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विरोध का कारण सिर्फ यह नहीं हो कि विपक्ष में हैं

Bhola Tiwari Aug 04, 2020, 7:59 AM IST कॉलमलिस्ट
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नीरज कृष्ण

पटना  : क्या विरोध करने का मात्र यह अर्थ होता है कि महज विरोध के लिए हम अपनी संस्कृति और पहचान का भी विरोध करने लगेंगे। यह अशिष्टता क्यों पनप रही है, इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है। इस अशिष्टता के लिए हम युवा पीढ़ी को भी पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। इसके लिए परिवार, सामाजिक वातावरण व हमारी दोषपूर्ण शिक्षा नीति भी जिम्मेदार हैं। 

संपूर्ण विश्व में भारत की पहचान नैतिकता से है। दशकों के एक छोटे से अंतराल में नैतिक मूल्यों का पतन आश्चर्यजनक स्तर तक हो चुका है। आज की युवा पीढ़ी तो पागल हाथी की तरह नैतिकता व संस्कारों को भुलाकर अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते हुए चली जा रही है। वह इस बात से बेखबर हैं कि जब भी जमीन पर गिरेंगे तो क्या हाल होगा। अगर ईमानदारी से सोचें तो अनैतिकता व अशिष्टता को फैलाने वाले कोई और नहीं अपितु हम ही हैं।

विरोध की अवधारणा कोई नई नहीं है। अगर दुनिया अपने इतिहास पर गौर करे तो विरोध जितनी सकारात्मक सोच कोई और नहीं है। हर नया विचार पुराने विचार के विरोध पर ही खड़ा होता है। बदलाव विरोध से ही शुरु होता है चाहे वो बदलाव वैचारिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक। हर विचार के पीछे विरोध महत्वपूर्ण है।  

क्या सीता ने विरोध नहीं किया था जब उन पर श्रीराम ने सवाल उठाए थे। सीता का विरोध इस स्तर पर था कि उन्होंने वापस राम के महल में जाने से उचित धरती में समा जाने को समझा। यदि कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने शस्त्र त्यागने की कोशिश न की होती तो श्रीकृष्ण गीता का पाठ शायद ही पढ़ाते। हिंदू धर्म में बढ़ते आडंबर के विरोध में ही बौद्ध एवं जैन धर्म का आविर्भाव हुआ। कबीर का निर्गुण भी तो विरोध के ही स्वर हैं। 

कल(05/08/20) देश के माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसला के पश्चात चीर प्रतीक्षित श्रीराम जन्मभूमि पर पुनः एक बार भूमि-पूजन कर मंदिर निर्माण के मार्ग को प्रसस्त किये जाने की ओर पहला कदम होगा। 

कई राजनीतिक दलों/ संगठनों के द्वारा यह आवाज उठाई जा रही है कि संविधान की शपथ लेकर पद पर बैठने वाला व्यक्ति, बिना पत्नी के कैसे किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले सकता है। देश के एक बहुत ही बड़े सर्व-स्वीकृत पीठाधीश ने यहाँ तक कह दिया कि श्रीराम मंदिर का भूमि-पूजन अशुभ मुहूर्त में हो रहा है। जहां तक मेरा अपना निजी विचार है कि देश का प्रधानमंत्री राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है और इस लिहाज से वह देश के अभिभावक भी है और उन्हे भी इस आयोजन में शरीक होने का, प्रमुख कार्यकर्ता होने का हक है। दूसरी जो प्रमुख बिन्दु है वह है- कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो इस एतिहासिक घड़ी का साक्षी नहीं होना चाहेगा। 

कल जब हम-आप नहीं होंगे, प्रधानमंत्री मोदी भी नहीं होंगे, जस्टिस गोगोई भी नहीं होंगे, तब भी शिलापट्ट/दस्तावेज साक्षी बनेंगे कि इस मंदिर के निर्माण प्रक्रिया के अग्रदूत कौन-कौन बने थे। जब हम एक मामूली से घटना, व्यक्ति, स्थान, उपलब्धि के साक्षी होते हैं तो उन घटनाओं को, तस्वीरों को लोगों के साथ साझा कर गौरव महसूस करते हैं। दुनिया में विरले लोग होंगे जो खुद को ‘अमरत्व की यातना’ से अलग रखने का माद्दा रखते होंगे। चाहे एक सामान्य व्यक्ति हो या देश का प्रधानमंत्री, हर कोई इस लोभ के संवरण मे फंसा हुआ होता है। 

राम-कृष्ण हमारे सांस्कृतिक धरोहर हैं। हमारी पहचान हैं। दुनिया को हम अपना यही परिचय देते है कि यह राम और कृष्ण की जन्मभूमि है, यह बुद्ध और महावीर की भूमि है, दुनिया की सबसे पुरानी शैक्षणिक संस्थान नालंदा वि.वि. हमारे पास है। सत्य भी है और दुनिया के समक्ष यही हमारी सांस्कृतिक पहचान भी है। क्या कभी हमने इस विषय पर ध्यान दिया कि पाँच से सात हजार वर्ष पूर्व भी हम उसी नदी, वृक्ष, पर्वत, उसी राम-कृष्ण को पूजते थे और आज भी उन्हीं चीजों को उसी आस्था से पूज रहे हैं। हमारे साथ की न जाने कितनी सभ्यताएं विलुप्त हो गई, एक साक्ष्य तक शेष नहीं है और आज भी हम उसी भाव से, उसी मस्ती में दुनिया के सामने प्राचीनतम संस्कृति के ध्वजवाहक बने हुए हैं। यही तो हमारी सनातन परंपरा है। जो आजार-अमर है। और आज हम चंद राजनीतिज्ञों के बहलावे मे आकर अपनी ही संस्कृति का विरोध करने लगे हैं। आज राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं कि वी काल्पनिक हैं, कल कृष्ण पर हमारी उंगली उठेगी। 

इस बात को हम अपने मन में गिरह बांध लें कि कुछ गिनती भर के लुच्चे राजनीतिज्ञों का हित इस बात पर निर्भर है कि देश टूटता चला जाये और फिर राजनीतिज्ञ ऊपर बैठ कर बातें करते रहें कि राष्ट्रीय एकता कैसे कायम हो। यदि अब भी हम नहीं चेते तो हिंदुस्तान के छोटे-छोटे राजनीतिक दल देश को खंड-खंड में बाँट देंगे। मैकाले की यही तो सोच थी कि किसी देश को गुलाम बनाना है तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दो, सांस्कृतिक चेतना को विकृत कर दो। जब हमारी संस्कृति ही नहीं सुरक्षित रहेगी तो देश कितने दिनों तक बची रहेगी। 

निश्चित ही हमारा विरोध श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण से हो सकता है, बड़े-बड़े मूर्तियों के निर्माण से हो सकता है, पर राम-कृष्ण, बुद्ध-गांधी से नहीं। क्यूंकि हमारी पहचान यही हैं। जो लोग अमेरिका गए होंगे और वहाँ पर स्थित हिन्दू मंदिरों को यदि देखने का अवसर मिला हो तो फिर शायद यही कहेंगे कि टेक्सास का शिवालय या केलिफोरनिया का राधा-कृष्ण के मंदिर के सम्मुख निर्माणाधीन अयोध्या के श्रीराम मंदिर की भव्यता कुछ भी नहीं है। 

व्यक्तिगत तौर पर मैं खुद इतने भव्य मंदिर के पक्ष में नहीं हूँ क्यूंकि फिलहाल हमारी मूलभूत जरूरतें भव्य मंदिर नहीं अस्पताल है, हमारी जरूरत अभी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति नहीं बल्कि विध्यालय हैं। आज 73 वर्षों के बाद भी हम देश के अंतिम व्यक्ति को दो वक्त का भोजन भी नहीं मुहैया कर सके हैं। शुद्ध जल नहीं मुहैया करा सके, सरकारी शिक्षा का स्तर दिन पर दिन निम्नतर होता चला जा रहा है, बेरोजगारी की चरम स्थिति ने युवाओं को सड़कों पर आवारा भीड़ के खतरे में तब्दील कर दिया है। देश की 80% जनता आज भी मूलभूत समस्याओं से रोज दो-चार हो रही है। वर्तमान सरकार ने कोरोना संक्रमण काल मे जो 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त मे 5 किलो अनाज और एक किलो दाल देना सुनिश्चित किया है, यदि सरकार देश के सभी नागरिकों को भी यह सुविधा मुफ़्त में एक वर्ष के लिए उपलब्ध कराती है तो देश के वित्तीय कोष पर मात्र सवा दो सौ करोड़ का ही भार आएगा जो देश द्वारा अर्जित आय के समक्ष कोई कीमत नहीं रखता है। अभी बिहार मे 300 करोड़ रुपये मे नदी के ऊपर निर्मित पूल उद्घाटन के एक माह के अंदर ही पानी के तेज बहाव से टूट गया और संबंधित विभाग का मंत्री बेशर्मी से बयान देता है कि यह सब तो होता ही रहता है। 300 करोड़ अर्थात इतने में तो देश की पूरी आबादी को 5 किलो अनाज और एक किलो दाल मिल सकती है। 

जहां हमें विरोध करना चाहिए था वहाँ हम चुप हो जाते हैं। इसके पीछे भी फिर वही राजनीतिज्ञों की कुटिल चाल है। विपक्ष जिन्हे विरोध करना है वे सत्ता में जाकर वही करते हैं जो आज की सत्ता कर रही होती है। 

विरोध को हमेशा महत्व दिया जाना चाहिए क्यूंकि सही मुद्दे पर विरोध कभी बेकार नहीं होते। बिना विरोध के न तो कोई गुणात्मक सुधार हुआ है और न होगा। हम जहां और जिन परिस्थितियों में रहते हैं उसको बेहतर करना सभी की ज़िम्मेदारी है और इसके लिए विरोध एक मौलिक हथियार है इसलिए विरोध जारी रहे बस मुद्दे ईमानदार हों। 

जब सरकार की इच्छा है कि अयोध्या जी राम लला के जन्म-स्थली पर एक बहुत ही खूबसूरत भव्य मंदिर का निर्माण हो तो हम सबों को धर्म, जाति, पक्ष-विपक्ष भूल कर मंदिर के निर्माण में अपनी सहयोगात्मक एवं सकारात्मक भूमिका निश्चित ही अदा करनी चाहिए ताकि हम साक्षी बन सकें कि स्वतंत्र भारत मे पहली बार विश्व-स्तर की कोई इमारत(मंदिर) का निर्माण हो और अयोध्या विश्व-पर्यटन स्थल के रूप में चिन्हित हो। 

चलते-चलते 

1 जब डॉ कलाम 2002 मे राष्ट्रपति पद के प्रत्यासी बनाये गए थे और उनका नॉमिनेशन फाइल होना था, तब उस समय के भाजपा के तेज-तर्रार नेता प्रमोद महाजन उनसे मिलने गए और उनसे पूछा कि आप कोई शुभ तिथि या मुहूर्त बताएं जिस समय आप राष्ट्रपति पद के लिए नॉमिनेशन फाइल करना चाहेंगे। तब डॉ कलाम ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी कि “जब तक पृथ्वी अपनी निर्धारित धुरी पर चक्कर लगा रही है, तब तक हर पल शुभ है। और जिस क्षण भी पृथ्वी अपने निर्धारित अक्ष से जरा भी इधर-उधर हुई, सब अनर्थ हो जाएगा।

2 जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से यह पूछा गया कि आपको इतने बच्चे कैसे हो गए। तब उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कि तब मैं विपक्ष में था और मुझे सरकार के परिवार-नियोजन नीतियों का विरोध करना था। 

अतः सिर्फ सरकार के नीतियों का विरोध करना है, के लिए विरोध न करे। ईमानदार मुद्दों का सदैव विरोध होना चाहिए वह भी पूरी निष्ठा से।   

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