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आदिदेव महादेव !!

Bhola Tiwari Jul 27, 2020, 6:21 AM IST टॉप न्यूज़
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नई दिल्ली : महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो। अर्थात महेश्वर से बढ़कर कोई देव नहीं है, महिम्न: स्तोत्र से बढ़कर अन्य कोई स्तुति नहीं है। प्रणव-मन्त्र (ॐ) - से बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र नहीं है।

शिव आदि देव हैं। वे महादेव हैं सभी देवताओं में सर्वोच्च और महत्तम हैं। विश्व के आदि ग्रन्थ ऋग्वेद में उन्हें रुद्र के नामसे जाना गया, मोहनजोदड़ो की सभ्यता में उन्हें ‘पशुपति' के रूप में पहचाना गया और पुराणों में उन्हें महादेव या शंकर के रूप में माना गया। 


शिव कल्याणकारी हैं। उनके नाम के अर्थ में भी यही ध्वनि है। कल्याण करने वाले और आनन्द देने वाले देवता को कौन नहीं चाहेगा? इसलिए शिव की पूजा करते हैं- मनुष्य और देवता ही नहीं, अपितु राक्षस और असुर भी। रावण, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, अन्धक, भष्मासुर, गयासुर और बाणासुर आदि सभी शिव के अनन्य भक्त थे।  

लंका पर आक्रमण करने से पहले श्रीरामचन्द्र जी शिव-पूजन करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण द्वारा प्रत्येक युगमें शिव-पूजन किये जाने की चर्चा है। यजुर्वेद में शिव, शम्भु, शंकर और रूद्र नामों से शिव पूजन के 66 मंत्र उपलब्ध हैं।

सामान्यतः ब्रह्मा को सृष्टिका जन्मदाता, विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना जाता है। परंतु मूलतः यह शक्ति एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही है। इसीलिये स्कन्द पुराण में कहा गया है- 'ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) - की उत्पत्ति महेश्वर – अंश से ही होती है। उसी की शक्ति से पितामह स्रष्टा, विष्णु त्राता और रुद्र संहर्ता हैं। तीनों एक हैं। तीनों महेश्वर के अंश हैं और महेश्वर की माया से सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।'

संहारकर्ता के रूप में भी शिव का महत्त्व कम नहीं। सृष्टि के कल्याण-हेतु जीर्ण -शीर्ण वस्तुओं का विनाश आवश्यक है। इस विनाश में ही निर्माण के बीज छिपे हुए हैं। अत: शिव संहारकर्ता के रूप में ही निर्माण और नव-जीवन के प्रेरक भी हैं। इस दृष्टि से शिव को प्राचीन कालसे ही श्मशान-देवता के रूप में भी पूजा जाता रहा है।


शिव भोले भंडारी हैं और जगत्त्राता भी। सृष्टि पर कभी भी कोई संकट पड़ा तो उसके समाधान के लिये वे सबसे आगे रहे। प्रत्येक कठिन कार्य के समय देवताओं ने भी शिव को ही स्मरण किया और शिव ने उनकी कामना पूरी की। समुद्र मंथन में देवता और राक्षस दोनों ही लगे हुए थे। वे अनेकानेक रत्नों को प्राप्त करने की आशा लगाये हुए थे। रत्न मिले भी, परंतु बाद में सर्वप्रथम तो हलाहल विष निकला, जिसकी गर्मी से सब व्याकुल हो उठे। प्राणि-मात्र के समक्ष प्राण-रक्षा की ज्वलन्त समस्या उत्पन्न हो गयी, देवता और राक्षस भी अत्यन्त भयाक्रान्त हो उठे। विषका क्या किया जाय, कुछ भी तय नहीं हो पाया? कौन ग्रहण कर सकता था विष को ? तुरंत ही ' शिव ' को स्मरण किया गया और वे वहाँ उपस्थित हो गये। समस्या को समझे और बिना किसी हिचकिचाहट के उस सम्पूर्ण हलाहल विष को पी गये। परंतु उसे रखा केवल कण्ठ में ही। विष के प्रभाव से कण्ठ नीला हो गया। देवता और राक्षसों ने मिलकर नीलकण्ठ की जय-जयकार की। समुद्र-मंथन से निकलने वाले रत्नों की प्रतीक्षा या उन पर अपना अधिकार जमाने की किसी भी प्रकार की भावना से दूर रहते हुए शिव निर्लिप्त-भावसे वहाँ से लौट गये। इसी प्रकार राजा भगीरथ के प्रयत्नों से गंगा ने पृथ्वी पर आनेकी बात स्वीकार कर ली। परंतु पृथ्वी उसके प्रचण्ड दबाव और प्रवाह को कैसे सहन कर पाती ? अतएव शिव अपनी जटाएँ खोलकर खड़े हो गये और सृष्टि के कल्याण के लिये गंगा को अपनी जटाओं में अवरुद्ध कर लिया।

एक और घटना लें। शिव की पत्नी सती को मृत्यु हो चुकी थी और शिव कैलास पर्वत पर अपनी लम्बी समाधि में थे। इसी समय तरिकासूर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। और देवताओं को विभिन्न प्रकार से कष्ट देना शुरू कर दिया। देवता परेशान हो उठे। तारकासुर को ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त था कि केवल शिव का पुत्र ही उसे मार सकेगा। परंतु सती से तो शिव को कोई पुत्र प्राप्त ही नहीं हुआ था और दक्ष-यज्ञ में सती की मृत्यु हो चुकी थी, तब शिव का पुत्र कहाँ से आये? सती के वियोग से पीड़ित शिव पुनः विवाह के लिये इच्छुक भी नहीं थे। पार्वती उन्हें पति–रूप में प्राप्त करने के लिये अवश्य ही घोर तपस्या कर रही थीं। लेकिन शिव तो स्वयं समाधिस्थ थे। उन्हें जाग्रत्-अवस्था में लाकर विवाह के लिये मनाने का साहस कौन करता ? किसी तरह कामदेव को तैयार किया गया। वह अपनी सम्पूर्ण उद्दीपक शक्तियों और अप्सराओं को लेकर पहुँच गया। समाधिस्थ शिव के सामने खींच ली अपनी प्रत्यञ्चा सम्पूर्ण वातावरण अत्यन्त मादक हो उठा। समाधिस्थ शिव को कुछ बेचैनी सी महसूस हुई। उन्होंने क्रुद्ध होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। बेचारा कामदेव उसे सहन न कर सका। तत्काल भस्म हो गया। देवताओं में हाहाकार मच गया। वे ‘त्राहिमाम् त्राहिमाम्' करते हुए शिव के सामने आये। कामदेव की निरपराध पत्नी रति भी करुण विलाप कर रही थी। आशुतोष शिव द्रवित हो गये। अनंग के रूप में कामदेव को पुनर्जीवन मिला। पार्वती से विवाह करने के लिये शिव ने अपनी सहमति दे दी। विवाह हुआ और उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुरका वध किया।

 

शिव आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) हैं, इसलिये अपने भक्तों पर शीघ्र ही प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दे देते हैं। एक बार तो भस्मासुर को वरदान देकर स्वयं संकट में फँस गये थे। बड़ी कठिनाई से विष्णु ने अपने बुद्धि-चातुर्य से उन्हें उबारा। 

शिव शक्ति के भी स्वामी हैं। वे पिनाकपाणि हैं। देवताओं के अनेक शत्रुओ का वध उनके हाथों हुआ है। महाभारत में अर्जुन को पाशुपत-अस्त्र भी उन्होंने ही प्रदान किया, जिससे अर्जुन की शक्ति और भी बढ़ गयी। शिव सारी विद्याओं तथा सम्पूर्ण कलाओं के भी प्रथम आचार्य हैं। उनका नटराज-स्वरूप विश्वविख्यात है। संगीत उनके डमरू की देन है। शिव ने 108 मुद्राओं में नृत्य किया था, जिन्हें दक्षिण भारत के चिदंबरम् नटराज-मन्दिर के दीवारों पर अंकित भी किया गया है। भारत के नाट्य-शास्त्र में नृत्य की यही 108 मुद्राएँ स्वीकार भी की गयी हैं।

शिव समन्वय के प्रतीक हैं। उनके लिये अच्छा-बुरा सब समान है। कोई भी वस्तु उनके लिये घृणित नहीं। श्मशान और राजमहलों का निवास उनके लिये समान है। चन्दन और श्मशान के भस्म दोनों को ही वे सहज रूप में स्वीकारते हैं। उन्हें आक, धतूरा भी उतने ही प्रिय हैं, जितने सुगंधित पुष्प। जहाँ उनके मस्तक पर शीतल चन्द्रमा सुशोभित है, वहीं गले में मुण्डमाल और फुफकारते हुए विषैले सर्प हैं। पियूषमयी गङ्गा को वे अपने सिर पर धारण किये हुए हैं, किंतु उनके कण्ठ में हलाहल विष का स्थायी कोष है। वे शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ‘आशुतोष' हैं, परंतु दुष्टों को दण्ड देनेके लिये वे ‘पिनाकपाणि' और 'त्रिशूलधारी' भी हैं। वे सहज कृपालु हैं, परंतु उनमें अटूट दृढ़ता भी है। राम की परीक्षा मात्र के आरोप में ही वे अपनी प्रिय पत्नी सती को त्यागने में भी सक्षम हैं। वे कामदेव को भस्म करने वाले हैं, किंतु दाम्पत्य-जीवन के आदर्श हैं। शिव परम योगी हैं, किंतु पार्वती को अपने आधे शरीर में स्थान देने वाले अर्धनारीश्वर भी हैं। वे प्रलयंकर हैं, परंतु शान्ति के अग्रदूत भी हैं। उन्होंने ताण्डव को जन्म दिया है और उसके साथ ही लास्य (नृत्य-वाद्य)- को भी। उनका एक पुत्र परम शूरवीर और देवताओं का सेनापति है तो दूसरा पुत्र गणेश बुद्धि और मङ्गल का प्रतीक है, ऋद्धि-सिद्धि-दाता है तथा सभी देवताओं में अग्रगण्य और प्रथम पूज्य हैं। सचमुच शिव ही केवल शिव हैं। वे असाधारण हैं, अद्वितीय हैं।

भगवान् शिव के पूजन की विधि भी अत्यन्त सरल है। यूँ शिवरात्रि को रात्रि के प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग पूजन की व्यवस्था है। सम्पूर्ण रात्रि अबाध-रूप में जागते रहने और संकीर्तन करने का भी विधान है। लेकिन ऐसा नहीं कि शिव को प्रसन्न करने के लिये यह सब अपरिहार्य हो। एक लोटा जल और कुछ बिल्व-पत्र ही उन्हें संतुष्ट करने के लिये पर्याप्त है। ये पत्र-पुष्पादि न मिलें तो भी कोई चिन्ता नहीं। किसी भी बहाने उन्हें स्मरण कर लेना पर्याप्त है। गुणनिधि नाम का दुराचारी और जुवारी ब्राह्मण तो चोरी के लिये शिवालय में गया था। रात्रि के गहन अन्धकार में प्रकाश के लिये उसने इधर-उधर से कुछ कपड़ा एकत्रकर जला दिया। शिव इस कार्य को अपने लिये प्रकाश की व्यवस्था समझे और बस, प्रसन्न हो गये। ऐसे ही एक भील वृक्ष पर चढ़ने के लिये शिवजी की प्रतिमा पर चढ़ गया। भगवान् शिव ने समझा कि इस भक्त ने स्वयं अपने शरीर को ही मुझपर भेंट कर दिया है और बस, वे प्रसन्न हो गये। ऐसे सरल स्वभाव के हैं देवाधिदेव ‘महादेव’।

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