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"वीर सावरकर" या "माफीनामा देने वाले सावरकर"

Bhola Tiwari May 14, 2019, 11:50 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने सिलेबस के लिए गठित कमेटी के प्रस्तावों को अक्षरतः स्वीकार कर लिया है।सिलेबस में विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी में बदलाव करते हुए उन्हें वीर के बजाय अंग्रेजों से माफी मांगने वाला बताया है।

भाजपा सरकार ने भी एक ऐसी हीं कमेटी का गठन तीन साल पहले किया था, उस कमेटी के सुझावों को मानते हुए भाजपा की सरकार ने 10 वीं कक्षा की किताब में सावरकर को वीर,महान देशभक्त और महान क्रांतिकारी बताया था।

अब नए पाठ्यक्रम में दसवीं के बच्चे सावरकर को वीर नहीं यातनाओं से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने वाला पढ़ेंगे।

विनायक दामोदर सावरकर को कुछ लोग सच्चा देशभक्त मानते हैं तो कुछ लोग अंग्रेजों के सामने माफीनामा देकर खुद को बचाने वाला मानते हैं।मैंने जो महसूस किया वो बयां कर रहा हूँ।

साल 1909 में सर विलियम कर्जन वाइली की लंदन में गोली मारकर हत्या कर दी जाती है, क्रांतिकारी मदनलाल ढ़ीगरा ने गोली मारी थी।अंग्रेजों ने आरोप लगाए थे कि ढींगरा को रिवाल्वर सावरकर ने उपलब्ध कराए थे।अन्य मामलों में भी पुलिस उनकी तलाश कर रही थी।लंदन में उनकी गिरफ्तारी होती है और उन्हें भारत लाया जाता है।

सावरकर के ऊपर मुकदमा चलता है और उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएँ सुनाई गई और सजा काटने के लिए 11 जुलाई 1911 को भारत से दूर अंडमान निकोबार यानी कालापानी भेज दिया गया।वहाँ कैदियों पर तरह तरह के जुल्म होते थे।अंग्रेज अधिकारी और जेलर बग्घी पर चलते थे और इसे कैदियों द्वारा खींचा जाता था।लेट्रिन में बैठने का समय तय था उसी समय के अंदर मल त्याग करना पड़ता था,नहीं तो कोडों से पिटाई होती थी।कैदी भय से जेल की कोठरी में हीं मल त्याग कर देते थे।भयंकर दुर्गंध से रहना मुश्किल हो जाता था।फाँसी घर बैरक के ठीक नीचे था,फाँसी पर लटकाए जाने से पहले कैदियों के रोने-चिल्लाने की आवाजें कैदियों को विचलित कर देती थीं।

सावरकर 11 जुलाई को कालापानी में दाखिल हुए थे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफीनामा लिखा।डेढ़ महीने के भीतर हीं उनकी सारी शक्ति जवाब दे गई।सेल्युलर जेल में वे नौ साल दस महीने रहे और इस बीच उन्होंने छह बार अंग्रेजी हुकूमत को अपना माफीनामा दिया।अपने ऊपर दया करने की गुहार उन्होंने कई बार किया।उन्होंने पत्र में लिखा कि मुझे भारत के किसी भी जेल में शिफ्ट कर दिजिए, इसके बदले में वो किसी भी हैसियत में सरकार के लिए काम करने के लिए तैयार हैं।सावरकर ने ये भी लिखा कि अंग्रेजों द्वारा उठाए गए कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है और उन्होंने अब हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है।सावरकर ने बार बार अंग्रेजी हुकूमत में अपनी आस्था प्रकट किया।एक बार उन्होंने जेलर को मार्मिक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी और भाई से मिलने की इच्छा प्रकट की।जेलर ने उस चिठ्ठी को फार्वड कर अपने उच्चाधिकारी को भेज दिया जिसमें जेलर की सहमति भी लिखी गई थी।ब्रिटिश शासन की दया और जेलर की रहम पर 30 और 31 जुलाई 1919 को अपनी पत्नी और छोटे भाई से मिल सके।

सेल्युलर जेल में नौ साल दस महीने नरकीय जिंदगी काटने के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने दया दिखलाते हुए उन्हें पुणे की यरवदा जेल में स्थानांतरित कर दिया।लगातार ब्रिटिश शासन में अपनी आस्था दिखाने पर साल 2024 में सावरकर को पुणे की यरवदा जेल से दो शर्तों के आधार पर छोड़ा गया।पहली शर्त थी वो ताउम्र किसी भी राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे, दूसरी वो जिला कलेक्टर की बिना अनुमति जिले के बाहर नहीं जाएंगे।

सावरकर ने अंग्रेजों से किया वादा बखूबी निभाया और आजादी तक वे कोई भी गतिविधियों में शामिल नहीं हुए।

मैं मानता हूँ सावरकर क्रांतिकारी पुरूष थे और उन्होंने देश की आजादी के लिए जितना बन सकता था उतना किया।लंदन से गिरफ्तार होकर जब वे भारत लाए जा रहे थे तब भी उन्होंने समुंदर में जहाज से कुदकर वीरता का हीं परिचय दिया मगर सेल्युलर जेल में वो टूट गए थे।दुबले पतले सावरकर जेल की सजा से बेहद त्रस्त थे।उन्हें अंग्रेजों ने 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5×7.5 फीट की कोठरी में रखा था।जेल में कैदियों की हेकडी तोड़ने के लिए तरह तरह की कोशिशें होती थी।जंगलों के बीच होने के कारण वहाँ मच्छर बहुत लगते थे।कैदियों और जेल अधिकारियों को हर तीसरे महीने मलेरिया का अटैक होता था।कैदियों में कडवी कुनैन की दवा बाँटी जाती थी जिसके खाने पर अक्सर भूख मर जाती और उल्टियां होने लगती थी।बिमारी में भी कैदी अपनी उल्टियों को उठाता था,कमजोर कैदी मलत्याग अपनी कोठरी में हीं कर देते थे, उसे साफ करना पड़ता था।भीषण गर्मी में भी कैदियों से खेती कराई जाती थी।इन सब बातों का सावरकर पर बेहद बुरा असर पड़ा, जिस वजह से उन्होंने माफी मांगी।मुझे लगता है कि वे बुरी तरह टूट चुके थे।

सभी व्यक्ति की सहने की सीमा अलग अलग होती है और शायद सावरकर इतना हीं सह सकते थे।उन्होंने जिंदगी और मौत के बीच जिंदगी को चुना,वे कालापानी में कुत्ते की मौत नहीं मरना चाहते थे,शायद इस वजह से भी उन्होंने माफी का रास्ता चुना।

साल 1949 में महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने कर दी,उस हत्याकांड में आठ लोग नामजद हुए थे जिसमें एक सावरकर भी थे।उनके ऊपर मुकदमा चला मगर ठोस सबूत के आभाव में वे छूट गए।इस केस की सुनवाई लाल किले में हो रही थी,जज ने जैसे हीं उन्हें बरी किया और नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सजा सुनाई, कुछ अभियुक्त सावरकर के पैर पर गिर पडे।इस दृश्य को देखकर सभी ने माना कि गाँधीजी की हत्या में सावरकर का हाथ है मगर कोई ठोस सबूत नहीं थे।

सावरकर के बरी हो जाने के बाद भी सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए कपूर कमीशन का गठन किया।वे अपनी मौत तक अपने आप को बेगुनाह साबित नहीं कर सके।लोगों की भावना देखकर या सरकार के सख्त रूख को पहचानकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने उनसे दूरी बनाए रखी।सावरकर के जीवन के आखिरी दो दशक राजनीतिक एकाकीपन और अपयश में बीता, वे जितने के हकदार थे उतना भी नहीं मिला उन्हें।

गाँधीजी की हत्या के बाद भारतीय जनमानस ने उन्हें बिल्कुल नकार दिया था, सबसे कष्टकारी हिंदू महासभा और आरएसएस की उपेक्षा थी।साल 1966 में उनकी मृत्यु हो गई उनकी अंतिम यात्रा में बेहद कम लोग थे,हिंदू महासभा और आरएसएस का कोई भी पदाधिकारी अंतिम दर्शन करने नहीं गया था शायद जनमानस गाँधीजी की हत्या के साजिशकर्ता को माफ नहीं करना चाहती थी।

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