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शिवपूजन सहाय का साहित्यिक योगदान

Bhola Tiwari Aug 09, 2020, 2:20 PM IST कॉलमलिस्ट
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प्रशान्त करण

रांची :  आज से एक सौ सत्ताईस वर्ष पूर्व आज की ही दिन शिवपूजन सहाय का जन्म हुआ था।उनके जन्मदिवस पर उनके हिंदी साहित्य में योगदान की चर्चा कर उसी माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि देने का प्रयास करता हूँ। 

 शिवपूजन सहाय का समस्त जीवन हिंदी-सेवा की कहानी है।उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग हिंदी-भाषा की उन्नति एवम उज़के प्रचार-प्रसार में समर्पित किया।बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन तथा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद इनकी कीर्ति गाथा की अमूल्य धरोहर रही है।

      शिवपूजन सहाय हिंदी साहित्य के क्षेत्र में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से आए जब १९१२ में उन्होंने आरा नगर से उच्च विद्यालय की शिक्षा पूर्ण कर हिंदी शिक्षक के रूप में कार्य करना प्रारम्भ किया था।आरंभिक लेख तथा कहानियाँ शिक्षा,लक्ष्मी, मनोरंजन तथा पाटलिपुत्र आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थी।हिंदी पत्रिकारिता के क्षेत्र में भी इनका योगदान उल्लेखनीय है।१९२१-१९२२ में आरा से निकलने वाली मासिक पत्रिका मारवाड़ी सुधार का सम्पादन किया।१९२३ में वे कलकत्ता के मतवाला मंडल के सदस्य हुए।कुछ समय के लिए इन्होंने आदर्श,उपन्यास तरंग और समन्वय आदि पत्रों का भी सम्पादन किया।१९२५ में माधुरी के संपादकीय विभाग में कार्यरत रहे।१९३० में सुल्तानगंज, भागलपुर से गंगा नाम से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका के सम्पादक मंडल में चले आए।एक वर्ष के बाद काशी आकर साहित्यिक पाक्षिक पत्रिका जागरण का सम्पादन किए।१९३४ में लहेरियासराय, दरभंगा जाकर मासिक पत्रिका बालक का सम्पादन करने लगे।स्वतंत्र भारत में आप बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के संचालक हुए तथा बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से प्रकाशित शोध-समीक्षा प्रधान त्रैमासिक पत्र साहित्य के सम्पादक रहे।

     इनकी लिखी पुस्तकें विभिन्न विषयों और विधाओं में मिलती हैं।विभूति ,कहानी संकलन है, देहाती,दुनिया दोनों प्रयोगात्मक प्रधान उपन्यास हैं।ग्राम सुधार तथा अन्नपूर्णा के मंदिर में नामक दो पुस्तकें ग्रामोधार सम्बन्धी लेखों का संग्रह है तो वहीं दो घड़ी एक हास्य रसात्मक कृति है।माँ के सपूत बाल उपयोगी साहित्य है तो अर्जुन,भीष्म नाम की दो पुस्तकें महाभारत के पात्रों की जीवनी है।प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र बाबू पर इन्होंने राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ भी लिखा।इनके स्मरण में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से स्मृति ग्रन्थ और चार खंडों में शिवपूजन रचनावली भी प्रकाशित हुई।

     हिंदी के गद्य साहित्य में आप एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।इनकी भाषा सरल और सहज थी।इन्होंने उर्दू शब्दों का बड़े धड़ल्ले से प्रयोग किया।प्रचलित महावरों के संतुलित उपयोग से लोकरुचि को छूने की कोशिशें की। इन्होंने कहीं कहीं अलंकरण प्रधान,अनुप्रास बहुला भाषा का व्यवहार किया जो गद्य में पद्य की सी छटा उत्पन्न करने का जोरदार प्रयास था।भाषा के इस पद्यमात्मक स्वरूप के बाबजूद इनके गद्य लेखन में गाम्भीर्य का अभाव नहीं मिलता।इनकी लेखन शैली ओज गुण सम्पन्न तथा कहीं कहीं उनमें वृक्तव्य कला की विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं।

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