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कई फांके बिताकर मर गया जो ••••

Bhola Tiwari May 10, 2019, 7:01 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

हमारे पूर्वांचल में सोखा  की पूजा होती है । सोखा बाबा को वीर भद्र सोखा कहा जाता है । ये शिव के गणों में से एक हैं । आम तौर पर इनकी पूजा घर में हीं की जाती है । गंगा की लाई मिट्टी से घर के एक कोने में सोखा बाबा की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है । उस दिन चने की दाल की पूरी , गुड़ की खीर , पुआ और पूड़ी का प्रसाद बनता है । सोखा बाबा की याद में औरतें गीत गातीं हैं , जिसे सोखा झूमर कहते हैं । सावन के महीने में दो बुधवार अंजोरिया के सोखा बाबा की पूजा के लिए नियत किए गए हैं । बक्सर के इटाढ़ी में इनका एक मात्र भव्य मंदिर बना है , जहां दूर दूर से पूर्वांचल के लोग आते हैं । सोखा बाबा ग्राम्य देवता माने जाते हैं । इन्हें तंत्र मंत्र का देवता भी माना जाता है । लोग दशहरा में तंत्र मंत्र सीखते हैं और सिद्धी के लिए इटाढ़ी जाते हैं । सिद्धि मिल जाने पर उन्हें सोखा कहा जाता है । पूर्वांचल के लोगों के लिए इटाढ़ी का वही महत्व है जो तंत्र मंत्र की साधना के लिए असम के कौड़ी कामख्या के मंदिर का है ।

हमारे गाँव के पास एक गांव " झरकटहां " है । इस गांव में अधिकत्तर निकुम्भ राजपूत रहते हैं । इन्हीं निकुम्भों के एक एकलौते बेटे के सिर सोखा बनने का भूत सवार हुआ था । माँ बाप ने पढ़ाई लिखाई करवानी चाही , पर बेटे का मन सोखईती में रम गया । वह तंत्र मंत्र साधना में जुट गया । वह सिद्धि हेतु इटाढ़ी भी गया था । वहां से सिद्धि लेकर वह गांव में सोखईती करने लगा । गाँव जवार में उसका बहुत मान जान होने लगा । दूर दूर से उसका बुलावा आने लगा । वह तंत्र मंत्र से लोगों का भूत उतार देता । कहते हैं कि सोखईती में शुचिता का बहुत ध्यान रखा जाता है । एक दिन सोखा लड़का कहीं से भूत उतार कर लाया । उन भूतों को कूर खेत में गाड़ना था । उसने बाग में आम खाया और बाग में हीं सो गया । बिना हाथ मुंह धोए । कहते हैं कि भूत इसी फिराक में रहते हैं कि कब सोखा का ध्यान शुचिता से हटे और वे सोखा पर भारी पड़ें । भूतों को मौका मिल गया । उन भूतों ने उसे पागल कर दिया ।

सोखा पागल हो गया । लोग उसे सोखवा कहने लगे । बच्चे उसे पत्थर मारते । कोई उसे अपने दुआर पर चढ़ने नहीं देता । सब को डर था कि सोखवा के सिर का भूत उनके मत्थे न आ लगे । वह कभी कभार हीं अपने घर जाता । माँ बेचारी उसे भर पेट भोजन कराती । वह उसे घर पर हीं रहने के लिए मनाती , पर वह तो पागल था । एक जगह टिक कर रहना उसकी तो फितरत नहीं थी । पागल होने की वजह से कोई उसे अपनी बेटी भी देने को तैयार नहीं था । इसलिए उसकी शादी नहीं हुई । उसका खानदान आगे नहीं चला । माँ बाप भी एक दिन काल के गाल में समा गये । सोखवा निपट अकेला रह गया । जर जायदाद गोतया दायाद ने हड़प लिया । रात के अंधेरे को सोखवा की आवाज चीरती हुई गुजरती - केहू तातल अन्न से भेंट करायी हो ( क्या कोई गरम खाना देगा ) । मेरे पिताजी और बड़े भाई कलकत्ता रहते थे । मैं और माँ गांव में रहते थे । सोखवा की आवाज बड़ी डरावनी लगती । उन दिनों गाँव में चोरी चकारी खूब होती थी ।

जब सोखवा को कोई खाना नहीं देता तो वह लोगों के दरवाजे पीटना शुरू कर देता । ऐसे में माँ को उठना पड़ता । उसके लिए खाना बनाकर देना पड़ता । जब तक खाना बनता , मैं लालटेन लेकर बैठा रहता । सोखवा भी कोईरी के देवता की तरह मन मारे रहता । खा पीकर जब वह निकलता , तब हम दरवाजा बंद कर सोने जाते । उन दिनों मैं पांचवी कक्षा का विद्यार्थी था । सोखवा के आने पर मैं बहुत भयभीत रहता । उसकी दाढ़ी बढ़ी होती । आंखें धंसी और गाल पिचके हुए थे । वह देखने में भूत जैसा लगता । उसके लिए मुझे दुआर पर बैठना बिल्कुल ही नहीं अच्छा लगता । हर पल ये ख्याल आता कि कोई आ न जाय । कोई चोर या डकैत । सूनी रात झांय झांय कर रही होती । सोखवा के हाथ पैर बहुत कम काम करते । वह अपनी धोती भी बांध नहीं सकता था । वह धोती भी लुंगी की तरह पहनता था ।

सोखवा का पाचन तंत्र भी खराब हो गया था । वह गांव की पगडंडियों पर चलते चलते मल मूत्र त्याग देता । सुबह उठने पर उस मंजर को देख लोग रात को सोखवा के आने का कयास लगाते । सोखवा के घूमने का दायरा छः सात कोस में था । वह मेरे मामा के गाँव कृपाल पुर तक भी जाता था । वहां भी रात के अंधेरे में सोखवा की आवाज गूँजती - केहू तातल अन्न से भेंट करायी हो । वहां भी सोखवा की आवाज नक्कारखाने की तूती साबित होती । कोई उसे खाना देने की जहमत नहीं उठाना चाहता था । सबसे बड़ी बात यह थी कि सोखवा को तातल ( गर्म ) खाना हीं चाहिए था । रात को उठकर उसके लिए गर्म खाना कौन बनाता ? वह इकलौता लड़का था । उसकी माँ ने कभी उसे बासी खाना नहीं दिया था। उसकी आदतें राजकुमारों जैसी थी । 

मैं उन दिनों इण्टर की पढ़ाई कर रहा था । एक दिन जाड़े की सुबह मैं जब खेतों की तरफ जा रहा था तो एक जगह भीड़ देखी । मैं रुक गया । पाले की सफेद चादर से ढका सोखवा मृत पड़ा था । प्रकृति ने उसके लिए स्वतः ही कफन का बंदोबस्त कर दिया था । लोग उसके मरने का कयास लगाने में जुटे हुए थे । मुझे दुष्यंत कुमार का एक शे'र याद आ रहा था -

कई फांके बिताकर मर गया जो, उसके बारे में,

वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा

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