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अमशीपोरा एनकाउंटर:आफस्पा कानून का खूलेआम दुरूपयोग

Bhola Tiwari Sep 21, 2020, 12:06 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : 18 जुलाई 2020,दक्षिण कश्मीर के सोपियां जिले के अमशीपोरा में तड़के राष्ट्रीय राइफल्स के जवान जिन्हें स्थानीय गुप्तचर से सूचना मिली थी कि कुछ आतंकी एक मकान में छूपे हैं उन्हें सरेंडर करने के लिए कहते हैं।आतंकियों की तरफ से फायरिंग शुरू होने के बाद राष्ट्रीय राइफल के जवान ने उन्हें मार गिराते हैं।सेना के प्रवक्ता ने एनकाउंटर के बाद कहा था कि राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों द्वारा सरेंडर करने के कहने के बाद आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी थी।दोनों तरफ से गोलीबारी में तीन आतंकी जो एक मकान में छूपे थे,मारे गए।उनके पास से तीन रिवाल्वर और गोला-बारूद बरामद किया गया था।

मारे गए तीनों आतंकी स्थानीय थे और सुबह होते हीं उनकी पहचान इम्तियाज अहमद,अबरार अहमद और मोहम्मद अबरार के रूप में स्थानीय नागरिकों द्वारा किया जाता है।एनकाउंटर के समय रहवासियों द्वारा तगडा विरोध किया जाता है और राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों पर भारी पत्थरबाजी होती है।

मारे गए तथाकथित आतंकियों के परिवार वालों और गाँव के निवासियों का कहना था कि ये तीनों बेहद गरीब परिवार से हैं और मजदूरी कर अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे।दोपहर तक इस फर्जी एनकाउंटर की खबर समूचे कश्मीर में फैल जाती है और लोगों द्वारा इस कायरतापूर्ण कार्रवाई पर तगडा विरोध जताया जाता है।सोशल मीडिया पर ये खबर देश-विदेश में सुर्खियां बटोरने लगती है।जनता के आक्रोश को देखते हुए सेना इस मामले की उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दे देती है।इसी बीच थलसेनाध्यक्ष जनरल एम.एम.नरवणे दो दिन के कश्मीर दौरे पर आते हैं और कहा जा रहा है कि उनकी पहल पर सेना ने अपनी हीं राष्ट्रीय राइफल्स की एक यूनिट के अधिकारियों और सैनिकों को प्रथमदृष्टया दोषी मानते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के आदेश जारी करती है।जाँच में ये बात सामने आई है कि इन अधिकारियों और सैनिकों ने ना केवल आम्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट यानि आफस्पा की दी हुई ताकत का दुरूपयोग किया बल्कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद थलसेनाध्यक्ष द्वारा काउंटर-टेररिस्ट आँपरेशन के लिए बनाए गए चार्टर का भी उल्लंघन किया है।

आपको बता दें समय-समय पर बहुत से अशांत जगहों पर इस कानून के उल्लंघन के समाचार मिलते रहें है।सेना के कुछ अति महत्वाकांक्षी अधिकारियों और जवानों द्वारा इस कानून दुरूपयोग अपने प्रमोशन और साख में इजाफे के लिए किया जाता रहा है।ये पहला मामला नहीं है,कई बार तो फर्जी एनकाउंटर की जाँच होती है और सेना अपने अधिकारियों और जवानों को बचा ले जाती है।सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम भारतीय संसद द्वारा 11 सितंबर,1958 में पारित किया गया था।इस कानून की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई कि इसमें जवानों को कुछ विशेष अधिकार मिलते हैं और आँपरेशन के लिए किसी से आदेश लेने की जरूरत नहीं होती है।घटनास्थल पर सेना अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेती है और आँपरेशन को अंजाम देती है।इस कानून से पहले विभिन्न राज्य सरकारें स्थानीय कारणों से सेना के आँपरेशनों को मंजूरी देने में हील हवाली करती थीं,जिससे आतंकी या तो भाग जाते थे या अपने मंसूबों को अंजाम दे देते थे और सेना के जवान कार्रवाई शुरू करने का इंतजार हीं करते रह जाते थे।

शुरुआत में इस कानून को अशांत अरूणाचल प्रदेश,असम,मणिपुर,मेघालय,मिजोरम,नागालैंड में लागू किया गया और इससे उग्रवाद को रोकने में सेना को बहुत सफलता भी मिली थी।इस कानून के आने से पहले लगता था कि समूचा नार्थईस्ट भारत के हाथ से निकल जाएगा मगर इस महत्वपूर्ण कानून ने सेना को त्वरित कार्रवाई का अधिकार प्रदान किया और उग्रवाद को काफी हद तक अंकुश में भी कर लिया।कश्मीर घाटी में आतंकवादी घटनाओं में बढोत्तरी होने के बाद जुलाई 1990 में यह कानून सशस्त्र बल(जम्मू एंव कश्मीर)विशेष शक्तियां अधिनियम 1990 के रूप में जम्मू-कश्मीर में भी लागू किया गया।

अशांत कश्मीर में भी यह कानून पूरी तरह से सफल रहा और उग्रवाद पर काबू पाया जा सका है मगर समय समय पर इसका दूरूपयोग भी हुआ है।अमशीपोरा फर्जी एनकाउंटर इसका जीता जागता मिसाल है जो ये चीख चीखकर कहता है कि अब इस कानून की समीक्षा होनी चाहिए और इसे और पारदर्शी बनाने की जरूरत है।इस कानून के दुरूपयोग को देख कर हीं मोदी सरकार ने मेघालय से आफस्पा कानून को हटा लिया है।अरूणाचल प्रदेश में ये केवल आठ थाना क्षेत्रों में हीं लागू है।असम में भी इसकी समीक्षा की जा रही है।हलांकि नागालैंड में ये पूरी तरह से लागू रहेगा।

अगर हम इस कानून के तह में जाएंगे तो ये पाएंगे कि ये कानून बहुत हीं बेहतर है,मगर इसका दुरुपयोग इसे विवादास्पद बना दे रहा है।इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है,अशांति फैलाता है,तो उस पर मृत्यु तक बल का प्रयोग किया जा सकता है।किसी भी आश्रय स्थल या ढांचे को तबाह किया जा सकता है जहाँ से हथियार बंद हमले का अंदेशा हो।किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है।गिरफ्तारी के दौरान उनके द्वारा किसी भी तरह की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है।बिना वारंट किसी के घर में अंदर जाकर उसकी तलाशी ली जा सकती है।इसके लिए जरूरी बल का इस्तेमाल किया जा सकता है।किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ली जा सकती है।

ये सारे अधिकार सेना को त्वरित कार्यवाही के लिए प्रदान किये गए हैं।आफस्पा सेना के वैध कामों को कानूनी कवच प्रदान करता है।अब ये प्रश्न उठता है कि किसी राज्य को कब डिस्टर्ब घोषित किया जा सकता है।इस कानून में ये लिखा गया है कि अगर किसी राज्य में धार्मिक,नस्लीय,भाषा,क्षेत्रीय समूहों,जातियों,समुदायों के बीच मतभेद या विवाद हिंसक रूप अख्तियार कर ले तो उस राज्य को डिस्टर्ब घोषित किया जा सकता है और वहाँ ये कानून लागू किया जा सकता है।ये अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है मगर इसके लिए राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य है।

विशेष न्यायालय अधिनियम 1976 के अनुसार,एक बार डिस्टर्ब क्षेत्र घोषित होने के बाद कम से कम तीन महीने तक वहां पर स्पेशल फोर्स की तैनाती रहती है।आपको याद होगा 2012 को संयुक्त राष्ट्र ने भारत से कहा था कि लोकतंत्र में आफस्पा का कोई स्थान नहीं है,भारत सरकार को इसे तुरंत रद्द करना चाहिए।राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने कई बार आफस्पा कानून को काला कानून बताकर इसे रद्द करने की मांग रखी है।

तमाम आलोचनाओं के बाद भी कांग्रेस सरकार ने इस कानून को हटाया नहीं,भाजपा की सरकार भी इसे हटाने के पक्ष में नहीं है,अलबत्ता बहुत से राज्यों में इसे सीमित किया जा रहा है।सरकारें जानती हैं कि ये कानून सशस्त्र बलों के लिए कितना महत्वपूर्ण है।ये वो सुरक्षा कवच है जिसे ओढ़कर सेना अपने महत्वपूर्ण आँपरेशनों को अंजाम तक पहुँचाती हैं।आप हमेशा ये खबरों में सुनते हैं कि जिस मकान में आतंकी छूपे हुए थे,उस मकान को जमींदोज़ कर दिया गया।सेना को ये मजबूरी में करना पड़ता है क्योंकि आतंकी लाख चेतावनी के बावजूद मकान से निकलते नहीं है।सेना के सामने ये भी खतरा रहता है कि अगर वो उस मकान में दाखिल होते हैं तो उनके फियादीन उस मकान को हीं उडा सकते हैं।अपने सैनिकों की सुरक्षा और अगल-बगल घरवालों की सुरक्षा को देखकर सेना उस मकान को हीं कम त्रीवता वाले विस्फोटक से उडा देती है।

अमशीपोरा एनकाउंटर संपूर्ण सेना का आँपरेशन नहीं बल्कि कुछ मनबढ़ सैन्य अधिकारियों की सनक का दुष्परिणाम है।श्रीनगर स्थित रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता,कर्नल राजेश कालिया ने कहा कि मामले की जाँच पूरी हो गई है और जाँचकर्ता ने इस मामले में आरोपियों के खिलाफ आर्मी एक्ट के तहत कार्रवाई के आदेश दिए हैं।कर्नल राजेश कालिया ने एक बयान जारी कर कहा कि भारतीय सेना "सभी एंटी-टेरेरिस्ट आँपरेशन्स"के नैतिक आचरण के लिए प्रतिबद्ध है।

गौरतलब है कि पिछले महीने सेना ने कोर्ट आँफ एंक्वायरी के आदेश दिए थे।इसके तहत राजौरी जिले के गायब हुए तीन मजदूरों के परिवारवालों के डीएनए सैंपल ले लिए गए थे ताकि उनका मिलान मारे गए आतंकियों के डीएनए से कराया जा सके।

एक पत्रकार और जिम्मेदार नागरिक के तौर पर मैं आफस्पा कानून का समर्थन करता हूँ मगर इसका बेजा इस्तेमाल रूकना चाहिए।फर्जी मुठभेड़ में कोई निर्दोष नागरिकों की जानें गई हैं जिसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा।इस कानून में व्यापक सुधार की गुंजाइश है और मेरा विश्वास है कि भारतीय फौज अपनी उच्च परंपरा को कायम रख दोषी अधिकारियों और जवानों को कडी सजा दिलवाएगी और देश के सामने एक नजीर पेश करेगी।

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