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अथ धन्वन्तरि कथा...

Bhola Tiwari Jul 08, 2020, 1:31 PM IST कॉलमलिस्ट
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प्रशान्त करण

 पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की कथा सर्वविदित है।शरद के शुक्ल पक्ष से यह प्रारम्भ होकर पूर्णिमा के दिन सम्पन्न हुआ था।चौदह दिनों तक समुद्र मंथन में प्राप्त हुए वस्तुओं आदि का जिक्र इस प्रचलित श्लोक में किया गया है-

लक्ष्मी: कौस्तुभपरिजातकसुराधन्वन्तरि श्चंद्रमा:।

गाव:कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगना:।

अश्व: सप्तमुखो विषम हरिधनु: शंखोंमृतं चामबुधे:।

रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनम कुर्या त्सदा मंगलम।

  इसे इस भांति आसानी से समझा जा सकता है- श्री ,रंभा,विष,वारुणी,अमिय,शंख, गजराज ।

कल्पद्रुम, शशि, धेनु,धनु,धन्वन्तरि,मणि,वाजि।।

(श्री-लक्ष्मी ,रंभा- एक अप्सरा , विष,वारुणी- सुरा/मदिरा, अमिय-अमृत,शंख- पाँचजन्य , गजराज- ऐरावत , कल्पवृक्ष, शशि- चंद्रमा,धेनु-कामधेनु,धनु- शारंग ,धन्वन्तरि,मणि- कौस्तुभ और वाजि - उच्चै:श्रवा घोड़ा इसी क्रम में इन सब का प्रादुर्भाव हुआ)।

   इससे स्पष्ट है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार धन्वन्तरि का पृथ्वी लोक में प्रादुर्भाव शरद शुक्लपक्ष की त्रयोदसी तिथि को समुद्र मंथन से हुआ।अर्थात दीपावली के दो दिनों पूर्व।कहा जाता है कि ये विष्णु के अवतार हैं।इनकी चार भुजाएं हैं।ऊपर की दो भुजाओं में शंख और चक्र तथा नीचे की दो भुजाओं में एक मे जलूका और औषध तथा दूसरे में अमृत कलश धारण करते हैं।ईन्हें आयुर्वेद की चिकित्सा करने वाले वैध आरोग्य के देवता कहा जाता है।इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की।ये कमल पर विराजमान रहते हैं, यही इनकी सवारी है।यहाँ एक बात बहुत उल्लेखनीय है।इनकी नीचे वाली दो भुजाओं में से एक में जलूका और औषधि का वर्णन मिलता है।जलूका का अर्थ जलौका या जोंक है।यह आज भी सर्वविदित है कि जोंक रक्त सम्बन्धी विकार, धमनियों में रक्त जमने, गंजापन, गठिया,मधुमेह, रक्तचाप,मसूड़ों और यकृत के रोगों की चिकित्सा में बड़ा उपयोगी तो है ही साथ मे आंखों की ग्लूकोमा बीमारी में भी कारगर माना जाता है।इसके लार में रक्त को जमने से रोकने की अद्भुत शक्ति होती है। इसके लार से हृदयाघात की दवा हिपेरिन आदि बनती है।

  साहित्य में मुख्यतः तीन धनवन्तरियों का उल्लेख मिलता है- दैविक,वैदिक और ऐतिहासिक।दैविक धन्वन्तरि के बारे में समुद्र मंथन से उत्पन्न होने की बात कही जाती है और कहा जाता है कि वे देवताओं के वैद्य हैं।वे देवताओं की चिकित्सा करते थे।आयुर्वेद में प्रथम धन्वन्तरि आदि वैद्य माने गए हैं।इतिहासों में कई धनवन्तरियों का कालांतर में जिक्र मिलता है।प्रथम वाराणसी के क्षत्रिय राजा दिवोदास और द्वितीय वैद्य परिवार के धन्वन्तरि।दोनों ने ही प्रजा को अपनी वैधक चिकित्सा से लाभान्वित किया।शल्य तंत्र के प्रवर्तक को धन्वन्तरि कहा जाता है।इसी कारण शल्य चिकित्सकों का सम्प्रदाय धन्वन्तरि कहलाता था।सम्भवतः शल्य चिकित्सा में निष्णात वैद्य धन्वन्तरि की उपाधि धारण करते थे।कहा जाता है कि धन्वन्तरि के वंशज दिवोदास कहलाए।शल्य चिकित्सा का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया गया जिसके पहले प्रधानाचार्य सुश्रुत दिवदास बनाए गए।यह भी कहा जाता है कि सुश्रुत दिवोदास के शिष्य और ऋषि विश्वामित्र के पुत्र ने सुश्रुत संहिता लिखी।कहीं कहीं सुश्रुत को ही विश्वामित्र का पुत्र बताया गया है।इतिहास के पन्नों में उज्जैन के राजदरबार के नौ रत्नों में धन्वन्तरि का उल्लेख मिलता है।राजा विक्रमादित्य की सेना का शकों के विरुद्ध सफल अभियान में सेना के मुख्य चिकित्सक में धन्वन्तरि का उल्लेख मिलता है। धन्वन्तरि की लिखी पुस्तकों में रोग-निदान,वैद्य चिंतामणि,विद्या प्रकाश चिकित्सा, धन्वन्तरि निघण्टु, वैधक भास्करोदय तथा चिकित्सा सार संग्रह आदि प्रमुख हैं।यह सब किस धन्वन्तरि ने लिखा यह स्पष्ट नहीं होता है।

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी धन्वन्तरि का उल्लेख मिलता है,जिसका उल्लेख यशपाल तथा मन्मथनाथ गुप्त की रचनाओं में मिलता है।यह धन्वन्तरि आंदोलनकारी थे और भगत सिंह,चन्द्रशेखर आज़ाद आदि के सहयोगी थे।

     हमारे भारतीय समाज में चिकित्सकों को साक्षात धन्वन्तरि का सम्मान मिलता रहा और डॉक्टर देवतुल्य माने जाते रहे।हाल-फिलहाल से इनके प्रति लोगों के सौजन्य प्रकट करने का थोड़ा तरीका बदल गया है।मरीज ठीक हो गया तो दवा-दारू के वास्तविक खर्च को भी ज्यादा बताकर लुटेरे की संज्ञा से विभूषित कर डालते हैं।कभी मरीज चिकित्सा के दौरान बचाया न जा सका तो उन्हें ही दोषी बताकर फौजदारी मुकदमे से , उनकी क्लीनिकों में भयंकर तोड़-फोड़,मार-पीट कर उनके प्रति सौजन्य भी जताने में कई पीछे नहीं रहते।ऐसे भी कई धन्वन्तरि हैं, जो किसी तरह चिकित्सक बन गए तो इसे सेवा न मानकर विशुद्ध व्यापार मानने लगे।ऐसे धनवन्तरियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि भी हो रही है।ऐसे धनवन्तरियों के मरीज आपस में कभी मिलते हैं और एक दूसरे का हाल-समाचार पूछते हैं तो अन्त में बीमारी की चर्चा न कर यह पूछ बैठते हैं कि कितने में ठीक हुए।परन्तु अधिकतर धन्वन्तरि अभी भी सेवा भाव रत हैं।वे प्रणम्य हैं।अभी वैश्विक महामारी कोरोना की चिकित्सा में लगे हमारे देश के सैंकड़ों धन्वन्तरि काल के गाल में कवलित हो गए।उनके प्रति सम्मानजनक विनम्र श्रद्धांजलि।परन्तु धनवन्तरियों ने हिम्मत नहीं हारी और अभी भी सेवा भाव से घर-परिवार से अलग रहकर अपने प्राणों की परवाह किए बिना सेवा में लगे हैं।उनके प्रति हृदय से आदर के भाव प्रकट करता हूँ।

        इतनी लम्बी-चौड़ी भूमिका के बाद हम अपने सामयिक सजीव पात्र धन्वन्तरि जी पर लौटते हैं।यह ब्राह्मण कुलोद्भव एक अत्यंत मेघावी, दयावान, मनुष्यत्व से परिपूर्ण,ज्योतिषीय गणना में दक्ष और धर्मपरायण मित्र हैं जो पेशे से प्राख्यात और प्रतिभावान चिकित्सक हैं।इनके कुल के प्रथम दीपक के रुप पर जन्म के समय ही इनके पितामह महामहोपाध्याय पण्डित श्री चतुरानन तिवारी जी ने ज्योतिषीय गणना कर यह घोषित कर दिया था कि ये चिकित्सक होंगे और तदनुसार इनका नाम धन्वन्तरि रख दिया गया।ये सम्प्रति सरकारी चिकित्सा सेवा से सेवानिवृत्ति लेकर स्वतंत्र रूप से सेवा करते हैं।क्लिनिक खूब चलता है।गरीब मरीजों से फीस भी नहीं लेते और कइयों को मुफ्त दवा भी दे देते हैं।इससे भीड़ बढ़ती जा रही है।इससे युवा चिकिसकों की परेशानी बढ़ गयी।लौकड़ाऊन में जब इन्होंने क्लिनिक बन्द कर दिया तो अमुक जी चमक गए।अब जब धन्वन्तरि जी ने क्लिनिक खोली तो एक मरीज ऐसा भीआया,जिसे देखने से ही वह कोरोना संक्रमित लगा।उसका टेस्ट करवाने पर वह पॉजिटिव आ गया।अब आनन-फानन में धन्वन्तरि जी ने सारे स्टाफ और परिवार का भी टेस्ट करवा दिया।सबके टेस्ट के निगेटिव होने के बाद भी सब को क्वारंटाइन होना पड़ा और क्लिनिक सील हो गया।खूब प्रचार किया गया कि धन्वन्तरि जी कोरोना संक्रमित हैं।कई घाघ नए,पुराने अन्य धन्वन्तरि पीछे लगे थे कि मरीज उनके पास आए।हल्ला मचवा दिया गया।अब हमारे धन्वन्तरि जी का चालक, स्टाफ,महरी सब भाग गए।धन्वन्तरि जी अपनी निश्छलता , सरलता के कारण कुछ समझ ही नहीं पाए।उनकी कल्पना के परे घाघ व्यवसायिक,घनघोर व्यापारिक पेशेवर प्रतिस्पर्धियों की पौ बारह हो गयी।वे सभी व्यापार में लगे हैं।अपने धन्वन्तरि जी अब भी यह बात समझ नहीं पा रहे।हमने मौका देखकर उन्हें समझाने की कोशिश भी की कि अब व्यवसाय चलाएं,सिर्फ सेवा नहीं।चाहें तो दोनों के बीच अधिकतर चिकिसकों की तरह सामंजस्य बना कर चलें।जब जैसा मौका मिले वैसा कर लें।पर हमारे धन्वन्तरि जी सेवा करने पर एकदम से उतारू हैं।पर अब लगता है कि धन्वन्तरि जी चिंतन में लगे हैं कि सेवा की जाए या व्यापार?

    पाठकगण से सुझाव मांगता हूँ कि वे हमारे धन्वन्तरि जी के लिए उपाय बतावें।अभी उनकी क्वारंटाइन की अवधि समाप्त हो गयी है।बैठे हैं।आप मदद करेंगे?

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