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आदिवासी विकास का फटा पोस्टर...

Bhola Tiwari Aug 10, 2020, 6:54 AM IST टॉप न्यूज़
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रमेश कुमार रिपु

रायपुर  : जंगल की अपनी मीठी भाषा है। उसका अपना संस्कार है। लोगों को रिझाने वाली कला है। संगीत है और मन को गुदगुदानी वाले नृत्य हैं। आदिवासी न हों, तो जंगल की पहचान मिट जाये। प्राकृतिक सम्पदा की हिफाजत आदिवासी करता आया है। दूसरी ओर विकास के नाम पर सरकार उनके जल ,जंगल और जमीन का सौदा करती है,उनके लिए कुछ सरकारी योजनाएं बनाकर। सरकार ने कभी सोचा नहीं कि, उनकी प्राथमिक जरूरतें क्या है? तेंदूपत्ता की बोनस राशि बढ़ा देना,कुछ को जमीन के पट्टे दे देना,या फिर उनसे जंगली वनस्पत्ति खरीद लेने से ,क्या समूचा आदिवासी समाज का भला हो जाएगा? आदिवासी समाज अब भी फटा पोस्टर है।

सरकार की सोच यही है कि जंगल,सिर्फ जंगली बर्ताव के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक सच यह भी कि सत्ता अपनी धुन पर आदिम राग अभी तक सुनती आई है। उसे लगता है कि बस्तर के आदिवासी हो या सरगुजा का उसे सिर्फ इतना ही उठाओ कि वह वोट बैंक बनकर रह जाये।


रायपुर राजधानी में पिछले साल भूपेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय आदिवासियों का अनूठा नृत्य महोत्सव किया था। इस बार कोरोना की वजह से नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को हर सरकार ने अपना वोट बैंक बनाने का प्रयास किया। 15 वर्षों में रमन सरकार के काम काज से, शायद आदिवासी खुश नहीं थे,इसलिए बस्तर की सभी 12 सीट कांग्रेस की झोली में डाल दिये। लेकिन देखा जा रहा है कि ,अपने जल ,जंगल और जमीन की अब भी वो लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार से और उधोगपति से, साथ ही नक्सलियों से। यह अलग बात है कि छग के आदिवासी ही नक्सली बन कर सरकार से दो दो हाथ कर रहे हैं। 

हैरानी वाली बात यह है कि, छग का आदिवासी वोट सरकार को करता है,लेकिन वह सरकार के कामकाज से नाराज भी रहता है। जाहिर सी बात है कि सरकार पूंजीपतियों से मिलकर उनकी संस्कृति को महोत्सव बना तो देती है,उन्हें लुभाने के लिए कई योजनाएं भी,पर उनका दिल नहीं जीत पाती है। इसकी वजह यह है कि सरकार इन्हें लंगोटी से बाहर नहीं निकाल सकी। चाहती भी नहीं। जानती है कि अभी जल,जंगल और जमीन की बात कर रहे हैं,कल को अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने लगेंगे।

राजनीतिक पार्टियों ने अपने हित के लिए इनसे इनका तीर धनुष लेकर इन्हें हिन्दू बनाया या फिर पैसा देकर ईसाई। आदिवासियों को कुछ सियासी दल सत्ता विरोधी अभियान में लगा रखे हैं। आदिवासी नेता अपना कल्याण इनके दम पर कर रहे हैं,लेकिन ये अल्पसंख्यक के दायरे में ही सिमट कर रह गए हैं। बावजूद इसके यदि सरकार और आदिवासी नेता मिलकर इनके लिए कुछ अच्छा सोचें तो इन्हें भू राजस्व संहिता की धारा 170 के पीछे न भागना पड़े।

छत्तीसगढ़ के जंगल में रहने वाले आदिवासियों का संगीत,नृत्य और उनके त्योहार जंगल का अभिन्न हिस्सा हैं। घोटुल को भुलाया नहीं जा सकता। प्यार, आदमी अपने पुरखों से सीखता है। घोटुल आज भी एक जीवंत प्यार की मिसाल है। नाचने का उत्सव देखना है, तो घोटुल आयें। मांढर की थाप हो या फिर मृदंग,डोल की आवाज़ ,आदिवासियों के उमंग की पहचान हैं। आज ऐसे कई वाद्य यंत्र हैं ,जो हमारे बीच से गुम हो गये हैं या फिर कोई जानता नहीं। थोडका, रूंण, गतका, चरहे, तुम्बा, अलोजा,खंजरी,चीकरा,बांस,तंबूरा, नागाड़ा आदि। आदिवासी आज भी इन्हें बजाने से पहले उसकी पूजा करते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गत वर्ष तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी संगीत और नृत्य का आयोजन हुआ था। शहरी संस्कृति के लोग ,अपनी खुली आंखों से जाना कि दुनिया का आदिवासी, अब केवल आदिवासी नहीं है। वो अपनी पुरखों की परंपरा को आज भी जीना नहीं भूला हैं। यह अलग बात है कि ग्लैमर का रंग उनकी पंरपरा और संस्कृति में अब अपना स्थान बना लिया है। मालदीप, थाईलैंण्ड, बांग्लादेश, बेलारूस,और युगांडा सहित विभिन्न देशों के आदिवासियों के संगम का गवाह बना था रायपुर। राजनीतिक दल यही कहते हैं अब भी,अन्य देशों से आये लोगों ने भी एक बात मानी थी कि,सबले बढ़िया,छत्तीसगढ़िया। गले तक गहना पहने और अपनी साड़ी को टखने तक उठा कर चलने वाली कोई महिला आप को कहीं भी दिख जाये, तो समझ लीजिये वो छत्तीसगढ़िया है। आदिवासी संस्कृति और उसकी अस्मिता की जितनी भी तारीफ की जाये कम है। 

बहरहाल आदिम राग को सत्ता की धुन पर न सुना जाए,तभी आदिवासी और उसकी जीवन शैली के साथ असली परम्पराएं बचेगी।

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