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अब गणित और विश्लेषण का समय

Bhola Tiwari May 19, 2019, 7:17 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा 

अभी मैं पूछ रहा था कि चुनाव विशेषज्ञ कोई भारत में है या नहीं? इसकी दो वजह है- एक तो यह सबसे बड़ा लोकंतंत्र है, और दूसरा यह कि psephology के आविष्कार में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। अब यहीं से निकले निष्कर्ष पूरी दुनिया में प्रयोग किए जा रहे हैं। दुनिया के पहले चुनाव विशेषज्ञ और इस शब्द को जन्म देने वाले डेविड बट्लर की असल प्रयोगशाला ‘84 का चुनाव ही थी। उस वक्त वह, प्रणय रॉय और अशोक लाहिरी ने मिल कर पहली बार आँकड़े बताए थे, जो ठीक भी निकले थे। 

उसके बाद ऐसे लोग बनने शुरु हुए जिन्हें हर लोकसभा-विधानसभा सीट में पिछले चार-पाँच चुनावों का वोटिंग पैटर्न ही कंठस्थ होता। किस चुनाव में कौन जीता, यह तो खैर मुहल्ले में ही कई लोग बता देते। एक्जिट-पोल और डाटा के बग़ैर भी विश्लेषण सटीक होता। जी.वी.एल. नरसिंह राव और योगेंद्र यादव के समय यह ठोस और प्रामाणिक बनता गया। 

इसमें दो शब्दों की खोज में भारत का महत्व है- एक ‘वोट-स्विंग’ और दूसरी ‘अपोज़िशन युनिटी’। इसमें पहला शब्द अब पूरी दुनिया में प्रयोग किया जाता है, और दूसरा बहुदलीय लोकतंत्रों में। जैसे इंदिरा गांधी की मृत्यु या कोई अकस्मात घटना एक ‘वोट स्विंग’ लाती है, और जब एक पार्टी बहुत ही मजबूत हो तो बाकी की पार्टियाँ मिल जाती हैं। गठबंधन न भी हो, तो जनता दो मुख्य धड़ों में बँट जाती है। यह ‘अपोजिशन युनिटी’ है। यह तभी आएगी जब एक पार्टी (जैसे अभी भाजपा, उस वक्त कांग्रेस) बाकियों पर भारी पड़ेगी।

अब यह विशेषज्ञता जहाँ भारत में ‘एक्जिट पोल’ या ‘ओपिनियन पोल’ आने के बाद मृतप्राय है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक शोध के हिसाब से यह और सुलभ हो जाना चाहिए। जैसे डाक्टरी में तमाम टेस्ट आने के बाद विशेषज्ञ का काम सुलभ हुआ है, और संख्या भी बढ़ी है; राजनीतिशास्त्र और साँख्यिकी में भी यह बढ़नी ही चाहिए।

यह गणित है, विश्लेषण है, विज्ञान है, और इस विषय के मूल पर कम से कम दो नोबेल भी मिले हैं। सोशल मीडिया और अन्यत्र जिन्हें राजनीति में रुचि है, साँख्यिकी का ज्ञान है, उनके लिए यह विशेषज्ञ-शून्यता स्वर्णिम अवसर है।

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