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बज्जरपडू की कहानी

Bhola Tiwari May 12, 2019, 10:10 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश मिस्र

1990 में बिहार में लालूजी के नेतृव में जनता दल की सरकार बनी थी और पहली बार बाढ़ पर बहस हो रही थी. दिन था ८ अगस्त. पिछले करीब दस साल से कांग्रेस पार्टी का शासन रहा था बिहार में मगर अब वह विपक्ष में बैठी थी. दिग्विजय प्रताप सिंह का पार्टी की तरफ से भाषण चल रहा था और उन्होंने जनता दल कि मिली जुली सरकार पर कटाक्ष किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने बाढ़ नियंत्रण के लिए बहुत से उत्साही कदम उठाये लेकिन भ्रष्टाचार के कारण वह जनता तक नहीं पहुँच पाया, इसको हम भी मानते हैं. वह भ्रष्टाचार आज भी व्याप्त है. आज जो परिस्थिति बन गयी है उसे मैं एक कहानी के माध्यम से सुनना चाहता हूँ. 

गाँव में एक ओझा था उस ओझा के पास ग्रामीण लोग अपनी समस्या लेकर आते थे तो ओझा समाधान करने के लिए घर से बाहर निकलकर चिल्लाता था कि आकाश बांधों, पाताल बाँधों, नीचे बाँधों, ऊपर बांधों. एक दिन बरसात में उसके घर की छत चू रही थी औए ओझाइन के सर पर दो एक बूँदें टपक पडीं. उसी समय ओझाजी बाहर अपने किसी जजमान के लिए चिल्ला रहे थे आकाश बांधों, पाताल बाँधों, नीचे बाँधों, ऊपर बांधों. ओझाइन से नहीं रहा गया तो उन्होंने अन्दर से हांक लगाईं अरे बज्जरपडू! घर की तुम्हें फ़िक्र है कि नहीं ? बाहर कह रहे हो कि आकाश बांधों, पाताल बाँधों, नीचे बाँधों, ऊपर बांधों. पहले अपना घर सम्हालो. ठीक वही हालत आज जनता दल की है. वह देश को सुधारने की बात करते हैं मगर अपने घर की लड़ाई को ठीक नहीं कर पा रहे हैं. इनके साथी इनसे कहते हैं कि वो इनसे कंट्रोल होने वाले नहीं हैं. वो सब मिल कर इन पर आरोप लगते हैं मगर आरोपों से देश का निर्माण नहीं हो सकता. जब तक एकता नहीं रहेगी, एक शासन व्यवस्था नहीं होगी, एक मत से काम नहीं होगा और नीति निर्धारित नहीं हो सकेगी .

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