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BIG STORY : अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस को "कामराज प्लान"लागू करना होगा

Bhola Tiwari Jul 16, 2020, 3:08 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : साल 1962 का लोकसभा चुनाव पंडित नेहरू के करिश्माई नेतृत्व के बैनरतले लडा गया था और नेहरू ने कांग्रेस पार्टी को निराश भी नहीं किया।इस चुनाव में कई विपक्षी सुरमा धाराशायी हो गए थे और संपूर्ण देश में कांग्रेस के विजय का परचम लहरा था।जीत की ये खुमारी अभी उतरी भी नहीं थी कि दगाबाज चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया।उन दिनों भारतीय सेना के पास न तो आधुनिक हथियार थे और न हीं युद्ध लडने की तैयारी।नेहरू और उनके रक्षामंत्री मेनन को भरोसा था कि चीन कभी भी भारत पर आक्रमण नहीं करेगा यद्यपि दलाईलामा को भारत में शरण देकर नेहरू ने अपनी कब्र खुद खोद ली थी।

युद्ध हुआ और भारत की बुरी तरह से हार हुई।इस हार ने नेहरू और कांग्रेस पार्टी को जनता के बीच में विलेन बना दिया था।कांग्रेस पार्टी अर्श से फर्श पर आ गई थी।कांग्रेस के कल्चर के अनुसार हार के लिए जिम्मेदार बलि का बकरा खोजा जाने लगा और इस अमृत मंथन में रक्षामंत्री मेनन का नाम सबसे ऊपर था।नेहरू के बेहद करीबी मेनन से इस्तीफा ले लिया गया मगर तब तक आम जनमानस में ये बात घर कर गई थी कि नेहरू और कांग्रेस भी इस हार के लिए जिम्मेदार है।

साल 1963 में हुए तीन लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई,जिससे जनता का मिजाज समझा जा सकता है।इस हार ने नेहरू के पेशानी पर बल डाल दिया था।नेहरू ने अपने बेहद करीबी के.कामराज से इस विषय पर चर्चा की जो उस समय मद्रास के मुख्यमंत्री थे।थोडे हीं दिनों में कामराज ने पंडित नेहरू को ये सलाह दी कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मंत्रीपद से इस्तीफा देकर पार्टी के संगठन में काम करना चाहिए, जिससे पार्टी फिर से जनता में अपना विश्वास कायम कर सके।नेहरूजी को कामराज का ये प्लान बेहद पसंद आया जिसे बाद में "कामराज प्लान" नाम दिया गया।सबसे पहले के.कामराज ने मद्रास के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एक नजीर पेश किया।उसके बाद तो छह वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया।इस्तीफा देने वाले केन्द्रीय मंत्री मोरारजी देसाई, लालबहादुर शास्त्री और जगजीवन राम प्रमुख थे।विभिन्न प्रांतों के छह मुख्यमंत्रियों ने भी अपना इस्तीफा नेहरूजी को सौंप दिया, जिसमें उ.प्र के मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता, ओडिशा के बीजू पटनायक और मध्यप्रदेश के भगवंत राव मंडलोई प्रमुख हैं।कामराज प्लान सफल रहा और कांग्रेस पार्टी ने कुछ हीं सालों में डैमेज कंट्रोल बखूबी कर लिया था।

मुझे लगता है कि आज कांग्रेस के संगठन और कांग्रेस शासित कुछ राज्य सरकारों में कामराज प्लान की बेहद जरूरत है।आप अगर गौर से कांग्रेस कार्यसमिति को देखेंगे तो उसमें अधिकांश बुढे लोग कुंडली मारे बैठे हैं।जिन्हें आराम करने की जरूरत है वो युवाओं का रास्ता रोके खडें हैं।अगर मैं ये कहूँ कि कांग्रेस नेतृत्व हीं बूढ़ा हो गया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है।सोनिया गांधी उम्र संबंधी समस्याओं से जूझ रही हैं, उन्हें बार बार इलाज के लिए विदेश जाना पड़ता है।कार्यसमिति के अन्य प्रमुख चेहरे मनमोहन सिंह जो अब ठीक से चल भी नहीं पा रहें हैं।उम्र का असर साफ साफ दिखने लगा है।गुलामनबी आजाद जो 71 वर्ष के हैं,अहमद पटेल भी 71 वर्ष के हो चूके हैं।मोतीलाल वोरा 93 साल के हैं मगर वो परिवार के प्रति अपनी वफादारी के कारण कार्यसमिति के सम्मानित सदस्य बने हुए हैं।उत्तराखंड के हरीश रावत 72 साल के हो गए हैं।म.प्र के दीपक बावरिया जिन्होंने कभी भी कोई चुनाव नहीं जीता है वो कार्यसमिति के सम्मानित सदस्य हैं।पार्टी महासचिव अविनाश पांडेय जो राजस्थान के प्रभारी भी हैं उन्होंने कभी भी लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं जीता है।सचिन पायलट ने कई बार केन्द्रीय नेतृत्व से अविनाश पांडेय की शिकायत की थी कि वे अशोक गहलोत के साथ मिलकर मेरे खिलाफ साजिश रच रहें हैं।ओमान चांडी 77 वर्ष के हो गए हैं, के.सी.वेणुगोपाल अब केवल केन्द्रीय नेतृत्व की चापलूसी पर हीं आश्रित रह गए हैं।अंबिका सोनी ने 78 वर्ष पूरे कर लिये हैं।मल्लिकार्जुन खड़गे साहब भी 79 साल के हो रहें हैं।ये सभी नेता राज्यसभा की राजनीति करने के लायक बचे हैं।सोनिया गांधी की बुजुर्ग नेताओं से लगाव के कारण कांग्रेस पार्टी में युवा नेतृत्व उभर कर सामने नहीं आ पा रहा।ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवाओं को उनकी मेहनत के बावजूद साइडलाइन कर दिया जा रहा है।म.प्र में सिंधिया की मेहनत को भला कौन भूल सकता है, उसी तरह सचिन पायलट ने राजस्थान में कडी मेहनत कर अपने दम पर विजय दिलाई थी मगर सचिन पायलट की जगह अशोक गहलोत जैसे बुजुर्ग नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया।महत्वाकांक्षी होना कहीं से भी गलत नहीं है, राजनीति में लोग त्याग करने के लिए नहीं आते।मेहनत के बदले वो इनाम चाहते हैं जो कांग्रेस उन्हें नहीं दे पा रही है।ये वही राहुल गांधी हैं जिन्होंने सचिन पायलट को ये आश्वासन देकर राजस्थान भेजा था कि अगर राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनेगी तो पायलट हीं मुख्यमंत्री होंगे।

सिंधिया के साथ भी यही हुआ।मेहनत सबसे ज्यादा सिंधिया ने की मगर मुख्यमंत्री कमलनाथ को ये कहकर बना दिया गया कि वो ज्यादा अनुभवी हैं।आज युवा नेताओं को जिम्मेदारी सौंपने की जरूरत है, उन पर विश्वास कायम करने से वे भविष्य के लीडर बन सकते हैं।हर एक राजनीतिक दल को युवा साथियों को आगे बढाने के लिए बुजुर्ग नेताओं पर तरहीज देनी चाहिए।आपको याद होगा साल 2009 के लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक 82 ऐसे सांसद चुनकर आए थे जिनकी उम्र चालीस के आसपास थी।देखकर लगा था कि अब देश की राजनीति युवाओं के मजबूत कंधे पर टिक गई है मगर बाद में सभी दलों ने युवाओं की अनदेखी की।उस समय राहुल गांधी इन सभी युवाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।उनके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, अगाथा संगमा,अरूण यादव,मानिक टैगोर आदि प्रमुख ऊर्जावान युवा नेता थे।समाजवादी पार्टी की तरफ से युवा अखिलेश यादव ने दमदार इंट्री की थी।आज कांग्रेस को अपना वजूद बचाने के लिए इन युवा पीढ़ी के ऊर्जावान नेताओं पर विश्वास करना होगा नहीं तो कांग्रेस का नाम इतिहास की किताबों में सिमट कर न रह जाए।

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