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महागठबंधन के फीलगुड का भाजपा को फायदा

Bhola Tiwari May 09, 2019, 7:09 AM IST टॉप न्यूज़
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कृष्ण कुमार

उत्तर प्रदेश में सपा -बसपा -रालोद के महागठबंधन के घोषणा के बाद यह कयास लगाया जाने लगा था कि यह गठबन्धन उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से कम से कम 65 से 70 के मध्य जीत दर्ज कर सकती है।लेकिन पांच चरणों के चुनाव के बाद और शेष दो चरणों को लेकर सतह पर जो चर्चा सुनाई दे रही है वह गठबन्धन के लिए थोड़ा निराशाजनक हो सकता है।

सपा -बसपा -रालोद ने इस आम चुनाव में भाजपा को परास्त करने की जो रणनीति अपनाई वह पुरानी और 1990 के दशक की है ।जबकि 2014 के बाद से उत्तर प्रदेश में वोटिंग का पैटर्न बदल गया है।

जानकार बताते हैं कि इन दलों ने यादव जाट समेत अन्य ओबीसी, दलित और मुसलमान वोट को एकमुश्त जोड़कर जो समीकरण गुणा गणित करके सीट गिन रहे है वह हास्यास्पद है।

सच यह है कि इस चुनाव में मात्र मुस्लिम और जाटव वोट को सही ढंग से शिफ्ट कर रहा है,यादवो का भी बहुत बड़ा हिस्सा गठबन्धन को मिलता दिख रहा है लेकिन शेष सभी वर्गों और औऱ यादवो का भी अच्छा खासा हिस्सा वोट मोदी के नाम पर गिर रहा है।

लिहाजा चुनावी रणनीतिक के स्तर पर भी महागठबंधन बहुत फिसड्डी है। भाजपा के कैडर गाँव गाँव पहुँच कर प्रचार किये है और कर रहे है तो सपा बसपा के नेता पदाधिकारी तक बूथ पर पहुँचने में आलस्य दिखाते रहे है। यह स्थिति तब है जब मुख्य धारा की मीडिया मोदी सरकार की भोंपू बन गयी है और सूचना के हर स्रोत पर मोदी सरकार का कब्जा हो गया है।

ऐसे में इन दलों के पास वैकल्पिक मीडिया के साथ जनता के बीच जाने के सिवा कोई विकल्प नही बचता था लेकिन इनके नेता जातिगत समीकरण से चुनावी नैया पार करने का सब्जबाग देख रहे है।इनकी इसी निष्क्रियता और नासमझ रणनीति के कारण यह गठबन्धन 10 से 15 सीट गवां देगा।

इन दलों ने केवल बड़ी बड़ी रैलियां की लेकिन अपने ग्रामीण महिला मतदाताओं को यह बताने में भी असफल रहे है कि सपा बसपा का गठबंधन हो गया है।

बाराबंकी के कई बूथों पर दलित महिलाएं ईवीएम मशीन में हाथी का निशान खोजती देखी गयी जबकि यह सीट गठबन्धन के तहत सपा के खाते में गयी थी।

सियासतदानों का मानना है कि इस चुनाव में जो वर्ग सबसे ज्यादा निर्धारक बन कर उभरा है वह है -अति पिछड़ा और अति दलित।

अगर इन वर्गों के रुझान को देखा जाय तो इसका बड़ा हिस्सा 'देश (!)' के नाम पर मोदी को वोट देता नजर आ रहा है।जाहिर है मीडिया ,आईटी सेल ने अपना काम कर दिया है जबकि गठबन्धन मात्र रैलियों पर निर्भर है ।

उसके कार्यकर्ता इन वर्गों तक न तो पहुँच पाए है और न ही उन्हें देश के नाम पर मोदी द्वारा जनता को गुमराह करने के मामले में कन्विंस कर पाए है।

कांग्रेस के हैवीवेट प्रत्याशियों के मुकाबले में उतारा जाना, भाजपा के झूठ का सफल प्रचार और गठबन्धन की कमजोर रणनीति उसे इस महत्वपूर्ण चुनाव में 45 से 50 सीटो तक समेट सकती है।

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