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हर गाँव, हर जिले से एक इतिहास निकलेगा....

Bhola Tiwari Aug 09, 2020, 6:28 AM IST कॉलमलिस्ट
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डॉ प्रवीण झा

नॉर्वे  : शुभनीत संपादित अनूदित यह किताब अगस्त क्रांति के बरसी पर आज पलट गया। 1857 और 1942 ऐसे कई बिखरे सूक्ष्म-इतिहास (माइक्रोहिस्ट्री) का जोड़ है। हर गाँव, हर जिले से एक इतिहास निकलेगा। इस क्रांति से अधिक गुमनाम क्रांतिकारी भी शायद ही कहीं मिलें। आप कहीं किसी चौक से गुजर रहे होंगे, एक छोटी मूर्ति या द्वार दिखेगा, जिस पर अगस्त क्रांति के किसी सेनानी की तस्वीर होगी। इसलिए भी कि पारंपरिक कांग्रेस के अधिकतर कार्यकर्ता तो पहले ही जेलबंद कर दिए गए थे, इस क्रांति में भूमिगत लोग ही थे। चूँकि वे कांग्रेस कार्यकर्ता नहीं थे, तो उनका भविष्य भी राजनैतिक हलकों में कम रहा, और इतिहास भी कम लिखा गया। यह दस्तावेज एक अंग्रेज़ जिलाधिकारी की डायरी है। ऐसी असंख्य डायरियाँ और होंगी। उन सबको जोड़ कर ही कुछ बनेगा, और चूँकि वे सभी अलग-अलग नायकों और अलग-अलग माध्यमों से हो रहे थे, तो उन्हें लिखना आसान न होगा। कोई ये जमा करें, और एक वेब-सीरीज़ की तरह अगस्त-क्रांति पर लिखें। मुझे तो इस अकादमिक दिख रही किताब में ही थोड़ा-बहुत डायनैमिक कोण दिख गया, एक फ़िल्म के प्लॉट की तरह। इस साल तो मैं स्वयं किसी और काम में लगा हूँ, लेकिन अगर आप चाहें तो ये सूक्ष्म-इतिहास जमा करते जाएँ। उन सबको एक कॉमन-थ्रेड से जोड़ कर एक लाज़वाब रोचक किताब बनेगी, जो जन-जन तक पॉपुलर होगी। आखिर यह दोनों (1857 और 1942) किसी पार्टी या किसी नेता के आह्वान से अधिक जनता के कई छोटे-छोटे पॉकेट में जन्मी क्रांतियाँ थी। जैसे एक बड़े बम के बजाय कई छोटे-छोटे पटाखे फट रहे हों। इसे बुझाने के लिए भी अंग्रेज़ों को भरपूर बल का प्रयोग करना पड़ा। आजमगढ़ की इस डायरी में एक स्थान पर लिखा है, “मुस्लिमों समेत हजारों लोग ये (गांधी) टोपियाँ पहनते थे और ये टोपियाँ अब केवल राजनीतिक चिह्न भर नहीं रह गई थीं।” 

जब गांधी, नेहरू, पटेल और अन्य नेता जेल में बंद थे, तो यह आंदोलन चला कौन रहा था? इस अपारंपरिक, हिंसक और अराजक क्रांति में गांधी के नाम का सांकेतिक महत्व क्या था? 

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