कहता कि किसी भी समस्या को अंतरराष्ट्रीय मंच न मिले लेकिन बेहतरी को हर बार दरकिनार करके सिर्फ एक पक्ष की बात भी हो इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। विदेशी मीडिया की भी ये एक पक्षपात पूर्ण हरकत हैं। हर बार...

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