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ब से बलिया , ग से गणेशी प्रसाद .

Bhola Tiwari May 12, 2019, 7:04 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा         

 जी हाँ ! महान् गणितज्ञ गणेश प्रसाद बलिया के थे . उनके शिक्षक उनको प्यार से गणेशी कह के बुलाते थे . इसलिए पूरे बलिया के वे गणेशी हो गए . यहाँ तक कि इलाहाबाद के हरिबंश राय बच्चन ने भी अपनी आत्म कथा में उनको गणेशी प्रसाद हीं लिखा है . लेकिन बाहरी दुनियाँ के लिए वे गणेश प्रसाद थे .

हमारे जमाने में कोई गणित में ज्यादा ध्यान देता था तो उसे तुरन्त यह तमगा मिल जाता था - गणेशी प्रसाद बन रहे हो ? जो भी हो , गणेशी प्रसाद की गणित के प्रति जो समर्पण भाव था , वह काबिल -ए - तारीफ़ था . उनका गणित के सवाल हल करते समय जो तन्मयता , तल्लीनता व एकाग्रता थी , वह अन्यत्र दुर्लभ है . ऐसे हीं दो रोचक प्रसंग मेरे पिताजी सुनाया करते थे -

1.. एक बार गणेशी प्रसाद गणित के किसीे सवाल में उलझे हुए थे और उनके सामने से एक पूरी बरात बाजे गाजे के साथ गुजर गई और गणेशी प्रसाद को पता तक न चला .

2.. एक बार गणेशी प्रसाद के पीठ में फोड़ा हो गया था . ऑपरेशन होना था . गणेशी प्रसाद ने लोकल एनेस्थीसिया के लिए भी मना किया . वे एक अनसुलझा गणित का सवाल लेकर बैठ गए .सवाल हल होता रहा और आप्रेसन भी चलता रहा . गणेशी प्रसाद को जरा भी तकलीफ नहीं हुई .

श्री गणेशी प्रसाद का जन्म 15 नवंबर सन् 1876 में बलिया के किसी ग्राम ( यदि किसी सज्जन को उनके गाँव का पता है तो बताने का कष्ट करें ) में एक कायस्थ परिवार में हुआ था . MA ( maths ) इलाहाबाद से करने के पश्चात् वे छात्रवृति पर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए चले गए . यूरोप में 5 साल गुजारने के बाद 1904 में गणेशी प्रसाद भारत लौटे . उन्होंने A treatise on spherical harmonies पर रिसर्च किया था . 

सर्व प्रथम डॉ गणेशी प्रसाद मूयर कालेज इलाहाबाद में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए . तदोपरांत सन् 1914 - 24 तक कलकत्ता यूनिवर्सिटी के मैथ विभाग के विभागाध्यक्ष बने . सन् 1924 में आजीवन इंडियन असोसिएशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ़ साईंस के अध्यक्ष चुने गए . इस दौरान उन्होंने देश को बहुत बड़े बड़े गणितज्ञ दिए . ए एन सिंह . बी बी दत्ता , गोरख प्रसाद , आर एस वर्मा व बी एन प्रसाद जैसे गणितज्ञ डॉ गणेशी प्रसाद के हीं शिष्य थे . डॉ गणेशी प्रसाद अपने गणितज्ञ समुदाय में Father of mathematics research in India के नाम से मशहूर थे .

डॉ गणेशी प्रसाद अपने अधीन कार्यरत शिष्यों की दिल खोल कर मदद करते थे.उन्होंने बलिया में स्त्री शिक्षा के लिए 22 हज़ार का अनुदान दिया था.आगरा यूनिवर्सिटी को 2 लाख का अनुदान टॉपर छात्रों के लिए दिया था . जब वे आगरा यूनिवर्सिटी के किसी बैठक में भाग ले रहे थे तो 9 मार्च सन् 1935 को अचानक ब्रेन हैमरेज होने से उनका प्राणांत हो गया .

जिंदगी के सफर में राही ,

मिलते हैं विछड़ जाने को .

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