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उम्दा फुटबॉल खिलाड़ी थे गीतों के राजकुमार

Bhola Tiwari Aug 11, 2020, 8:51 PM IST कॉलमलिस्ट
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 निरजंन प्रसाद श्रीवास्तव

रांची : सरस्वती के वरद पुत्र, उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि हिंदी गीतों के राजकुमार और महान पत्रकार गोपाल सिंह नेपाली की आज जयंती है।उनका पूरा नाम गोपाल बहादुर सिंह था। उनका जन्म बिहार के बेतिया में काली बाग में स्थित घर में 11 अगस्त, 1911, भादों में जन्माष्टमी के दिन हुआ था।इसलिए गोपाल नाम पड़ा। उनके पिता रेल बहादुर सिंह सैनिक थे। सेवानिवृत्ति के बाद बेतिया राज के असिस्टेंट मैनेजर कॉईल्ड के बंगले पर पहरा देने का काम करते थे। नेपाली की पढ़ाई बेतिया राज स्कूल में हुई। विद्यार्थी जीवन से ही कविता और गीत लिखना आरम्भ किया।स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहने के कारण मैट्रीक परीक्षा के लिए सेंट अप नहीं किये गए। सन् 1932 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में आयोजित 'द्विवेदी अभिनन्दन समारोह' में राष्ट्रीय स्तर का गीतकार घोषित किया गया। वे एक बहुत ही उम्दा फुटबॉल खिलाड़ी थे।उनके भाई बम बहादुर सिंह भी अपने समय के नामी फुटबॉलर थे। पश्चिम चंपारण में अपनी पोस्टिंग के दौरान रामनगर में आयोजित फुटबॉल टूर्नामेंट के फाइनल मैच के दौरान टूर्नामेंट के आयोजक और रामनगर के तत्कालीन विधायक श्री अर्जुन विक्रम शाह के साथ, जो बाद में मेरे विभाग के मंत्री बने, हुई बातों से मालूम हुआ कि गोपाल सिंह नेपाली और उनके भाई बम बहादुर सिंह अपने समय के फुटबॉल लीजेंड थे और आयरन पिलर और आयरन गेट कहे जाते थे।
      उमंग(1933), पंक्षी(1934), रागिनी(1935), पंचमी (1942), नवीन (1946), नीलिमा (1945), हिमालय ने पुकारा (1962) उनके प्रमुख कविता और गीत संग्रह हैं।उन्होंने 57 फिल्मों के लिए तीन सौ से अधिक गीत लिखे। लाल किले पर स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में गोपाल दास नीरज के अलावा गोपाल सिंह नेपाली भी ऐसे कवि-गीतकार थे जिनकी श्रोताओं में सबसे अधिक मांग थी। उस जमाने में राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन, निराला, दिनकर, सोहन लाल द्विवेदी, सरदार अली जाफरी उन कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भाग लेते थे। उन कवि सम्मेलनों और मुशायरों का प्रसारण आकाशवाणी के हर केंद्र द्वारा किया जाता था।सन् 1962 में चीनी आक्रमण के समय 'चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा' कविता का पाठ करते हए सुनना एक विशेष अनुभव का विषय था। उस समय मैं बी० ए० ऑनर्स के अंतिम वर्ष का छात्र था। हम सभी उस ललकार गीत को गुनगुनाते थे।
     भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद गोपाल सिंह नेपाली को हिंदी का 'वर्ड्सवर्थ' कहते थे।नेपाली को टैगोर के खण्डकाव्य 'उर्वशी' का हिंदी में अनुवाद' करने के लिए स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।उन्होंने 'चित्रपट'(दिल्ली), रतलाम टाइम्स (रतलाम), सुधा (लखनऊ), पुण्टा भूमि (मालवा), उदय (वाराणसी) और 'योगी' (बिहार) जैसे पत्र-पत्रिकाओं को अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।
      उनकी कविताओं और गीतों में कई स्वर, रंग और भाव हैं- देशभक्ति, राष्ट्र-प्रेम से लेकर प्रेम की गहन अनुभूति तक। उन्होंने कवि-कर्म से लेकर अपने बारे में बहुत कुछ कहा है। उनकी रचनाओं के कुछ अंश नीचे उद्धृत हैं-
 
हम धरती क्या, आकाश बदलने वाले हैं
हम तो कवि हैं इतिहास बदलने वाले है।

राजा बैठा सिंहासन पर, यह
ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने
कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम।
लिखता हूँ अपनी मर्जी से
बचत हूँ कैंची दर्जी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा वंदन खुदगर्जी से
कोई छेड़े तो तन जाती है, बन जाती है
मेरा धन है स्वाधीन कलम
हर दिल पर झुकती चलती मगर
आँसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

तुम-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो 
मैं भी महलों में रह लेता।

ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से, शासन चलता तलवार से।

बदनाम रहे बटमार मगर
घर तो रखवालों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को
नौ लाख सितारों ने लूटा।

घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार-द्वार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

तू चिंगारी बन कर उड़ री, जाग-जाग में ज्वाल बनूँ
तो बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ
आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ
तू भगिनी बन क्रांति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ
यहाँ न कोई राधा रानी, वृंदावन वंशी वाला
तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरेवाला।

शंकरपुरी, चीन ने सेना को उतारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा
हो जाय पराधीन नहीं गंग की धारा
गंगा के किनारों ने शिवालय को पुकारा।

मन्दिर में तरसते उमर बिक गई
कमर झुकाते झुकाते कमर झुक गई
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार की गाँव में

अजब शोख यह बूँदा बाँदी
पत्तों में घनश्याम बसा है
झाँके इन बूँदों से तारे
इस रिमझिम में चाँद हँसा है।
 
विख्यात छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद उनकी कविता की इन पँक्तियों को गुनगुनाते रहते थे-

पीपल के पत्ते गोल-गोल
कहते रहते कुछ डोल-डोल।
     

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