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छैल छबीलों के कानों में झूमें बालियां

Bhola Tiwari May 10, 2019, 7:12 AM IST टॉप न्यूज़
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 एस डी ओझा

वैदिक काल के सोलह संस्कारों में से एक संस्कार कर्ण भेदन भी था । कर्ण भेदन संस्कार विधि विधान से किया जाता था । बच्चे के अन्न प्राशन्न के बाद और सोलह महीने के मध्य कर्ण भेदन कभी भी किया जा सकता है । कर्ण भेदन के समय पण्डितों को बुलाया जाता था , जो शास्त्रोक्त विधियों से इस संस्कार को कराते थे ।

भद्रं कर्णेभिः क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।

बचपन में मेरा भी कर्ण भेदन हुआ था । उन दिनों पूर्वांचल में यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध थी -

काना छेदा दिहें मामा ,

हाथ के मिठाईया 

पकड़ा दिहें मामा ।

कर्ण छेदन के बाद खाने को मिठाई मिलती थी । मिठाई के लालच में मुझे कान छिंदवाना महंगा पड़ गया । मैं कान छिदवाने के बाद रो रहा था और मिठाई खा रहा था । माँ ने कितना समझाया था कि तुम्हें मिठाई ऐसे हीं खाने को मिल जाएगी । कान मत छिदवाओ । लेकिन मैं कमा कर खाने में विश्वास करता था । दर्द झेला , रोया तब जाकर मिठाई खाई । मुफ्त की मिठाई खाने में मजा नहीं आता । दोनों कान में एक एक तार लटका दिए गए । जब घाव सूख गया तो वो तार निकाल दिए गए । कान के छेद अब बंद हो गये हैं , पर उसकी निशानी अब भी गौर से देखने पर नजर आती है । आज भी हमारे पूर्वांचल में यह कहावत बहुत हीं मशहूर है - गुड़ खाना है तो कान छिदवाओ ।

पुरुषों द्वारा कान में बाली पहनने की शुरुआत (आज से सात हजार साल पहले) एशिया से हुई थी । कुछ लोग तीन हजार साल और आगे बढ़ जाते हैं । उनका कहना है कि इसकी पहल मेसोपोटामिया से हुई थी । रोम में केवल दास पहनते थे । कान की बाली से दास की पहचान होती थी । कहीं कहीं पहले लड़के की मृत्यु के बाद दूसरे लड़के के कानों में बाली पहनायी जाती थी ताकि उस लड़के के साथ सभी अच्छी देख रेख के साथ पेश आएं । भारत में भी कर्ण भेदन की परम्परा बहुत पुरानी है । राम और कृष्ण का भी कर्ण भेदन संस्कार हुआ था । बात आगे बढ़ी तो कर्ण भेदन शिशुओं की जान बचाने के लिए भी किया जाने लगा । एक ऐसा दौर आया जब नर बलि किसी मनोरथ को पाने के लिए की जाने लगी । नर बलि के रुप में अबोध शिशुओं का चयन होने लगा , पर साथ में शर्त होती कि उस शिशु का कोई अंग भंग ना हो । अतः लोग अपने अपने शिशुओं का अंग भंग करने लगे । उनका कर्ण छेदन करने लगे ।

बहुत दिनों बाद यूरोप में ऐसी भी धारणा बनी कि दाएँ कान में बाली पहनने वाले लोग समलैंगिक होते हैं । वैसे ऐसा कहना निराधार है । अंगूठी कोई दाएँ हाथ की अंगुली में पहनता है तो कोई बाएँ हाथ की । कोई तो अंगूठी पहनता हीं नहीं है । इन तीनों बातों का क्या मतलब निकाला जाय । मेरे विचार से तो कोई मतलब नहीं निकलता । अंगूठी आपकी है , पसंद भी आपकी है । चाहें तो उसे दाएं या बाएँ हाथ की किसी अंगुली में पहनें या उसे सम्भाल कर संदूक में रखें । हो सकता हो कि दाएँ कान में बाली पहनना समलैंगिकों का कोई गोपनीय कोड हो , पर किसी कान विशेष में बाली पहनने से किसी को समलैंगिक का तगमा नहीं दिया जा सकता । गहने पहनने का शौक स्त्री पुरुष दोनों को होता है । दोनों चेन और अंगूठी पहनते हैं । औरतों को कंगन पसंद है तो पुरुष को कड़ा । अब ले देकर बाली बची थी । उसे भी पुरुष पहनने लगे तो इतनी हाय तौबा क्यों ? 

आजकल के पुरुष फैशन परस्त हो गये हैं । वे एक तो क्या दोनों कानों में बालियां पहनने लगे हैं । कल पार्क में एक जवान युगल टहल रहा था । दोनों की कानों में बालियां थीं । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बालियां पहनने वाले पुरुष रोमांटिक होते हैं । उनमें रचनात्मकता ज्यादा होती है । वे दयालु और मिलनसार होते हैं । पर मेरा कहना है कि ऐसे लोग अब तक कहां छुपे थे ? क्या इसके पहले रोमांटिक , दयालु , मिलनसार और रचनात्मक पुरुषों की जरुरत नहीं थी ? आज से पहले ये लोग मिले होते तो इनके कान की बाली कभी ना कभी तो गुम होती , तब इन्हें यूँ अनुरोध करना पड़ता -

हो ढूंढों ढूंढों रे सजनी ! मोरे कान का बाला ।

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