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आजादी के सच्चे मायने कहीं खो न जाएँ.....

Bhola Tiwari Aug 15, 2020, 7:50 AM IST कॉलमलिस्ट
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नीरज कृष्ण

पटना  : हमारे युवा वर्ग को विरासत में जो भारत मिलने वाला है उसकी छवि निराशाजनक है। सन् 1947 में भारत और भारतवासी विदेशी दासता से मुक्त हो गये। भारत के संविधान के अनुसार हम भारतवासी प्रभुता सम्पन्न गणराज्य के स्वतन्त्र नागरिक है। परन्तु विचारणीय यह है कि जिन कारणो ने हमें लगभग 1 हजार वर्षो तक गुलाम बनाये रखा था। क्या वे कारण खत्म हो गये है? जिन संकल्पो को लेकर हमने 90 वर्षो तक अनवरत् संघर्ष किया था क्या उन संकल्पो को हमने पूरा किया है?

क्या आजादी का संघर्ष इसीलिए किया गया था? युवाओं ने इसीलिए बलिदान दिया था कि अंग्रेजों के स्थान पर कुछ 'स्वदेशी' लोग सत्ता का उपयोग करें। सत्ता का हस्तानांतरण हुआ है, लेकिन उसके आचरण में बदलाव नहीं आया है। जब भी 15 अगस्त नजदीक आता है मुझे ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं- “आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है, उठो देश कल्याण करो अब, नवयुग का निर्माण करो सब।“

आजादी के 73 वर्ष गुजर जाने के बाद भी भारत की बदनसीबी यह है कि आज भी उसके बाशिंदे उन्हीं जख्मों को कुरेद रहे हैं जो किसी जमाने में हमारे पूर्वजों ने अपने जेहन में बसाए थे। बदनसीबी इस बात की भी है कि लगातार बढ़ती हुई सांप्रदायिक विचारधारा भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को पूरे विश्व में धूमिल कर रही है। लेकिन इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ‘भारत में राष्ट्र और उसके आत्मसम्मान से ज्यादा धर्म और उसके सम्मान ज्यादा मायने रखते हैं।‘

 आजादी के पहले औपनिवेशिक सत्ता ने जिस हथियार का इस्तेमाल देश की दो महान जातियों को अलगाने में किया था, आजादी के बाद देश के नेताओं ने उन्ही हथियारों का इस्तेमाल अपना वर्चस्व बनाने और सत्ता हथियाने के लिए किया। सही मायने में देश में कौमी एकता बनाने का कार्य आज तक नहीं हुआ है, ऊपर से भले ही इसका दिखावा किया गया हो। इसी का परिणाम है कि सांप्रदायिकता के जो बीज स्वाधीनता आंदोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने बोये थे आज वह विशाल वटवृक्ष के साथ धारण कर चुका है। इसी का परिणाम है कि कुकुरमुत्ते की भांति उगने वाली छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियाँ जो अपने स्वार्थ साधने के लिए लोगों को धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के नाम पर भड़काती रहती है। 

हमारे अन्दर देश भक्ति का अभाव है। देश की जमीन और मिट्टी से प्रेम होना देशभक्ति का प्रथम लक्षण माना जाता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन को जिस भाषा द्वारा देश मुक्त किया गया, उस भाषा हिन्दी को प्रयोग में लाते हुए शर्म का अनुभव होता है। भारत गूँगा है जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं है, विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ के राजकाज में तथा तथाकथित कुलीन वर्ग में एक विदेशी भाषा का प्रयोग किया जाता है। विचारणीय है कि वाणी के क्षेत्र में आत्महत्या करने के उपरान्त हमारी अस्मिता कितने समय तक सुरक्षित रह सकेंगी।

 सन् 1947 में देश के विभाजन से सम्भवतः विभाजन-प्रक्रिया द्वारा हम राजनीतिक सौदेबाजी करना सीख गए हैं। आपातकाल के उपरान्त एक विदेशी राजनयिक ने कहा था कि भारत को गुलाम बनाना बहुत आसान है, क्योंकि यहाँ देशभक्तो की प्रतिशत बहुत कम है।

सात दशकों की आजादी में हमने क्या वही देश बनाया है जिसका सपना आजादी के समय हर भारतीय की आंखों में था। यह विचार करना जरूरी है कि हमने क्या पाया है और क्या दें रहें अपनी आने वाली पीढ़ी को ताकी आने वाला समय इस आजादी को उसी तरह से याद रख सके, जिस तरह से हम रखतें हैं। 21वीं सदी में हमारे देश की क्या स्थिति है। जब भ्रष्टाचार हमारे देश की नींव को खोखला कर आम इंसान के जीवन को पूरी तबाह कर रहा है। देश के आम लोगों का पैसा चुरा कर लोग बाहरी देशों में जा कर अपना जीवन सुख से गुजार रहे हैं और जिनका वह पैसा है वह दिन-रात खून के आंसू रो रहे हैं।

देश में 83.6 करोड़ के करीब ऐसे लोग हैं जिनके पास खाने के लिए दो वक्त का खाना भी नहीं है। दूसरी ओर चंद लोग ऐसे हैं जिनकी थाली में रोज हजारें-लाखो का खर्चा होता है। धर्म और जाति की राजनीति हमारे लिए एक आम बात है। हमारे यहां आम व्यक्ति का जीवन कितना भी अधिक दुखों से ग्रस्त हो किंतु हम वोट धर्म और जाति के आधार पर ही देते हैं।

हमारे देश में प्रत्येक दिन धर्म और जाति के आधार पर अखबार और समाचार रंगे नजर आते हैं। कभी दलित के नाम पर कभी पंडित, तो कभी मुस्लिम किसी ना किसी को आधार बनाकर हमारे यह समाचार और अखबार हर दिन आम जनता को आजादी के मायने समझाते रहते हैं। 1947 में आजादी के समय बंटवारे की लकीर ने जमीन पर खींच कर जितना दर्द दिया, उससे कहीं अधिक दर्द आज की स्थिति देख होता है। जहां अपने स्वार्थ के लिए देश को बर्बाद किया जा रहा है। भ्रष्टाचार और स्वार्थ को हमने अपनी संस्कृति और जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। हम अपने ही देश को खोखला कर रहें हैं। 

2020 की शुरुआत से ही हम सभी देशवासी संघर्ष की स्थिति से गुजर रहे हैं। आज जब हम विश्व शक्ति बनने का सपना देख रहे हैं। उस समय दंगे, भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर राजनीति, शिक्षा के मंदिरों में साजिश और कानून का डंडा देखने के साथ ही साथ अब तक की सबसे खतरनाक महामारी से लड़ रहे हैं। आजादी के 73 साल पूरे हो गए, पर अभी तक हम अपने सभी देशवासियों रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आम मौलिक जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाये। जब कि यह हर व्यक्ति का मनुष्य होने का अधिकार है। जब लोग भूख से परेशान हो छत और अपनों की चाहत में कोषों मिल की दूरी पैदल तय करें बिना अपने पैरों के छालों को देखें मौत के आगोश से भी ना डरें। तब यह विचार करना जरूरी है कि हम किसी बात की खुशी बना रहें हैं। यदि हमारे देश में कुछ राज्यों में हर साल आने वाली बाढ़ से बचाने के लिए सरकार कोई विचार करना जरूरी नहीं समझती है। चाहे फिर उस बाढ़ के पानी में इंसान का सब कुछ तबाह हो जाएं और भविष्य के सपने दम तोड़ दें। तब क्या एक दिन झंडा फैला कर हम झूठी मुस्कान दिखा कर महान देश होने का झूठा सपना कब तक देखने वाले है।

हमारे युवा वर्ग को चाहिए कि वे संगठित होकर देश-निर्माण एंव भारतीय समाजिक विकास की योजनाओं पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करें- उन्हे समझ लेना चाहिए कि हमें आगें आना होगा और ये सोच को छोडना होगा कि इतना बडा भारत- “हमसे क्या होगा”। याद रखें एक व्यक्ति भारत को बदल सकता है आवश्यक्ता तो साकारत्मक सोच की है। नारेबाजी और भाषणबाजी द्वारा न चरित्र निर्माण होता है और न राष्ट्रीयता की रक्षा होती है। नित्य नई माँगो के लिए किये जाने वाले आन्दोलन न तो महापुरुषो का निर्माण करते है और न स्वाभिमान को बद्धमूल करते हैं। आँखे खोलकर अपने देश की स्थिति परिस्थिति का अध्ययन करें और दिमाग खोलकर भविष्य-निर्माण पर विचार करें।

वर्षों पहले #स्वामी_विवेकानंद ने भारतीयों को आहवान करते हुए कहा था 'एक बात पर विचार करके देखिये, मनुष्य नियमों को बनाता है या नियम मनुष्यों को बनाते हैं? मनुष्य रुपया पैदा करता है या रुपया मनुष्यों को पैदा करता है? मनुष्य कीर्ति और नाम पैदा करता है या कीर्ति और नाम मनुष्य पैदा करते हैं? मेरे मित्रो, पहले मनुष्य बनिये, तब आप देखेंगे कि वे सब बाकी चीजें स्वयं आपका अनुसरण करेंगी। परस्पर के घृणित द्वेष-भाव को छोड़िये और सदुद्देश्य, सदुपाय, सत्साहस एवं सद्दीर्य का अवलम्बन कीजिये। आपने मनुष्य योनि में जन्म लिया है तो अपनी कीर्ति यहीं छोड़ जाइये।...

वत्स, बढ़े चलो, समग्र जगत्‌ ज्ञानलोक के लिए लालायित है, उस ज्ञानलोक को प्राप्त करने के लिए उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से जगत्‌ हमारी ओर देख रहा है। वीरहदय युवको, तुम यह विश्वास रखो कि अनेक महान्‌ कार्य करने के लिए तुम लोगों का जन्म हुआ है। कुत्तों की आवाज से न डरो, यहां तक कि यदि आकाश से प्रबल वज्रपात भी हो तो भी न डरो, उठो-कमर कसकर खड़े होओ-कार्य करते चलो। भारतवर्ष का पुनरुत्थान होगा, पर वह शारीरिक शक्ति से नहीं, वरन्‌ आत्मा की शक्ति द्वारा। वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, वरन्‌ शांति ओर प्रेम की ध्वजा से... मैं अपने सामने यह एक सजीव दृश्य अवश्य देख रहा हूँ कि हमारी यह वृद्ध माता पुनः एक बार जाग्रत होकर अपने सिंहासन पर नवयोवनपूर्ण और पूर्व की अपेक्षा अधिक महामहिमान्वित होकर विराजी है शांति ओर आशीर्वाद के वचनों के साथ सारे संसार में उसके नाम की घोषणा कर दो। 

एक नवीन भारत निकल पड़े- निकले हल पढ़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछआ, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से। निकले झाडियों, जंगलों,पहाड़ों पर्वतों से।... मेरी समझ में देश के जनसाधारण की अवहेलना करना ही हमारा महान्‌ राष्ट्रीय पाप है और वह हमारी अवनति का एक कारण है। 

जब तक भारत की साधारण जनता उत्तम रूप से शिक्षित नहीं हो जाती, तब तक उसे खाने-पीने को अच्छी तरह से नहीं मिलता, जब तक उसकी अच्छी तरह देख-रेख नहीं होती, तब तक कितना ही राजनीतिक आन्दोलन क्यों् न हो, उससे कुछ फल न होगा। 

ये बेचारे गरीब हमारी शिक्षा के लिए (राजकर के रूप में) पैसा देते हैं, हमारी धार्मिक सिद्धि के लिए (अपने शारीरिक) परिश्रम से बड़े बड़े मंदिर खड़े करते हैं, पर इसके बदले उनको चिरकाल ठोकरों के सिवाय ओर क्या मिला है? वास्तव में वे हमारे गुलाम ही बन गये हैं। यदि हम भारत का पुनरुद्धार चाहते हैं, तो हमें अवश्य ही उनके लिए कार्य करना होगा।... गत दस वर्षों से में अपना मूलमंत्र घोषित करता आया हूँ- प्रयत्त करते रहो! और अब भी में कहता हूँ कि अविराम प्रयत्न करते चलो। जब चारों ओर अंधकार ही अंधकार दीखता था तब मैं कहता था- प्रयत्न करते रहो, अब तो थोडा-थोड़ा उजाला दिखायी दे रहा है, पर अब भी मैं कहता हूँ कि प्रयत्त करते जाओ। वत्स, डरो मत।'@ स्वामी_विवेकानंद 

हमें जमीनी तौर पर अपने यहां बदलाव करने की जरूरत है। देश हमारा है इसकी रक्षा हमें करनी है। इस देश में होने वाला प्रत्येक कार्य हमारा कार्य है। हम किसी झूठी उम्मीद के सहारे अपने देश को हजारों सालों तक कुछ चंद लोगों की ताकत का गुलाम नहीं बनने दें सकते हैं। हमें अपनी आवाज उठनी होगी और वह कार्य करने होंगे जिसमें हमारी आने वाली पीढ़ी के साथ ही साथ हमारे देश का भला हो। हमें एक देशवासी बन हर देशवासी के हित की बात सोचनी होंगी। धर्म और जाति के जहर से खुद को आने वाले कल को बचाने का प्रयास करना होगा। देश के लिए, देश की आबादी के लिए, देश की आजादी के लिए हमें अपनी आंखों पर पड़े पर्दों को हटा कर सच को अपना कर देश भलाई के लिए आवाज उठानी होगी। हम भारतीय है यह कहते हुए केवल गर्व ना हों, घमंड हो। हम भारतीय हैं 130 करोड़ की जनसंख्या वाला लोकतांत्रिक देश। जहां हर कोई आजाद है हर किसी के पास मौलिक अधिकार ही नहीं मौलिक सुविधाएं भी हो।

आज विश्व स्तर पर एक नवीन भारत उभर कर सामने आया है, लेकिन अभी भी हमारी कई कमज़ोरियां हैं और कई चुनोतियों का सामना कर रहे हैं। इन सबका हम सफलतापूर्वक सामना तभी कर पायेंगे जब हम गरीब और दुर्बल की संवेदना को भी समझ कर तथा उसे दूर करने के लिए प्रयत्न करते रहेंगे।

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