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अपराधी

Bhola Tiwari Jul 13, 2020, 9:01 AM IST कॉलमलिस्ट
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ध्रुव गुप्त

पटना  : रात के साढ़े दस बज रहे थे। ट्रेन के आने में घंटे भर देर थी। गोपालगंज का छोटा-सा हमारा स्टेशन ख़ामोशी में डूबा हुआ था। सिर्फ़ स्टेशन मास्टर के कार्यालय में लैंप जल रहा था। खुले प्लेटफार्म पर चांदनी पसरी हुई थी। स्टेशन पर आठ-दस यात्री थे जो ज़हां-तहां सीमेंट की बनी बेंचों पर बैठे या लेटे हुए थे। चाय की एक दुकान के सामने वाली बेंच पर मेरा कब्ज़ा था। मैं बेंच के पीछे सिर टिकाए दो दिनों बाद दिल्ली में होने वाले अपने इंटरव्यू को लेकर सोच रहा था कि तीन लोग आकर मेरे बगल की खाली जगह पर बैठ गए। मेरे बगल में करीब सत्तर साल का एक बूढा बैठा। तन पर धोती-कुरता और कंधे पर गमछा। उसके बगल में साठ-पैसठ साल की एक सीधी-सादी बूढी औरत थी जो उसकी पत्नी लग रही थी। सबसे अंत में बीस-बाइस साल की एक लड़की बैठी। जितना देख सका उसके हिसाब से गोरी, लंबी और औसत से ज़्यादा सुंदर। लंबे बाल और बड़ी-बड़ी आंखें। वह गहरे नीले या काले रंग का सलवार सूट पहने थी जिसके कारण उसका उसका गोरापन और निखर गया था।

कुछ देर बूढा अपनी पत्नी और बेटी से बातें करता रहा। बाद में वह मुझसे मुख़ातिब हुआ, 'बबुआ कहां जाईएगा ?' परिचय का सिलसिला चला तो वह मेरे पिता का बचपन का सहपाठी निकला। अपने किसी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने गोरखपुर जा रहा था। उनलोगों ने पूड़ी-भुजिया निकाल कर खाया और आग्रह कर मुझे भी खिलाया। लड़की भी अपने कॉलेज और पढ़ाई के बारे में बताने लगी। हम बातें ही कर रहे थे कि बेंच के पीछे थोड़ी हलचल हुई। मैंने पलटकर देखा। तीन लोग पीछे खड़े लड़की को एकटक घूरे जा रहे थे। उनमें से एक पहलवान जैसा था। उसके दो साथी अपेक्षाकृत दुबले-पतले थे। देखने में तीनों छंटे हुए गुंडे लग रहे थे। उन्होंने लड़की को कुछ अश्लील इशारें किए। मैंने खड़े होकर उनसे कुछ पूछना चाहा तो तीनों धीरे से खिसक गए। बूढ़े के चेहरे से लगा कि वह डर गया है। लड़की आश्वस्त थी। लड़कियों के लिए शायद यह रोजमर्रे की बात होती है।

ट्रेन आई तो वह आधे से ज़्यादा ख़ाली थी।अधिकतर डिब्बों में बिजली गायब थी। मै एक अंधेरे और आधा भरे डिब्बे में घुस गया। मेरे पीछे बूढा भी अपने परिवार के साथ चढ़ा। डिब्बे में मुश्किल से दस-बारह लोग मौज़ूद थे। सबसे पीछे आमने-सामने की दोनों बेंच खाली थी। हम चारों ने अपना सामान ऊपर डाला। वे तीनों चादर बिछा कर एक तरफ़ बैठ गए। मैं उनके सामने वाली बेंच पर लड़की के आगे बैठा। बैठते समय मेरे पैर उसके पैरों को अनजाने ही छू गए तो मुझे संकोच हुआ। मैंने लड़की को देखा। उसके होंठों पर शर्मिली मुस्कान थी। वह खिड़की पर बैठी थी। चांदनी सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थी। चांदनी में नहाया हुआ उसका चेहरा मुझे बेहद मासूम और खूबसूरत लगा। मैं उसे एकटक देखता रह गया। कई बार मेरी चोरी पकड़ी गई, लेकिन बदले में वही शर्मिली मुस्कान ! मैंने लड़की से बातों का सिलसिला चलाया। उसके कॉलेज, उसके शौक और उसकी भविष्य की योजनाओं के बारे में। उसने बड़ी समझदारी से और खुलकर अपनी बातें कही। पढ़ाई पूरी होने के बाद वह शिक्षक बनना चाहती थी। उसने मेरे बारे में पूछा तो मैंने बताया कि मैं सिविल सर्विसेज की लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद इंटरव्यू के लिए दिल्ली जा रहा हूं। कुछ ही देर में हम काफी घुलमिल गए। 

अगले किसी स्टेशन पर लड़की के आसपास मंडरा रहे तीनों गुंडे आकर मेरे बगल की सीट पर काबिज़ हो गए। मुझे देखकर मुस्कुराए। उनमें से एक ने लड़की को श्रीदेवी कहा तो दूसरे ने 'सेक्स बम'। पहलवान ने उसे ' ज़बरदस्त माल ' कहकर पुकारा। लड़की ने आशंकित होकर मुझे देखा। मैंने ईशारों में उसे भरोसा दिलाया। सच्चाई यह थी कि उस वक़्त मैं ख़ुद बहुत भयभीत हो गया था। दो गुंडे के हाथ उनके पैंट की ज़ेब में थे। मुझे लगा कि उनके पास पिस्तौल थी। उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई और बारी-बारी कश लेने लगे। उन्होंने सिगरेट का धुआं लड़की के चेहरे की ओर फेंका। उनके इरादे अच्छे नहीं लग रहे थे। लड़की के साथ किसी अनिष्ट की आशंका मुझे परेशान करने लगी। न जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि उसकी हिफाज़त का दायित्व मेरा है। लड़की खिड़की से कुछ और सटकर बैठ गई। वह भरोसे के साथ मुझे देख रही थी। मैंने आश्वस्त करने के लिए उसके हाथ पकड़ लिए। उसके हाथ कांप रहे थे। तभी शराब की तीखी गंध मेरे नथुनों में घुसी तो मैंने चौंक कर देखा। पहलवान दारू की शीशी गटागट पिए जा रहा था। बची हुई शराब उसने अपने दोस्तों को दी। पीने के बाद पहलवान उठा और मुझे धकियाते हुए लड़की के सामने बैठ गया। मैंने विरोध किया तो उसने मुझे भद्दी-सी गाली दी। उसने लड़की पर नज़र टिका दी और कोई अश्लील गीत गुनगुनाने लगा। लड़की और उसके मां-बाप की आंखों में अब आतंक नज़र आने लगा था। मैं भी सहमा हुआ था। डिब्बे में और लोग थे, मगर हर तरफ़ श्मशान की शांति थी। मै लड़की को देखते हुए आने वाले तूफ़ान की कल्पना ही कर रहा था कि पहलवान ने जम्हाई लेते हुए अपनी एक टांग फैलाई और लड़की के दोनों पैरों के बीच अड़ा दिया। लड़की ने अपने पैर हटाने चाहे तो उसने अपनी दूसरी टांग उसकी गोद में रख दी। बूढ़े ने झपट कर लड़की को छुड़ाना चाहा तो एक गुंडे ने पिस्तौल की मूठ से उसके सिर पर प्रहार किया। वह नीचे गिरकर छटपटाने लगा। दूसरे ने बूढ़ी के मुंह पर गमछा बांध दिया। लड़की ने कातर निगाहों से मेरी तरफ़ देखा। मैं उठकर खड़ा हुआ कि गुंडे ने पिस्तौल मेरे पेट में सटाते हुए कहा, ' यह साली तेरी बहन लगती है क्या ? काहे झूठो का जान देता है हरामजादे ! चुपचाप बैठा रह नहीं तो गोली पेट में उतार देंगे ! '

पहलवान ने अपने साथियों को देखा। उनकी तरफ से कुछ ईशारा पाकर वह उठा और लड़की का चेहरा पकड़कर उसे चूमने लगा। लड़की चिल्लाई। उसके मां -बाप ने भी शोर मचाने की कोशिश की, लेकिन गुंडों ने उनके मुंह दबा दिए। मेरी इच्छा हुई कि पहलवान से भिड़ जाऊं, मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने कुछ देर और इंतज़ार कर लेना उचित समझा। इन गुंडों से भिड़ने से बेहतर है कि एक-दो मिनट बाद अगले स्टेशन पर उतरकर डिब्बा ही बदल लिया जाए। अगले स्टेशन पर ट्रेन दो मिनट के लिए रुकी। न कोई चढ़ा, न कोई उतरा। मैंने कोशिश की बाहर निकलने की, लेकिन मैं डर से ऐसा न कर सका। लड़की लगातार चीख रही थी। पहलवान के साथ उसका अकेला संघर्ष ज़ारी था। वह उसके बाल पकड़कर खींच रही थी। चेहरा नोच रही थी। उसके कपडे जगह-जगह फट गए थे। पहलवान एक हाथ से लड़की का मुंह दबाकर उसके ऊपर सवार हो गया। लड़की का विरोध फिर भी ज़ारी रहा तो पहलवान ने उसे बुरी तरह पीटा। उसका एक साथी लड़की की दोनों टांगें पकड़कर बैठ गया। कुछ ही पलों में लड़की की चीख कराह में बदल गयीं। उसका विरोध ढीला पड़ चुका था। शायद वह अचेत हो रही थी।

पहलवान जब उठा तो उसकी एक आंख से खून बह रहा था। उसने अपने साथी को ईशारा किया। मेरे पास खड़े गुंडे ने पहलवान को पिस्तौल थमाई। इससे पहले कि लड़की करवट बदल पाती, उसकी यातना का दूसरा दौर शुरू हो गया। दूसरा गुंडा जल्दबाजी में था और लड़की को बुरी तरह नोच-खसोट रहा था। लड़की की कराहें पहले से तेज हो आईं थी। उसके हटते ही ट्रेन ने सीटी दी। तीसरा गुंडा अभी लड़की के पास जाकर बैठा ही था कि पहलवान ने कहा, ' टाइम नहीं है, छोड़ दो इसे ! ' गाड़ी की रफ़्तार बहुत कम हो गई थी। तीनों तेजी से गेट की ओर लपके और ट्रेन खड़ी होने के पहले ही किसी सुनसान जगह पर उतर गए। स्टेशन पर ट्रेन कुछ पल के लिए रुकी और चल दी। तीनो गुंडों के उतर जाने के बाद भी डिब्बे में सन्नाटा क़ायम रहा।अगल -बगल से उठकर कोई भी लड़की को देखने नहीं आया। ऐसा तो मुमकिन नहीं था कि लड़की की मर्मभेदी चीखें सुनकर भी उनमें से कोई सोया रह गया हो। शायद वे सोने का नाटक कर रहे थे। 

मैं भयंकर अपराध-बोध से ग्रस्त था। शर्म से मेरी आंखें नहीं उठ रही थीं। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। इच्छा हुई कि मै भी आंखें बंद कर सोने का नाटक करूं, मगर मेरे लिए अब ऐसा करना संभव नहीं था। लड़की अब भी बेहोशी या सदमे की हालत में थी। बालों से उसका चेहरा छिप गया था। दोनों पैर फर्श पर थे। ओढ़नी नीचे गिरी थी। कपड़े जगह-जगह फट गए थे। बूढी होश में आई तो सबसे पहले बेटी के कपड़े ठीक किए और उसे पकड़कर सुबकने लगी। उसके सुबकने की आवाज़ से बूढे को होश आया। बेटी की हालत देखकर वह भी रोने लगा। दोनों ने एक बार भी मेरी तरफ़ नहीं देखा। मैं उनके लिए सहसा अनुपस्थित हो चुका था। मां की निरंतर कोशिशों से लड़की आहिस्ता-आहिस्ता होश में आई। उसने एक नज़र मां-बाप को देखा और हथेलियों में मुंह छिपा लिया। उसकी दबी-दबी चीत्कार सुनकर मेरा दिल बैठा जा रहा था, मगर उसे सांत्वना देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था। यह लड़की मेरी आंखों के सामने जब अपने जीवन के सबसे बड़े संकट से अकेली जूझ रही थी तो मैं उसके लिए कुछ भी नहीं कर पाया था। यह सच है कि तीन-तीन सशस्त्र गुंडों से उसे बचा पाना मुझ निहत्थे व्यक्ति के लिए संभव नहीं था, मगर मुझे कोशिश करनी चाहिए थी। मैंने कोशिश की होती तो शायद इस वक़्त ख़ुद की नज़रों में अपराधी नहीं होता।

रात के डेढ़ बज रहे थे। ट्रेन ने सीटी दी। कोई स्टेशन आने वाला था। मैं धीरे से उठा और दबे पांव शौचालय की ओर निकल गया। डिब्बे के सभी यात्री मुझे देख सोने का नाटक करने लगे। जब मैं वापस लौटा तो देखा कि बूढा अपना बैग और झोला गेट पर रख चुका था। बूढ़ी लड़की को सहारा देकर उठाने का प्रयास कर रही थी। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया। लड़की मुश्क़िल से उठ सकी। उठने के कारण उसकी पीड़ा और बढ़ गई थी। क्या वे लोग अगले स्टेशन पर उतर जानेवाले हैं ? उन्हें गोरखपुर तक जाना था। घटना के बाद उनलोगों ने अपना इरादा शायद बदल दिया हो। गाड़ी स्टेशन पर रुकी तो बूढा बैग और झोला लेकर उतरने लगा। मैंने किनारे खिसक कर उसे जगह दी। उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। उसके पीछे बेटी का हाथ पकड़े बूढ़ी चली। मैं थोड़ा और पीछे खिसका। बूढ़ी ने भी जाते वक़्त मुझे नहीं देखा। मुझे अज़ीब नहीं लगा। उसके पीछे जब लंगडाती हुई लड़की मेरे पास से गुज़री तो मैं बड़ी मुश्क़िल से अपने आंसू रोक पाया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह पलट कर मुझे देखेगी। उसने कातर दृष्टि से बस एक बार मुझे देखा। मुझे इच्छा हुई कि जाते-जाते वह एक करारा थप्पड़ मुझे जरूर मारे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह नज़रें झुकाए नीचे उतर गई। तीनों सामने प्लेटफार्म की एक बेंच पर बैठ गए। बूढ़े-बूढी सूनी आंखों से ट्रेन को ताक रहे थे। लड़की ने हथेलियों से अपना चेहरा ढंक लिया था। उसकी देह कांप रही थी। वह रो रही थी शायद। मैं खिड़की से सटकर बैठ गया। मुझे इंतज़ार था कि वह एक बार मेरी ओर देखे और मैं उससे मांफी मांग लूं।

ट्रेन सरकने लगी। मेरी नज़र अब भी लड़की पर गडी थी। उसने जीवन के कुछ बहुमूल्य पल मुझे दिए थे। आज के बाद उससे शायद ही कभी भेंट हो। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि अलग होने से पहले वह एक बार मेरी तरफ़ देख ले। लड़की ने मुझे नहीं देखा। मेरा मन कबसे भरा हुआ था। अब जाकर आंखों से दो बूंद आंसू टपके।

धीरे-धीरे लड़की और स्टेशन दोनों मेरी निगाहों से ओझल हो गए।

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