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लीलावती का बलिदान

Bhola Tiwari May 11, 2019, 5:34 PM IST टॉप न्यूज़
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 एस डी ओझा

लीलावती विवाह होते हीं विधवा हो जाएगी - इस बात का पता लीलावती के पिता भास्कराचार्य को था । उनको उसके विधवा होने की नियत तिथि और पल का भी पता था । इसलिए उन्होंने उस पल से पहले हीं अपनी बिटिया की शादी करनी चाही । पहले घड़ी नहीं थी । इसलिए भास्कराचार्य ने एक कृत्रिम घड़ी बनाई । एक कटोरे के पेंदे में सूराख बनाकर उसे घड़े के पानी के तल पर रख दिया । कटोरे के सूराख से पानी कटोरे में आना शुरू हो गया । तय था कि कटोरे में जब पानी भर जाएगा तो वह पल आ जाएगा । उसके पहले शादी निपटा देने की कोशिश होने लगी । कटोरे में पानी धीरे धीरे आ रहा था । शादी की रश्म भी अपनी गति से जोर पकड़ रही थी । अचानक लीलावती के हाथ के कंगन का एक मोती निकल उस कटोरे में जा गिरा, जिससे कटोरे का छिद्र बंद हो गया । कटोरे का भरना अब बंद हो गया था । इस बात का पता किसी को नहीं चला । कटोरा भरा नहीं । नियत पल आ चुका । लीलावती की शादी उस तय पल के बाद हुई और उसका पति अचानक गिरा और मर गया । 

आखिर लीलावती विधवा हो गयी । लीलावती दुखी रहने लगी । भास्कराचार्य से बेटी का दुःख नहीं देखा गया । उन्होंने लीलावती को गणित पढ़ाना शुरू किया । पढ़ते पढ़ते लीलावती धीरे धीरे अपना दुःख भूलने लगी । उसे गणित रुचिकर लगने लगा । समय के साथ वह गणित में पारंगत होने लगी । उसने खुद बहुत से गणित के सूत्र लिखे । यह घटना 1150 के आस पास की है । पिता पुत्री ने मिलकर एक गणित शास्त्र की रचना कर दी । इस ग्रंथ में लगभग 625 श्लोक हैं । इसमें खगोल शास्त्र का भी जिक्र है । इसमें अंक गणित की भी विवेचना है । एक दिन शाम को भास्कराचार्य जब ग्रंथ को अंतिम रुप प्रदान कर रहे थे तो लीलावती दीपक जलाकर ले आई । पिता पुत्री को पहचान नहीं पाए । वह बहुत हीं कृशकाय हो गई थी । वह रुग्ण लग रही थी । उसके कनपटी के बाल सफेद हो गये थे । पिता ने उस ग्रंथ का नाम तत्क्षण हीं " लीलावती " रख दिया । यह पिता की तरफ से अपनी पुत्री को दिया गया एक नायाब तोहफा था ।

भास्कराचार्य ने लीलावती ग्रंथ के बारे में लिखा है -

 येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिल व्यवहृति खलु कण्ठासक्ता।

लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम्॥

(जिन शिष्यों को जोड़, घटाना, गुणा, भाग, वर्ग, घन आदि व्यवहारों, गणित के तमाम अवयवों से विभूषित लीलावती ग्रन्थ कण्ठस्थ हो जाता है, उनकी गणित सम्पत्ति सदा उच्च कोटि की होती है। )

आज भी लीलावती के नाम पर एक पुरस्कार दिया जाता है , जो गणित क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने वाले लोगों के लिए होता है ।

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