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सूखते तालाब की बूढ़ी मछलियां

Bhola Tiwari May 08, 2019, 7:39 AM IST टॉप न्यूज़
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रंजीत

बहुत पहले महान व्यंगकार आबिद सुर्ती का एक उपन्यास पढ़ा था- काली किताब। हालांकि इस उपन्यास के पात्र, संवाद, क्रम आदि भूल गया हूं, लेकिन कथानक अब तक याद है। लोगों के नैतिक पतन से आहत लेखक इसमें एक अजीबोगरीब प्रलय की कल्पना करता है। अचानक धरती से लेकर आसमान तक बदरंग हो जाता है। आसमान काले-अंधेरे धुएं से भर जाता है, आबोहवा डरावनी हो जाती है और धरती पर शैतान के एक दूत का जन्म होता है। सारे मानवीय मूल्य बदल जाते हैं, शैतानियत, हैवानियत आदि का राज स्थापित हो जाता है। 'काली किताब' एक काल्पनिक कथा थी और लोगों में इंसानियत की मरती चेतना को जिंदा करने का साहित्यिक प्रयास था, इसलिए मन को भा गई। लेकिन इधर हाल के कुछ दिनों से कांग्रेसी नमक पर जिंदगी गुजारने वाले खुशवंत सिंह सरीखे कुछ बूढ़े लेखक/पत्रकार भी धड़ल्ले से काली किताब लिखे जा रहे हैं। कांग्रेस के दोबारा सत्ता में न लौट पाने की संभावना की चिंता जितनी इस पार्टी के बड़े नेताओं को नहीं होगी, उससे कहीं ज्यादा छटपटाहट इन बूढ़ी मछलियों को है। उन्हें लगता है कि अगर इस चुनाव में मोदी फिर से जीत गए तो प्रलय आ जायेगा। उनकी छटपटाहट सूखते तालाब की मछलियों सरीखी है और विचित्र है। ये नामी बुद्धिजीवी यह नहीं बताते कि आखिर पिछले पांच साल में देश में ऐसी कौन सी कयामत आ गई कि अगले पांच साल में प्रलय आ जाएगा। जमकर मोदी विरोध हुआ, कोर्ट को जब जहां जो उचित लगा सरकार को ठेंगा पर रखकर वह अपना काम करते रहा। एक भी बड़ी राजनीतिक हत्या नहीं हुई (जिससे कांग्रेस का इतिहास सना है) । मीडिया अपने-अपने ओरिएंटेशन और व्यापार हित के साथ काम करता रहा (मीडिया पर कांग्रेसी सेंशरशिप इस देश ने कई बार देखा है) । सरकार समर्थित नरसंहार या दंगा-फसाद की कोई बड़ी घटना देखने को नहीं मिली (कांग्रेसी शासन में इसके दर्जनों उदाहरण हैं)। यहां तक कि आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में संविधान की संघीय व्यवस्था के साथ बलात्कार हुआ मगर वहां की राज्य सरकारें आराम से सत्ता में बनी रहीं (राज्य की सरकारों को बर्खास्त करने का कांग्रेसी रिकॉर्ड से हर कोई अवगत है)। तो फिर ये इतना भयाक्रांत माहौल क्यों बना रहे? शायद ये बुढ़ापे में सरकारी सोमरस न मिलने की संभावना से बुरी तरह व्यथित हो गए हैं। या यह भी संभव है कि उन्हें अपनी जवानी की सारी लीलाओं के सार्वजनिक हो जाने का भय बुरी तरह परेशान कर रहा है। तो हे कलमी धृतराष्ट्रो, मैं आपको बस यही सलाह दूंगा कि आप संन्यास ले लें। बाकी सब नियति पर छोड़ दें। जब कृष्ण् की रासलीला छिपी नहीं रही, तो आपकी भी हमेशा छिपी नहीं रहेगी। अगर आप कांग्रेसी नमक का सरीयत देना चाहते हैं, तो कोई अपराध बोध नहीं पालिए। वह आप पहले ही अदा कर चुके हैं।

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