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सभ्य समाज का मुंह काला

Bhola Tiwari May 10, 2019, 4:42 PM IST टॉप न्यूज़
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अलका मिश्रा

बलात्कार यानि बलात् किए गए कार्य..विगत कुछ समय से यह शब्द मीडिया में ज्यादा ही सुर्खियाँ बटोरे हुए है फिर वो चाहे प्रिंट मीडिया हो,या सोशल, या फिर इलेक्ट्रॉनिक।छः महीने की बच्ची से लेकर साठ वर्ष की वृद्धा तक,सभी एक असंभावित भय से आक्रांत हैं।

             'बलात्कार' से भी ज्यादा प्रचलित एक और शब्द है जो कि अँग्रेजी शब्दकोश से लिया गया है वो है 'रेप'।बलात्कार शब्द का भावार्थ विस्तृत परिप्रेक्ष्य में लिया जाए तो किसी के साथ जबरन किए गए सारे कार्य इसमें समाहित हैं फिर वो चाहे स्त्री हो या फिर पुरुष।दुसरी ओर रेप शब्द सिर्फ स्त्रियों पर किए गए उत्पीड़न को ही दर्शाते हैं।बहरहाल, बलात्कार हो या रेप ये किसी भी सभ्य समाज के मुँह पर जोरदार तमाचा है।

             हाल ही में घटित यौन उत्पीड़न संबंधी कुछ चर्चित घटनाओं पर यदि गहराई से मंथन किया जाए तो इसने देश के हरेक संवेदनशील लोगों को झकझोर डाला, विरोधस्वरूप अपने-अपने स्तर से हर किसी ने भड़ास निकाला लेकिन क्या इससे इन घटनाओं में कोई कमी आई..बिल्कुल नहीं, उल्टे बढ़ोतरी ही हुई।अब तो छोटे-छोटे गाँव-कस्बों आदि में भी ये कृत महामारी की तरह विधि-व्यवस्था को धता बता कर फैलते जा रहे,इसके बाद तमाम कानूनी प्रक्रियाएँ भी अपनी आईपीसी की धाराओं के साथ मैदान में कूद जा रही।लेकिन,क्या इसका असर या भय इन हवशी दरिंदों में है....बिल्कुल नहीं,क्योंकिअगले ही दिन फिर ऐसी ही खबर फिर सुनने व देखने को मिल जा रही।सवाल है कि आखिर ये उफान हाल के दिनों में ज्यादा बढ़ा है या पहले भी ऐसा ही था लेकिन उसे दबा दिया जाता था??आखिर वो कौन और किस मानसिकता के लोग हैं जो अपनी हवश पुरी करने के लिए दुधमुँहे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहें??क्या वेद-उपनिषद, कुरान, बाईबल किसी में वो सामर्थ्य नहीं रह गया है इस नीच कृत्य से मनुष्य को दुर रखने की??आखिर वो कौन सी मनोवृत्ति है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष को रौंद कर सुखद अनुभूति से आनंदित होता है??

            अगला चरण होता है आरोप-प्रत्यारोप का..फिर वो चाहे सत्ता पक्ष पर लगाया जाए या प्रशासनिक व्यवस्था पर।कोई ईमानदारी से इन घटनाओं के पीछे अपनी जवाबदेही लेने को तैयार नहीं,धरना-प्रदर्शन, कैंडल मार्च आदि करके सब अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते है।वस्तुतः ऐसी घटनाओं के लिए पुरा समाज दोषी है जो कि दिनोंदिन आवरण में आधुनिक होते जा रहा, सोच में नहीं।आज भी मनुष्यों में पाश्विक वृत्ति समाप्त नहीं हुई है सिर्फ़ दबाई गई है जो कि वक्त और मौका देखकर अपना जबड़ा खोल देती है अफसोस कि इस वृत्ति से तथाकथित सभ्य समाज भी अछूता नहीं है फिर वो चाहे इस विषय के विरोध में बढ़-चढ़कर बोलने वाले हों,या फिर अपनी नेतागिरी चमकाने वाले हों,या धर्म के नाम पर लंबा-चौड़ा हितोपदेश देनेवाले हो,या रक्षक बन कर अपने कर्तव्यों की औपचारिकता निभाने वाले कानूनी नुमाइन्दे हो,या फिर रोष व्यक्त करते हुए लंबा संपादकीय लिखने वाले लोकतंत्र का चौथा स्तंभ !लिखने को तो बहुत सारी नंगी सच्चाइयाँ हैं जो इस अनैतिक कार्य में डुबे हुए सफेदपोशों को उजागर कर देऔर जो सोशल मीडिया के सुधिजनों की जानकारी से परे नहीं है।कुछ लोग तो सलाखों के पीछे गए लेकिन बहुतायत में ये आज भी हमारे ईर्दगिर्द ही हैं और समाज द्वारा सम्मानित भी किए जा रहे हैं,जरूरत है समाज की मानसिकता बदलने की और दोहरे आवरण ओढ़े हुए सफेदपोशों को बेनकाब करने की जो कि पीड़ित पक्ष अकेले यह सब नहीं कर सकता क्योंकि कुछ पीड़िताओं ने बहादुरी से कानून का सहारा लेने की गुस्ताखी की भी तो लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद वो आवाज विलुप्त हो गई और आरोपी बेहयाई के साथ बाहर आ गया क्योंकि हमारे इस पुरुषप्रधान समाज के व्याकरण में रंडी शब्द का पुल्लिंग शब्द मौजूद ही नहीं है..............................

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