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बाढ़ और संवाद हीनता

Bhola Tiwari Aug 08, 2020, 2:07 PM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश मिश्रा

जमशेदपुर  : मैं कुछ पिछले कुछ वर्षों से बिहार की बाढ़ की समस्या का अध्ययन कर रहा हूं और इस सिलसिले में मेरी बहुत सी बुजुर्गों से मुलाकात हुई है जो ज्यादातर गांव में रहते हैं। उनके बचपन या जवानी के समय की बाढ़ का हाल जानने के लिए मैं उनसे बार-बार पूछा करता हूं कि आप बाढ़ को किस तरह से देखते हैं। इन बुजुर्गों का कहना होता है कि पहले बाढ़ का पानीआता था और चला जाता था। यहां रुकता नहीं था। हमारी बाढ़ ज्यादा से ज्यादा ढाई दिन की हुआ करती थी और उसका पानी खूंटा देख कर डरता था। उनके अनुसार बाढ़ या नदी का पानी जब उनके गांव तक पहुंचता था तो पहला घर जो गांव का मिलता था उस पर जानवरों के बांधने के खूंटे होते थे। वहां पहुंचते ही पानी वह वापस लौट जाता था। उसके आगे आमतौर पर बढ़ता नहीं था।

बाढ़ का नाम सुनते ही हमारे सामने जो दृश्य उभरता है वह किसी नदी के किनारे के गांव का होता जहां बाढ़ का पानी उफन रहा हो और उससे बचने के लिए लोग किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में अपने बच्चों और जानवरों के साथ कभी पैदल तो कभी पानी में घुटने या कमर तक डूबे हुए अथवा नाव में बैठ कर अपनी जगह खोजने में लगे रहते हैं।


 अंग्रेजी भाषा में बाढ़ के लिये एक ही शब्द होता है जिसे फ्लड कहते हैं। बहुत ज्यादा पानी आ जाने पर जिसका कोई भी इलाज संभव न हो उसे हम लोग पहले कहते हैं और विनाश अकल्पनीय हो उसके लिये deluge (प्रलय) शब्द का प्रयोग होता है। बाढ़ और तथा प्रलय के बीच में, जहां तक मेरी जानकारी है, अंग्रेजी भाषा का कोई शब्द नहीं है। इन ग्रामीणों के पास बीच की बहुत सी बाढ़ों के लिये भी के लिए शब्द हैं।

 बिहार के मिथिला क्षेत्र में बाढ़ के कई रूप देखने को मिलते हैं। उसी के अनुसार उनके नाम और परिभाषायें भी अलग-अलग है। गर्मी के मौसम की शुरुआत में जब पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगती है तब यहां की नदियों में पानी का रंग बदलने लगता है जो अमूमन मटमैले लाल से काले रंग के बीच में होता है। इस पानी को नदी के मजरने का परिणाम कहा जाता है। कुछ गुणी लोग इस पानी के रंग को देख कर आने वाली बरसात में होने वाली तबाही की भविष्यवाणी तक कर दिया करते थे। बारिश के शुरुआती तेज फुहारे गर्मी में उड़ती धूल को शांत करते थे। जैसे-जैसे समय बीतता था धान की बुआई शुरू होती थी और किसान यह आशा करता था कि रोपानी शुरू होने तक नदी उनके खेतों का एक-आध बार चक्कर काट लेगी। नदी के पानी का खेतों तक आना और वहीं बने रहना बाढ़ की परिभाषा में आता था। सिंचाई के लिए पांच बार या उससे अधिक बार खेतों में पानी की जरूरत पड़ती थी। यह काम नदी बिना किसी लागत के पूरा कर दिया करती थी।

 कभी-कभी नदी का पानी गांव के रिहायशी इलाकों में दरवाजे तक हिलोरें मारता था बाढ़ की स्थिति को बोह कहा जाता है।

 25-30 साल के अंतराल पर कभी ऐसे अवसर आ जायें जब नदी का पानी इतना ऊपर आ जाये कि वह घरों की खिड़कियों तक पहुंच जाये और गाय, बैल, भैंस जैसे जानवर आदमी की आधी ऊंचाई तक पानी में डूब जाये और भैंस पानी में खड़ी-खड़ी हाथी जैसी मालुम पड़ने लगे तो वही बाढ़ 'हुम्मा' कहलाती थी। यह पूर्व सूचना होती थीं कि पानी और ज़्यादा पानी बढ़ने पर जानवरों को खूंटे से भगवान का नाम लेकर खोल देना पड़ेगा वरना वह बंधे-बंधे यूं ही मारे जायेंगे। खेतिहर घरों में जानवरों की हैसियत परिवार के सदस्य जैसी ही होती थीं। गांव-घर में पानी का स्तर और ज्यादा बढ़ना, उसमें लहरों का उठना, तथा ऐसी स्थिति पैदा हो जाना कि जानवरों को खूंटे से खोल कर छोड़ ही देना पड़े तो ऐसी बाढ़ को 'साह' कहते हैं। अपने पूरे जीवन काल में दो बार साह का अनुभव करने वाले और उस घटना को याद रख पाने वाले लोग बिरले ही हुआ करते थे। इसके बाद भी अगर कुछ होता था तब कहीं जाकर उसे प्रलय की श्रेणी में आता था।

 नदी के किनारे रहने वाले लोग बड़ी सहजता से बताते हैं कि उनके घरों में कभी झाला नहीं लगता था क्योंकि झाला लगने के पहले ही नदी उनके घरों को बहा ले जाती थी। ऐसे समय में वह किसी पूर्व निश्चित स्थान पर शरण लेने के लिए चले जाते थे और नदी के शांत होने पर फिर वापस आकर के वहीं अपनी झोपड़ी डाल लेते थे। नदी से उनको कभी डर नहीं लगता था।

आजकल वह ढाई दिन की बाढ़ ढाई महीने की बाढ़ हो गयी है और अब वह गांवों तक ही सीमित नहीं है, उसकी चपेट में शहर भी आ रहे हैं। इतना समय, श्रम और पैसा ख़र्च करने के बाद हमारा हासिल इतना ही है। कहीं न कहीं हमसे भूल जरूर हुई है।

क्रमशः 2

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