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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सनक का शिकार "ईरान"

Bhola Tiwari May 12, 2019, 6:50 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

अमेरिकी प्रतिबंध के कारण लगभग दिवालिया होने की कगार पर आ चुके ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि अगर दूनिया के ताकतवर देश अपने वादे निभाने में नाकाम रहे तो वो अपने परमाणु कार्यक्रम पर लौट आएगा।

ईरान के राष्ट्रपति के बयान के बाद अमेरिका ने कहा है कि वह मध्य-पूर्व में लडाकू विमान और बमवर्षक भेजने जा रहा है ताकि ईरान के खतरों से निपटा जा सके।इसकी घोषणा पहले अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जाँन बोल्टन ने रविवार को की थी और बाद में इसकी पुष्टि कार्यकारी रक्षामंत्री पैट्रिक शानाहान ने की।

आपको बता दें जुलाई,2015 में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों के बीच परमाणु समझौते हुआ था।अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले में प्रतिबंधों से राहत दी थी लेकिन मई,2018 में ईरान पर ज्यादा दवाब बनाने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ये समझौता तोड़ दिया।

दूनिया का अघोषित चौधरी अमेरिका ईरान को पूरी तरह बरबाद करने पर तुला है।प्रतिबंध तोडऩे के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक संबोधन में कहा था कि दूनिया के सभी देश ईरान से संबंध तोड़ दें।अमेरिकी चेतावनी के बाद भी भारत समेत कुछ देश ईरान से तेल निर्यात करते थे मगर अब भारत ने भी ईरान से तेल लेना बंद कर दिया है।भारत किसी भी हाल में अमेरिका से दुश्मनी नहीं कर सकता।ईरान से भारत को काफी सस्ते में तेल मिल जाता है वो भी भारतीय रूपयों में।

अमेरिका को लगता है कि इस दवाब के कारण ईरान परमाणु संधि पर दोबारा बातचीत करने को राजी हो जाएगा मगर ईरान के हुक्मरानों ने साफ कह दिया है कि वह बरबाद हो जाएगा मगर अमेरिका के आगे नहीं झुकेगा।

आखिर अमेरिका हमेशा ईरान से नाराज क्यों रहता है?कारण जानने के लिए हमें इसके अतीत में जाना होगा।

साल 1941 में अंग्रेजों और रूसियों ने ईरान पर अधिकार कर लिया, इसके लिए कोई युद्ध नहीं हुआ कोई लिखित समझौता नहीं हुआ था।दरअसल ईरान के शासक रजा शाह ने पहले जर्मनी का समर्थन किया लेकिन हिटलर की विस्तारवादी नीतियों ने उन्हें डरा दिया।रजा शाह को ये एहसास हुआ कि हिटलर ईरान को भी अपने गणराज्य में मिला सकता है तो उन्होंने मित्र राष्टों से दोस्ती गांठना शुरू कर दिया।मित्र राष्टों को भी डर था कि कहीं ईरान जर्मनी के साथ रहा तो भारी मुश्किल हो सकती है।हिटलर ने जब रूस पर आक्रमण किया तो रूस और ब्रिटिश फौज ने मिलकर उसका सामना किया और उसी दरम्यान रूस और ब्रिटिश हुकूमत ने साल 1941तक शाह की सहमति से शासन किया।ब्रिटिश शासन को वहाँ के नागरिक बडी घृणा से देखते थे, अंग्रेजों के रहन सहन और पूजा पद्धति इस्लाम से बिल्कुल भिन्न था।जनता में भारी असंतोष पनपने लगा।

साल 1949 में शाह की हत्या की असफल कोशिश की गई।इस हत्या में प्रधानमंत्री मोसद्दिक का नाम आया और उन्हें आजीवन नजरकैद की सजा सुनाई गई।साल 1953 में अमेरिका ने चुने गए प्रधानमंत्री को सत्ता से बेदखल कर मोहम्मद रजा शाह पहलवी को सत्ता सौंप दी,जो अमेरिका के इशारे पर नाचता था।

साल 1971 में तख्त-ए-जमशैद में प्राचीन ईरान के हखामनी शासकों द्वारा स्थापित विश्व के उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में शाह ने एक बडे सम्मेलन का आयोजन किया।बताते हैं कि इस भव्य समारोह में शिरकत करने के लिए विश्व के सभी बड़े नेता और राष्टाध्यक्ष तेहरान पहुँचे थे।इस समारोह में देश का पैसा पानी की तरह बहाया गया।जनता को ये अपव्यय बहुत खला और उसी समय से शाह का कडा विरोध शुरू हो गया।शहरों में पाश्चात्य संस्कृति हावी थी लोग पश्चिमी परिधान ज्यादा पहनने लगे।तेहरान तो एक तरह से यूरोपीय फैशन का सबसे प्रमुख अड्डा बन गया।लेकिन गाँवों में बेहद गरीबी थी लोग खाने और पानी के लिए तरसने लगे थे।तेहरान में उन दिनों लोग पेप्सी-कोला पानी की तरह पीते थे।

ईरानी जनता के असंतोष को भांपकर निर्वासित धर्मगुरु आयतुल्लाह खुमैनी ने लोगों को सरकार के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया।सत्तर के दशक के अंत तक ईरान में बड़े पैमाने पर हिंसा से भरपूर शाह विरोधी प्रर्दशनों की शुरुआत हो गई।विरोध प्रर्दशन और आम हडताल से ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी।

जनवरी 1979 में शाह एक लंबी छुट्टी लेकर ईरान से बाहर सपरिवार चले गए,उन्हें ये एहसास हो गया था कि अब किसी भी वक्त सत्ता जा सकती है।उन्होंने प्रधानमंत्री शाहपुर बख्तियार को पूरा अधिकार दे दिया था।शाह के विदेश जाने से उत्साहित आयतुल्लाह खुमैनी 1 फरवरी 1979 को एयर फ्रांस के यात्री विमान से तेहरान पहुंच गए, एयरपोर्ट पर उनका भव्य स्वागत हुआ तभी ये तय हो गया था कि अब ईरान में शाह के शासन का अंत सन्निकट है और हुआ भी ऐसा हीं।

11फरवरी 1979 को तेहरान की सड़क पर सेना टैंक लेकर उतरी लेकिन सेना ने कोई हिंसा नहीं किया, स्पष्ट था सेना भी विद्रोहियों के साथ थी।क्रांतिकारियों ने तेहरान के मुख्य रेडियो स्टेशन पर धावा बोल दिया और ऐलान किया,"यह ईरानी जनता की क्रांति की आवाज है।"उसी दिन प्रधानमंत्री शाहपुर बख्तियार ने इस्तीफा दे दिया।

आयतुल्लाह खुमैनी ईरान के सर्वोच्च नेता बने और उन्होंने देश मे इस्लामी गणतंत्र का एलान किया।खुमैनी को ईरान की जनता ने जिंदगी भर के लिए ईरान का राजनीतिक और धार्मिक नेता नियुक्त कर दिया।

ईरान में "इस्लामिक क्रांति" को अमेरिका ने कभी मान्यता नहीं दी।क्रांति के बाद अमेरिका ने तेहरान से राजनयिक संबंधों को तोड़ लिया था।इसी बीच ईरानी छात्रों ने 444 दिनों तक 52 अमरीकी राजनयिकों और नागरिकों को तेहरान के अमरीकी दूतावास में बंधक बनाकर रखा था।अमेरिका ने जवाब में ईरान की 12 अरब डाँलर की संपत्ति को जब्त कर लिया था।इस घटना के बाद से ईरान और अमेरिका के बीच कभी भी संबंध सामान्य नहीं हो पाए थे।

आज जो दोनों देशों के बीच तनातनी चल रही है उसके पीछे इन दोनों देशों के दागदार संबंध हीं हैं।बराक ओबामा ने अपनी सुझबुझ से ईरान के साथ एक बेहतरीन समझौता कर लिया था,ईरान समझौते के हर बिंदु पर सहयोग भी कर रहा था।अब डोनाल्ड ट्रंप अपनी मनमानी कर रहें हैं और सभी देशों ने अमेरिका की डर से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया है जिसमें भारत भी शामिल है।भारत को तो ईरान काफी सस्ते दामों में तेल दे देता था वो भी भारतीय रूपयों में।अमेरिका ईरान को तो बरबाद करेगा हीं अन्य देश भी उसकी सनक से बेहद प्रभावित होगें ये तो तय है।

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