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गढ़मुक्तेश्वर में हुआ था महाभारत में मारे गए योद्धाओं का पिंडदान

Bhola Tiwari Sep 24, 2020, 5:33 AM IST टॉप न्यूज़
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नई दिल्ली : प्राचीन काल से ही नदियों किनारे लगने वाले मेलों का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व है। कुंभ और अर्द्धकुंभ के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगने वाले क्षेत्रीय मेलों की भी अपनी महत्ता है। कार्तिक पूर्णिमा पर वेस्ट यूपी में गंगा नदी पर कई भव्य मेलों का आयोजन होता है। इनमें हापुड़ जनपद के गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले गंगा मेले का संबंध महाभारत काल से है। बताया जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद सम्राट युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए असंख्य लोगों की आत्मा की शांति के लिए गढ़मुक्तेश्वर में गंगा नदी में उनका तर्पण किया था। 

वर्तमान में हापुड़ जनपद के अंतर्गत आने वाला गढ़मुक्तेश्वर में ही भगवान राम के पूर्वज महाराज शिवि ने वानप्रस्थ आश्रम यही पर व्यतीत किया था। उस समय के खांडवी वन में भगवान परशुराम ने शिव मंदिर की स्थापना कराई। शिव मंदिर की स्थापना व बल्लभ संप्रदाय का प्रमुख केंद्र होने के कारण इसका नाम शिवबल्लभपुर भी पड़ा। इसका वर्णन शिव पुराण में भी मिलता है। भगवान विष्णु के गण जय और विजय को भी शिवबल्लभपुर में आकर भगवान शिव की स्तुति करने पर ही शांति मिला और शिव ने उनका उद्धार किया। भगवान विष्णु के इन गणों की मुक्ति होने के कारण ही यह स्थान गणमुक्तेश्वर कहा जाने लगा। कालांतर में अपभ्रंश गढ़मुक्तेश्वर हो गया। महाभारत काल में भी यह जलमार्ग से व्यापार का प्रमुख केंद्र था। हस्तिनापुर की राजधानी का एक भाग गढ़मुक्तेश्वर भी था। हस्तिनापुर जाने-जाने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से 15 किलोमीटर लंबा एक गुप्त मार्ग भी था, जिसके अवशेष आज भी मौजूद है।

महाभारत काल से लगता है कार्तिक पूर्णिमा मेला डाॅ. विघ्नेश त्यागी का कहना है कि पतित पावनी गंगा के किनारे कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले गंगा मेले का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। विध्वंसकारी महाभारत युद्ध के बाद सम्राट युविधिष्ठर के मन में युद्ध विभीषिका और भयंकर नरसंहार से ग्लानि उत्पन्न हुई। युद्ध में मारे गए असंख्य परिजनों और लोगों की आत्मा की शांति के उपाय खोजे जाने लगे। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण की अगुवाई में निर्णय लिया गया कि भगवान परशुराम द्वारा स्थापित शिवबल्लभपुर (गढ़मुक्तेश्वर) में मुक्तेश्वर महादेव की पूजा, यज्ञ और गंगा में स्नान करके पिंडदान करने से मृतकों की आत्मा को शांति मिलेगी। इसके बाद शुभ मुहूर्त निकालकर कार्तिक शुक्ला अष्टमी को गऊ पूजन करके गंगा तट पर एकादशी को गंगा मैदान में सभी देवतुल्य पूर्वजों के उत्थान हेतु धार्मिक संस्कार करके पिंडदान किया गया। यही एकादशी देवोत्थान एकादशी कहलाई। एकादशी से चतुदर्शी तक युद्ध में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ किया गया। इसके अगले दिन पूर्णिमा पर गंगा स्नान करके कथा का आयोजन किया। इसके बाद से ही कार्तिक पूर्णिमा पर गढ़मुक्तेश्वर में गंगा नदी पर मेले का आयोजन होता आ रहा है।

पांडवों द्वारा अपने पूर्वजों व मृतकों के तर्पण के बाद से ही यहां पर कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेला आयोजित होता जा रहा है। इसमें आने वाले लोगों की संख्या को देखते हुए इसे लक्खी मेला भी कहा जाता है। गढ़मुक्तेश्वर में प्रत्येक वर्ष जिला पंचायत द्वारा मेले का आयोजन कियाजाता है। इस वर्ष मेले में 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। जिसमें सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए जाते हैं। गंगा खादर के विशाल मैदान पर तंबुओं का विशेष नगर बाया जाता है। हापुड़ के साथ-साथ मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, दिल्ली से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा मेले में भाग लेने आते हैं। हरियाणा के सोनीपत, रोहतक आदि शहरों से भी श्रद्धालु गढ़मुक्तेश्वर पहुंचते हैं। इसमें भैंसा-बुग्गी से कई दिन पहले ही लोग अपने घरों से गंगा मेले के लिए प्रस्थान करते हैं। आधुनिक होते समाज में भी भैंसा-बुग्गी से गंगा स्नान के लिए जाने की परंपरा लोगों में कौतूहल पैदा करती है। सुरक्षा के लिए बैरीकेटिंग के अलावा सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। गंगा नदी में बोट, गोताखोर तैनात किए जाते हैं। पुलिस और पीएसी की भी तैनाती होती है।

तिगरी में भी लगता है विशाल गंगा मेला

गढ़मुक्तेश्वर के सामने गंगा नदी के दूसरे तट पर अमरोहा जनपद के तिगरी में भी विशाल गंगा मेले का आयोजन किया जाता है। इस गंगा मेले में भी अमरोहा के साथ-साथ संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बदायूं, बिजनौर क्षेत्र के लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान करने पहुंचते हैं।

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