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'प्रॉडक्ट' वाली पढ़ाई

Bhola Tiwari Sep 17, 2020, 6:50 AM IST राष्ट्रीय
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डॉ सुशील उपाध्याय

देहरादून  : बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने वाली कंपनी बायजूज की तरफ से फोन आया, जिसमें बताया गया कि वे मेरे बच्चे को कौन-कौन से सब्जेक्ट ऑनलाइन पढ़ा सकते हैं। एक शिक्षक होने के नाते मैं इस बात से आश्चर्य में पड़ गया कि फोन पर बात करने वाले प्रतिनिधि ने मुझे अवगत कराया कि उनके यहां बच्चों के लिए कौन-कौन से प्रोडक्ट उपलब्ध हैं। उन्होंने अपने प्रोडक्ट का नाम बताया, जूनियर क्लास के लिए 100 घंटे का प्रोडक्ट, ट्यूशन वाला 16 घंटे का प्रोडक्ट, सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी क्लास के लिए मैथ्स-साइंस का प्रोडक्ट, केवल मैथ्स या केवल साइंस का प्रोडक्ट। 

इसके बाद उन्होंने अपने इन प्रोडक्ट की कीमत बताई। ये भी बताया कि इन प्रोडक्ट के साथ किस तरह की छूट मिलेगी, कौन-सी सर्विस आफ्टर प्रोडक्ट मिलेंगी, प्रोडक्ट का किस तरह से मैनेजमेंट किया जाएगा, डिलीवरी का क्या प्रोसेस होगा और वह कौन-सी टीम होगी जो इस बात को जांचेगी कि प्रोडक्ट को ठीक प्रकार से डिलीवर किया गया या नहीं किया गया। ये सारी शब्दावली मेरे लिए डरावनी थी। मुझे आज भी नहीं लगता कि शिक्षा कोई प्रोडक्ट है और उसे बाजार में खड़ा करके बेचा जा सकता है। 

इस कंपनी के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर विजिट करके आप आसानी से देख सकते हैं कि वहां ठीक उसी तरह से शिक्षा को भी बिकाऊ और बाजारू उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया गया है, जिस तरह से अमेजॉन, जिओमार्ट या फ्लिपकार्ट आदि पर बहुत सारे सामान बेचने के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। कोरोना के डरावने दौर ने शिक्षा को न केवल प्रोडक्ट में बदला है, बल्कि इसे हासिल करने वाले विद्यार्थी को भी एक बड़ी मशीन के पुर्जे में बदल देने की अवांछित कोशिश की है।

इस पूरी प्रक्रिया को देखिए तो यह पता लग रहा है कि एजुकेशन का शुरुआती बिंदु शिक्षक के स्थान पर किसी कंपनी में बदल गया है। उस कंपनी के कुछ प्रतिनिधि हैं, जो ठीक उसी प्रकार अपने उत्पाद बेचते हैं जैसे कि कोई कार या टीवी बनाने वाली कंपनी का प्रतिनिधि लोगों को फोन करके यह बताता है कि उनकी कार या टीवी में कितनी खूबियां हैं। 

अभी तक हम लोग यही मानते आ रहे थे कि सीखना/सिखाना एक जीवंत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के परिघटित होने के लिए शिक्षक और विद्यार्थी का उपलब्ध होना जरूरी है। हां, माध्यम के रूप में अलग-अलग तरह के प्रयोग किए जा सकते हैं। कोरोना से पहले यह माध्यम फेस टू फेस था या ओपन एजुकेशन में काउंसलिंग के जरिए शिक्षा के लक्ष्य को हासिल किया जाता था। आज की परिस्थितियों में यह माध्यम ऑनलाइन या वर्चुअल है। शिक्षा देने की प्रक्रिया में अभी तक शिक्षक कीमती रहा है और विद्यार्थी को भविष्य के नागरिक के रूप में गढ़ने का लक्ष्य प्राथमिक बना रहा है। लेकिन अब मीडियम पर जोर है। उस मीडियम के जरिए ही प्रोडक्ट को बेचा जाना है।

इतना तो शायद संचार विज्ञानी मार्शल मैक्लुहान ने भी नहीं सोचा होगा की मीडिया न केवल मैसेज बन जाएगा, बल्कि मैसेज की डिलीवरी का निर्धारण भी वही करने लगेगा। आज कोरोना के सामने पूरी मनुष्य जाति संकट में घिरी हुई दिख रही है और यह जल्द खत्म होता भी नहीं दिख रहा है। यह ठीक है कि किसी भी गतिविधि को रोका जाना आसान नहीं है और यह भी ठीक है कि यदि शिक्षा जैसी गतिविधि को रोक दें तो इस वक्त में होने वाले नुकसान की भरपाई भविष्य में शायद ही कभी हो पाएगी। इसीलिए लोगों ने शिक्षा के माध्यम के बदलाव को स्वीकार कर लिया। 

उस स्थिति में भी स्वीकार कर लिया, जबकि इस कथित नए उत्पाद को इस्तेमाल में लाए जाने के लिए कुछ खास गैजेट्स की जरूरत है। अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि हमारे आसपास एक तिहाई से ज्यादा ऐसे बच्चे हैं, जिनके पास कोई आधुनिक गैजेट उपलब्ध नहीं है। यानी ये लोग एजुकेशन रूपी प्रोडक्ट को खरीदने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। 

अगर थोड़ा-सा आदर्शवादी और नैतिकतावादी होकर सोचा जाए तो सच में यह डरावना दौर है, जब किसी कंपनी का कोई प्रतिनिधि कहता है कि हमने आपके बच्चे के लिए एक प्रोडक्ट तैयार किया है और वे इस प्रोडक्ट को आपके घर तक पहुंचाने के लिए भी तैयार हैं। इस बात को मान लीजिए कि नई पीढ़ी के लिए भी यह अच्छा समय नहीं है, यदि कोरोना की चुनौती लंबे वक्त तक बनी रहे तो इस वक्त स्कूल-कॉलेज जाने वाली पीढ़ी के पास भविष्य में उन लोगों के नाम नहीं होंगे, जिन्हें वे अपने शिक्षक के रूप में याद रख सकें या उनके साथ अपनी पहचान को जोड़ सकें। उन्हें केवल यही याद रहेगा कि उन्होंने अपना गणित, साइंस, इंग्लिश सोशल साइंस या किसी अन्य सब्जेक्ट का प्रोडक्ट किस कंपनी से खरीदा था।

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