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गौर से देखिए क्या ये वही सुल्ताना डाकू है जो कभी ब्रिटिश शासन के नाक में दम किए हुए था

Bhola Tiwari May 15, 2019, 6:39 AM IST टॉप न्यूज़
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.एस डी ओझा

सुल्ताना डाकू के बारे में मैंने कभी गाँव की नौटँकीयों से जितना जाना था , उससे ज्यादा तब जाना जब उसके बारे में ढेर सारे शोध परक लेख पढ़े . नौटँकीयों में कुछ अतिरंजना दिखाई गई है . यह कि वह वेश बदलने में माहिर था.उसे अंग्रेज अफसरों को छेड़ने में मजा आता था.वह विभिन्न रूप धरकर अंग्रेज अफसरों से मिलता था . कभी नाई बन तो कभी धोबी बन . पता तब चलता था जब वह वहाँ से चला जाता था . उसके बाद अंग्रेज ऑफिसर सीने पर क्रॉस बनाते थे और भगवान को लाख लाख धन्यवाद देते थे कि उसने उन्हें बचा लिया , पर वास्तव में ऐसा नहीं था . सुल्ताना एक डकैत था और उसे भी आम डकैतों की भांति हीं पुलिस से डर लगता था और वह भी पुलिस से दूरी बनाए रखता था . 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नजीवाबाद क्षेत्र में रहने वाली एक खानाबदोश जनजाति , जिन्हें भट्टू राजपूत कहा जाता है ,अपने को महाराणा प्रताप का वंशज बताती है . इन्हीं में से कुछ मुसलमान बन गए . ये अक्सर चोरी डकैती की वारदात करते रहते थे . डकैती से प्राप्त आय की एक निश्चित राशि गाँव की पंचायत को देनी पड़ती , जिससे पुलिस मुठभेड़ में मारे गए उन डकैत परिवारों का पालन पोषण किया जाता था .ब्रिटिश सरकार जब इन डकैतों को पकड़ती थी तो उन पर मुकदमा चलाया जाता था . दोषी पाए जाने पर उन्हें तय शुदा समय के लिए जेल में बन्द कर दिया जाता था. इसी तरह के कैदी सुल्ताना के माता पिता भी थे.जेल में हीं सुल्ताना डाकू का जन्म हुआ . उस समय उसका नाम सुल्तान अहमद रखा गया . बिना किसी कसूर के हीं उसका जीवन जेल की सलाखों में बीतने लगा . बड़े होने पर उसने अपने जैसे जेल में बन्द युवकों को संगठित किया और जेल से भाग निकला .और बन गया एक गिरोह का डकैत जिसे सुल्ताना डाकू कहते थे .

गिरोह का मुखिया बन सुल्ताना डाकू ब्रिटिश सरकार के समानांतर अपनी सरकार चलाने लगा. वह व्यापारियों को मूल्य वृद्धि और नाप तौल के मानकों को अपनाने के लिए चेताया करता था.जो व्यापारी नहीं मानते थे उनको सम्भलने का मौका देता था अन्यथा उन्हें उठवा लेता था . वीसवीं सदी का वह अत्यंत दुर्दांत और खतरनाक , परन्तु सबसे लोकप्रिय डकैत था . वह अपने पूर्वज महाराणा प्रताप से काफी प्रभावित था . इसीलिए उसने महाराणा प्रताप के घोड़े के नाम पर अपने घोड़े का नाम भी चेतक रखा था . उसके पास एक बीर बहादुर नाम का कुत्ता भी था . इसे पकड़ने में ब्रिटिश सरकार के छक्के छूट गए थे . 

सुल्ताना अमीरों को लूट कर उसे गरीबों में बाँट देता था . उसके इस सामाज सेवा से प्रभावित हो उसे "सोशल बैंडिट " कहा जाता था . जनता में अपार लोकप्रिय होने के कारण यह ब्रिटिश सरकार से कई सालों तक आँख मिचौनी खेलता रहा .सन् 1920 के आस पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सुल्ताना डाकू का कहर चरम पर रहा . थक हारकर ब्रिटिश सरकार ने एक विशेषज्ञ पुलिस अधिकारी को विशेष तौर पर इंग्लैण्ड से बुलवाया . इस अधिकारी का नाम फ्रायड यंग था . फ्रायड यंग को 300 पुलिस जवानों की एक टुकड़ी उसकी मदद के लिए दी गई . इस काम के लिए प्रसिद्ध वन्य जीव विशेषज्ञ जिम कार्बेट की भी मदद ली गई .

सुल्ताना डाकू जहाँ तक हो सके खून खराबे से बचता था . पता नहीं उसने कितनी बेटियों की शादी कराई होगी ? कितनों घरों के बुझे हुए चूल्हे जलाए होंगे ? परन्तु उसके प्राण दीप को बुझने से कोई रोक न सका . फ्रायड यंग ने जब उसे नैनी ताल के जंगलों से पकड़ा तो उस समय वह सो रहा था . फ्रायड यंग अपने क्विन्टल वजनी शरीर सहित उस पर बैठ गया . सुल्ताना की नींद खुली , पर उसे हथियार उठाने का भी मौका नहीं मिला . एक संक्षिप्त ट्रायल के बाद सन् 1924 में उसे फांसी दे दी गई . अभी उसने अपने जीवन के सिर्फ 22 बसन्त हीं देखे थे . 

मरने से पहले उसकी माँ उससे मिलने गई थी , पर सुल्तान ने यह कह कर मिलने से साफ़ मना कर दिया था कि उसकी इस स्थिति के जिम्मेवार उसके माता पिता ही हैं . माता पिता के कारण हीं सुल्ताना जेल में पैदा हुआ और आज उन्हीं की वजह से मृत्यु वरण करने जा रहा है . सुल्ताना डाकू नहीं चाहता था कि उसका बेटा उसके पेशे में आए.कहा जाता है कि अपने पुत्र के कैरियर के लिए उसे पुलिस अधिकारी फ्रायड यंग से अनुरोध किया था और फ्रायड यंग भी दिलेरी दिखाते हुए उसकी पत्नी और बेटे को इंग्लैण्ड अपने साथ ले गया और उनका पूरा खर्च अपने पल्ले से किया.कहा तो यह भी जाता है कि सुल्ताना का बेटा बड़ा हो के ICS ऑफिसर बना था .

आज सुल्ताना डाकू को मरे 90 साल से ऊपर हो गए हैं , पर उसकी यादें किस्से कहानियों और नौटँकीयों में आज भी विद्यमान है . देहरादून में Robber 's cave आज भी मौजूद है , जहाँ पर सुल्ताना लूट के माल का वितरण अपने साथियों में करता था . दिन में इस गुफा में आराम और रात को लूट पाट . यही थी यहाँ की दिन चर्या . नजीवाबाद में उसके नाम का किला आज भी मौजूद है , जहाँ पर वह कुछ दिनों के लिए छुपा था .जिम कार्बेट के नाम पर भारत सरकार ने जब एक वन्य जीव अभ्यारण्य बनाया तो सुल्ताना के नाम पर एक परित्यक्त किले का नाम लोगों ने "सुल्ताना डाकू का किला " रखा . कहते हैं कि सुल्ताना का सारा का सारा खजाना इसी किले के हौज में रखा गया है जिसे खोजने का असफल प्रयास सन् 1930 में हो चुका है . अब भी उस खजाने को ढूंढने की मांग गाहे ब गाहे उठती रहती है . 

चलते चलते एक बात और . जिम कार्बेट बेशक सुल्ताना को पकड़ने वाली टीम के मुहीम के हिस्सा थे ,पर उन्होंने सुल्ताना की भूरी भूरी प्रशंसा भी की थी . उसे भारत का रॉबिनहुड कहा था .

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