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श्रीकृष्ण की पीड़ा !!

Bhola Tiwari Aug 12, 2020, 6:20 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ. नीरज कृष्ण

पटना : श्रीकृष्ण शब्द ही भारतीय जीवन-प्रणाली का अनन्य उदगार है। आकाश में तपता सूरज जिस प्रकार कभी पुराना नहीं हो सकता, उसी प्रकार महाभारत कथा का मेरुदण्ड – यह तत्वज्ञ वीर भी कभी भारतीय मानस-पटल से विस्मृत नहीं किया जा सकता। जन्मतः ही दुर्लभ रंगसूत्र प्राप्त होने के कारण कृष्ण के जीवन-चरित्र में, भारत को नित्यनूतन और उन्मेषशाली बनाने की भरपूर सामर्थ्य है।

आज मुझे कुछ कहना ही होगा! चौंकिये मत, घबराइए भी नहीं। दौत्य करनेवाले श्रेष्ठ सम्भाषण-चतुर वक्ता के रूप में तो आप मुझे जानते ही हैं, अतः चौंकाने अथवा शंकित होने की कोई आवश्यक्ता नहीं है। गीता में मैंने अपने प्रिय सखा पार्थ से कहा था कि “ऐसा समय न कभी था और न कभी होगा, जब तुम नहीं थे और मैं नहीं था।“ आज पुनः कहता हूँ कि वह बात मैंने केवल अर्जुन से ही नहीं कही थी। हर सजीव से, हर स्त्री-पुरुष से कही थी, और वह भी सदा के लिए। तत्व-रूप से, विचार-रूप से आज भी प्रत्येक चराचर में मैं विद्धमान हूँ।


बाल्यावस्था में ही अलग-अलग नाम और रूप धारण करनेवाले, असुर-राक्षसों का खेल-खेल में अंत करने वाले गोपालकृष्ण के रूप में? जलक्रीड़ा करनेवाली गोपियों के वस्त्र चुराने वाले कन्हैया के रूप में? पहले गोपालों के मुखिया और बाद में यादवों के प्रमुख यौद्धा के रूप में? ‘अवतार’ उपाधि का मोहक वस्त्र ओढ़नेवाले ऐन्द्रजालिक कृष्ण के रूप में? सही समय पर द्रोपदी कि लज्जा-रक्षा हेतु वस्त्र दिलानेवाले चमत्कारी वासुदेव के रूप में? या यों कहिये कि 18 अक्षोहिणी बलवान यौद्धाओं का लोमहर्षक, प्राणघाती, अनावश्यक महासंग्राम रचानेवाले विक्षिप्त खिलाड़ी के रूप में मैं आपसे बात कर रहा हूँ।

मेरा यही आक्षेप है कि ये सरे रूप थोपकर ही आज तक सभी ने मुझे अपने-आप से बहुत दूर रखा है- जानबूझ कर, बड़ी कुशलता से! मंदिर में केवल पूजा करने योग्य देवता बना रखा है आप सबने मुझे! यह आसान भी है और सुविधापूर्ण भी।

‘मैं विष्णु का अंश हूँ’ इस कथन को मानने के लिए तो आप बड़ी सरलता से और प्रसन्नता से तैयार थे, आज भी है और कल भी रहेंगे। शताब्दियों से मैं आग्रहपूर्वक कहता आया हूँ, “मैं अंश रूप में हर-एक के भीतर विद्धमान हूँ” परन्तु इस कथन को मानने को, जानने को आप तैयार नहीं है। ऐसा क्यूँ ?

कृपा करके मुझे अपने से दूर, मंदिर में स्थित ‘वासुदेव’ न मानिये।


कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केन्द्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्यूंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिचती है और आकृष्ट होती हैं। शरीर खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, परिवार खिच कर उसके आस-पास निर्मित होता र्है, समाज खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, जगत खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आस-पास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्ममात्र नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र का जन्म है।

जिसे हम नहीं समझ पाते उसे हम भगवान कहना शुरू कर देते हैं, उसकी पूजा शुरू हो जाती है। भगवान कहने का मतलब है कि जैसे हम भगवान को नहीं समझ पा रहे हैं वैसे ही इस वयक्ति को नहीं समझ पा रहे हैं। जैसे भगवान सदा ही जानने को शेष रह जाता है वैसे ही कृष्ण भी शदियों से जानने- समझने के लिए शेष रह गए हैं।

ध्यान रहे, महापुरुषों की कथाएं जन्म की हमेशा उलटी चलती हैं। साधारण आदमी के जीवन की कथा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर पूरी होती है। उसकी कथा में एक सिक्केंस होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। महापुरुषों की कथाएं फिर से रिट्रास्पेक्टिवली लिखी जाती हैं। महापुरुष पहचान में आते हैं बाद में। और उनकी जन्म की कथाएं फिर बाद में लिखी जाती हैं।

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