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क्यों हिंदी भाषा को कमजोर कर रहे हो ?

Bhola Tiwari Aug 15, 2020, 8:02 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली  : मेरे एक फेस बुक फ्रेण्ड ने मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी की थी -

" मकबूल की जगह सर्व प्रिय नहीं लिख सकते थे । क्यों हिंदी भाषा को कमजोर कर रहे हो ?"

इस विषय पर मैं यह कहना चाहता हूँ कि जो हिंदी भारतेंदु हरिश्चंद के समय थी वह आज उदय प्रकाश के समय में नहीं है । यह समय समय पर बदलते बदलते यहाँ तक पहुँची है । यहाँ तक के सफर में आते आते उसने बहुत सी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात किया है ,जिसकी वजह से यह बहुत हीं समृद्ध हो गयी है । इसका भविष्य उज्ज्वल है। यह आगे और भी समृद्ध होगी ।

संस्कृत भी अपने आप में एक समृद्ध भाषा है । इसे कम्प्यूटर के लिए एक अच्छी भाषा माना गया है । लेकिन इसकी गलती है कि यह आज तक नहीं बदली । यह प्रकाण्ड पण्डितों की हीं भाषा बनी रही । इसलिए यह जन भाषा कभी नहीं बन पाई । यह दुरुह भाषा की श्रेणी में जा खड़ी हुई । यदि कर्म काण्ड, अनुष्ठान और शादी/ विवाह में इसका प्रयोग जरुरी नहीं होता तो यह भाषा कब की मर गयी होती । वैसे आकाश वाणी और दूरदर्शन इसके जिंदा रखने के हिमायती है, इसलिए इसमें तमाम दुनियां के भाषाओं के जरुरी शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं ।

फारसी में संस्कृत के बहुत से शब्द शामिल हैं । कपि ( बानर ) , नर , दूर ,दंत , गऊ ( गौ ) , नव , शूकर ( सुअर) जैसे संस्कृत के शब्द अब फारसी के हो गये हैं । ईरानी व अफगानिस्तानी इन्हें फारसी से बाहर करने के लिए कोई मुहीम नहीं चलाते । उन्हें पता है कि इन शब्दों के बिना फारसी बोली नहीं जा सकती । ये शब्द आम जन की जुबान में शामिल हो गये हैं । उसी तरह से बहुत से अरबी / फारसी के शब्द उर्दू के मार्फत् हिंदी में आ गये हैं । उदाहरण के तौर पर - बाजार, जगह, रोशनी, फायदा, रोज , दरवाजा , आदत , बुजुर्ग, साहब , जरुरी , सफेद ,,, । क्या हम इन शब्दों को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं ? नहीं ।

आम बोल चाल की भाषा में एक देहाती भी सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट कह लेता है। क्या जरुरी है कि हम उसे उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की घुट्टी पिलाएं । उसी तरह से हाॅस्पिटल व डाक्टर जैसे शब्द हमारी जुबान पर अच्छी तरह से रच बस गये हैं तो हम क्यों चिकित्सालय और चिकित्सक जैसे दुरुह शब्दों के प्रयोग के लिए किसी को बाध्य करें ? ऐसा करने से क्या हमारी जुबान लड़खड़ाएगी नहीं ? अंग्रेजी ने हमारी खाट ( Cot) , बरांडा , विलायती ( Blighty ) , कमरबंद , ठग , घेराव, जंगल, मगर (Mugger ), तिपाई (Teapoy ) , बंगला (Bungalow) , महावत (Mahaout ) , चटनी, छींट( Chintz) , डकैत को अपना लिया है तो हमने भी इससे कहीं और ज्यादा अंग्रेजी के बहुत से शब्द हिंदी में आत्मसात किया है।

आज संस्कृत से पालि, प्राकृत, तेलगू , कन्नड़, मलयालम, पंजाबी , मराठी , गुजराती और हिंदी भाषाएँ निकलीं हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इनका वहाँ दम घुट रहा था। अब ये भाषाएँ उदार मना है । एक दूसरे से उधार पायच करती रहतीं हैं । इस लेन देन से ये और मजबूत होती हैं । हिंदी हमारी कमजोर कभी नहीं हो सकती । किसी की हिम्मत नहीं कि कोई इसे कमजोर कर दे । आज पूरे विश्व में हिंदी का परचम जो लहरा रहा है तो इसका एक अहम कारण है । वह कारण है इस भाषा में अंग्रेजी की तरह आगत शब्दों को आत्मसात् करने की पुलक प्रवृति है ।

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