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भारत पाक सीमा पर एक ऐसी भी समझदारी ...

Bhola Tiwari Aug 09, 2020, 6:15 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली  : भारत पाकिस्तान के सीमा से सटा हुआ एक जिला है कसूर । कसूर में सूफी कवि बुल्लेशाह की मजार है । कहते हैं कि इसे राम के पुत्र कुश ने बसाया था । इसका पहले नाम कुश पुर था , जो बाद में अपभ्रंश होकर कसूर हो गया । कसूर के उत्तर में लाहौर , दक्षिण पूर्व में गांव गेंदा सिंह वाला है । गेंदा सिंह सिख थे । इन्होंने देश की आजादी के लिए क्रांति का विगुल बजाया था । ऐसे क्रांतिकारी की मौत के बाद इस गांव का नाम हीं " गेंदा सिंह वाला "रख दिया गया ।

महान क्रांतिकारी भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु की 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फांसी दी गयी थी । आनन फानन में ब्रिटिश पुलिस ने जेल की दीवार तोड़कर इन तीनों की लाश लाहौर से 40 किमी दूर सतलज नदी में बहा दी । जनता को पता चल गया । जनता ने इन तीनों के अवशेष एकत्र कर गाँव " गेंदा सिंह वाला " में इनका दाह संस्कार किया । बाद में जब क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त की मृत्यु 1965 में हुई तो इनकी भी अंत्येष्टि इसी गाँव में की गयी । गौरतलब है कि 1965 में यह गाँव 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था । लेकिन दोनों देशों की आपसी समझ से न केवल बटुकेश्वर दत्त की अंत्येष्टि इस गाँव में हुई बल्कि भगत सिंह की माँ की अंत्येष्टि भी इसी गाँव में हुई ।

जहाँ पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की लाश अंग्रेजों ने सतलज में प्रवाहित किया था उस जगह का नाम हुसैनी वाला था । हुसैनी वाला विभाजन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बना था । बाद में 60 के दशक में भारत ने पाकिस्तान को 12 गाँव देकर इस हुसैनी वाला को अपने में मिला लिया । 23 मार्च 1985 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हुसैनी वाला का दौरा किया था । राजीव गाँधी ने यहाँ पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की मूर्तियों का अनावरण किया था और देश को एक " राष्ट्रीय शहीद स्मारक " समर्पित किया था ।

भारत में हुसैनी वाला फिरोज पुर जिले का हिस्सा है । पाकिस्तान में गेंदा सिंह वाला कसूर जिले के अंतर्गत आता है । एक सतलज के इस पार तो दूसरा सतलज के उस पार है । हुसैनी वाला के पास इन तीनों शहीदों का राष्ट्रीय स्मारक है तो गेंदा सिंह वाला के पास इनकी अंत्येष्टि किए जाने का प्रमाण है । दोनों अपने अपने ऊपर फक्र करते हैं । आज भी हुसैनी वाला में दोनों देशों का ध्वजारोहण और ध्वज उतारने की सेरेमेनी एक साथ होती है । इस समारोह को देखने के वास्ते दोनों देशों की जनता उमड़ पड़ती हैं ।

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