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सांबा जासूसी कांड - झूठ का पुलिंदा

Bhola Tiwari Sep 19, 2020, 6:40 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली  : सेना की आर्टिलरी रेजीमेण्ट में सरवन गनर के पद पर तैनात था । 1971 के भारत पाक युद्ध का खात्मा हुए कुछ हीं महीने बीते थे । उन दिनों आज की तरह सीमा पर बाड़ नहीं लगी थी । सरवन के चकरा गाँव के पास दोनों देशों के बीच बड़ी अस्पष्ट-सी सीमा-रेखा थी । दोनों ओर दूर-दूर तक खेत फैले हुए थे । लोग थोड़े से उद्यम से सेक्यूरिटी बलों के आंखों में धूल झोंकते हुए एक तरफ से दूसरी तरफ आ जा सकते थे ।

बात 1972 की जुलाई-अगस्त की है । सरवन छुट्टी काटने अपने गाँव चकरा गया था । एक रात वह दोस्तों के साथ पी रहा था । पीने के बाद वह अपनी धुन में चलता हुआ सरहद पार कर गया । सुबह होते होते वह सरहद से काफी आगे निकल गया । अब जाकर सरवन को अपनी गल्ती का एहसास हुआ । सरवन को एक बस दिखाई पड़ी । सरवन उसमें सवार हो गया ।

बस दोपहर के बाद सियालकोट जाकर रुकी । बस को सियालकोट तक हीं जाना था । सभी यात्री उतरे । सरवन के पास पैसे नहीं थे । उसने कंडक्टर से अपना बटुआ खोने का बहाना बनाया । कंडक्टर को दया आ गयी । उसे छोड़ दिया । सरवन कहाँ जाता ? वह बस स्टैण्ड पर हीं भूख प्यास से बेहाल बैठा रहा । शाम हुई । रात गहराई की तरफ जाने लगी । पुलिस के गश्ती दल की उस पर नजर पड़ी । तलाशी ली गयी तो उसके पास से भारतीय सेना का परिचय पत्र मिला ।

सरवन को पुलिस थाने से सियालकोट के गोरा जेल भेज दिया गया । जेल में उसने कैदियों का टार्चर होते देखा तो उसकी रुह फना हो गयी । उसने भारतीय सेना के बारे में जो भी जानकारी थी तुरंत बता दी । पाकिस्तान आर्मी के फील्ड यूनिट ने उसे पाकिस्तानी जासूस बनने का न्यौता दिया । बदले में उसे मालामाल करने का लालच भी दिया गया । सरवन टार्चर होने के डर से और मालामाल होने की लालच में पाकिस्तान की तरफ से जासूसी करने को तैयार हो गया ।

सरवन को छोड़ दिया गया । वह पाकिस्तान के मेजर अकबर खान को सूचनाएँ मुहैय्या कराने लगा । सरवन जो भी सूचनाएँ देता वे पाकिस्तान आर्मी के पास पहले से हीं मौजूद होतीं थीं । दरअसल मेजर अकबर खान सरवन को मोहरा बनाना चाहता था । वह सरवन के मार्फत भारतीय सेना में अपना एक नेट वर्क फैलाना चाहता था । सरवन ने एक और मोहरा तैयार किया । दूसरे मोहरे का नाम था - आया सिंह । आया सिंह सरवन के पड़ोसी गाँव का रहने वाला था । वह सरवन के दिखाए गये सब्ज बाग के कब्जे में आ गया ।

अब सरवन और आया सिंह एक साथ छुट्टी आते । छुट्टी के दौरान वे पाकिस्तान जाकर अकबर खान से मिलते । जरुरी सूचनाएँ देते और बदले में ढेर सारे इनाम इकराम पाते । अब दोनों की पाकिस्तान में आर्मी में बहुत आवभगत होने लगी । मोटा इनाम पाने की लालच में दोनों छुट्टी से लेट भी होने लगे । अंततः सरवन का भांडा फूटा । उसे आई बी ने एक डबल एजेंट के मार्फत् पकड़ा था । आर्मी इंटेलिजेंस के लिए यह बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात हुई । जिस चीज को वे न पकड़ सके उसे आई बी ने कैसै पकड़ लिया ।

आर्मी इंटेलिजेंस ने सरवन को धर दबोचा । उसे ट्रेन से बबीना से जम्मू लाया जा रहा था । जालंधर में वह गार्डों को चकमा देकर फरार हो गया । कुछ दिन वह अपने घर चकरा रहा और उसके बाद वह पाकिस्तान चला गया । वहाँ उसकी सरकारी दामाद की तरह खातिरदारी हुई । वह पाकिस्तान में सात महीने तक रहा । वह बीच बीच में रात के अंधेरों में अपने गाँव आता और अपनी माँ और बीवी से मिलकर फिर पाकिस्तान चला जाता । आर्मी इंटेलिजेंस के लोग उसकी फिराक में थे और एक दिन वह दुबारा पकड़ा गया ।

टार्चर से बचने के लिए सरवन के जो भी मन में आया, बोलता गया । उसने बैटरी कमांडर कैप्टेन आर जी गहलावत का नाम लिया । कैप्टेन गहलावत को सरवन की गवाही पर 14 वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई । मारे शर्म और दुःख के उस स्वाभिमानी अफसर की बाद में हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी । मार से बचने के लिए सरवन ने कुछ और लोगों का नाम भी लिया था । जब उन लोगों को टार्चर किया गया तो जान बचाने के लिए उन लोगों ने कुछ और नये नाम बताए । इस तरह से झूठे जासूसों का कुनबा बढ़ता गया । 

आर्मी इंटेलिजेंस की कस्टडी में सरवन जुलाई 1975 से अगस्त 1978 तक रहा । उसका साथी आया सिंह भी पकड़ा गया था । आया सिंह भी अपनी कारगुजारी दिखाने लगा । उसने भी झूठी रिपोर्ट दी । इस तरह से लोग मिलते गये और कारवाँ बनता गया । इस जासूसी कांड की गिरफ्त में बहुत लोग आ गये । आया सिंह ने अपने एक रिश्तेदार कैप्टन नामग्याल का नाम भी लिया था । कैप्टन नामग्याल ने कैप्टन आर एस राठौर व कैप्टन राना का नाम लिया । सरवन ने तस्दीक किया कि वह कैप्टन आर एस राठौर के साथ पाकिस्तान गया था और दोनों ने संयुक्त रुप से पाकिस्तानी मेजर अकबार खान को गोपनीय सूचना प्रदान की थी ।

कुछ दिनों तक कैप्टन आर एस राठौर इंकार करते रहे । परंतु वे भी आर्मी इंटेलिजेंस के टार्चर से टूट गये । उन्होंने हवालदार रामस्वरुप का नाम लिया । आर्मी इंटेलिजेंस ने अब रामस्वरुप का टार्चर शुरु किया । अत्यधिक टार्चर से रामस्वरुप की मौत हो गयी । वैसे उसकी मौत का कारण नशा करना बताया गया । अब रामस्वरुप के कमाण्डिंग आफिसर मेजर आर के मिड्ढा आर्मी इंटेलिजेंस के पूछ ताछ के दाएरे में आ गये । कहते हैं कि मेजर आर के मिड्ढा ने रामस्वरुप की मौत पर सवाल उठाए थे । इस केस में सांबा स्थित 168 इन्फेंट्री ब्रिगेड से कोई पचास लोग गिरफ्तार हुए । लगभग पूरा का पूरा अधिकारी वर्ग इसमें लिप्त पाया गया था ।

कोर्ट मार्शल हुआ । गनर सरवन और आया सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया । कैप्टन राना और कैप्टन राठौर को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया । इन दोनों को 14 साल की कठोर सजा मिली थी । कई अन्य आरोपी भी बिना मुकदमे के ही नौकरी से निकाल दिए गये । इस केस में नया मोड़ तब आया जब आया सिंह और सरवन को क्रमशः 1978 और 1979 में नौकरी पर बहाल कर लिया गया । शायद उनको झूठी गवाही देने का यह इनाम मिला था । कैप्टन राना और कैप्टन राठौर कोर्ट मार्शल के खिलाफ " 1980 - 87" तक हाई कोर्ट में पिटिशन दायर करते रहे । उनका पिटिशन खारिज होता रहा । 

आर्मी एक्ट की धारा 18 के अंतर्गत बिना औपचारिक मुक़दमे चलाये आरोपितों की नौकरी समाप्त की गयी थी और उन्हें सजा दी गई थी । पेटीशनरों को इस मामले में सफलता मिली । हाई कोर्ट ने माना कि आर्मी एक्ट की धारा 18 के प्रयोग के औचित्य की जांच की जा सकती है , जब यह लगे कि इस धारा के प्रयोग से नैसर्गिक न्याय और संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

आया सिंह को चस्का लगा था मालामाल होने की । वह भारत-पाक सीमा अवैध रूप से पार करते समय दिसम्बर 1990 में मारा गया । 1994 में एक दूसरे आरोपी मेजर अजवानी के पेटीशन पर दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले की फिर से जांच होनी चाहिए । कहा जाता है कि दिसम्बर 1994 में सरवन ने माना था कि उसने निर्दोष लोगों को इस केस में फंसाया था । दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2000 में माना था कि इस पूरे प्रकरण में न्याय का गला घोंटा गया है । हाई कोर्ट ने कोर्ट मार्शल की कार्रवाई को गलत ठहराया और सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया ।

इस फैसले के विरुद्ध 2006 में सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई थी । सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय पर कई त्रुटियाँ निकाल दी । इस केस को 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट को लौटा दिया गया । अब पूरे मामले की नए सिरे से सुनवाई की जानी थी । 2017 में सुप्रीम कोर्ट में मेजर आजवानी ने इस केस के कागज देखने की गुहार लगायी थी । उनका अनुरोध रद्द कर दिया गया । 

2019 में भी, राना और राठौर ने दिल्ली हाई कोर्ट में फिर एक पेटीशन दाखिल किया जिसमे मांग की गयी है इस केस के सारे कागजात सार्वजनिक किए जांय ताकि लोगों को सच्चाई का पता लग सके और लोग जान सकें कि सेना ने इस मामले कितना घपला किया है ।

साम्बा जासूसी काण्ड पर आई बी के दृष्टिकोण को भी जानना रोचक है । आई बी के तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर वी के कौल को कहना पड़ा है - “यह केस झूठ और मनगढ़ंत आरोपों का ऐसा घालमेल है जिस पर किसी ठोस सबूत के बिना विश्वास नहीं किया जा सकता है । और, ऐसा कोई सबूत है नहीं है ।”

दो अनपढ़ फौजी, जो पाकिस्तान के लिए काम कर रहे थे उन्होंने ऐसा घाल मेल किया कि सेना के कई अफसरों और कर्मियों का कैरियर बर्बाद हो गया और पूरी सेना पर इसका भयानक दुष्प्रभाव पड़ा । अभी जब तक कोई फैसला नहीं आ जाता तब तक दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता पर मौजूदा हालात हमारी बात की तस्दीक जरुर कर रहे हैं ।

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