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Bhola Tiwari May 07, 2019, 5:00 PM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

बात 2004 की होगी । मैं ITBP मिर्थी कैंप में अर्जित अतिरिक्त भूमि के सीमांकन के वास्ते SDM डीडीहाट के कार्यालय गया था । उस समय SDM से कोई अनपढ़ टाइप का आदमी बात कर रहा था । वह SDM को तू कह कर सम्बोधित कर रहा था । उसके जाने के बाद पता चला कि वह बनरावत जनजाति का है ।

कहा जाता है कि ये लोग राजा खानदान से सम्बंधित थे । किसी आपदा या किसी अन्य कारण वश ये लोग घने जंगलों में चले गए । और तब से इनकी संस्कृति और सभ्यता अलग हो गई । ये लोग लकड़ी के बरतन बनाने लगे । जब तक कपड़ा था तब तक पहना ,उसके बाद जन्मजात रूप में रहने लगे ।

ये रात के अँधेरे में लकड़ी के बरतन किसी के दरवाजे पर रख उसकी कुण्डी खडका देते थे । खुद छुप जाते थे . गृह स्वामी दरवाजा खोलकर उस बरतन को अंदर रख लेता था और कुछ पारितोषिक रूप में अनाज या भोजन बाहर रख देता था , जो सुबह अपने स्थान पर नहीं होता था । आज यही जनजाति अब काफी सभ्य हो गई है । लोग कपड़े पहनने लगे हैं , लेकिन अपने को आज भी राजा मानते हैं । इसीलिए ये SDM को भी तू कह कर बात करते हैं ।

बनरावत जनजाति के लोग अपने को अस्कोट राजा के रक्त सम्बन्धी बताते हैं । जब ये लोग जंगलों में जा कर रहने लगे तब इनके पूर्वजों का पद अस्कोट राजाओं के बड़े भाई का था । ये आज भी उस बात को याद करते हैं और कहते हैं कि जब हमारी यह हालत है तो छोटे भाइयों की क्या दशा होगी ?

मिर्थी कैम्प से सामने के पहाड़ पर बनरावत लोग रहते हैं । जंगलों के बीच जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा और उस पर बने दस बीस घर काफी मनोरम लगते हैं । उस गाँव का एक बनरावत अक्सर हमारे कैम्प में लकड़ी चीरने आता था । एक दिन रात हो गई । हमने कहा आज की रात यहीं रुक जाओ , पर वह नहीं माना । उसे थ्री सेल का टॉर्च दिया गया । वह फायरिंग रेंज होता हुआ रात के 12 बजे तक अपने घर सकुशल पहुँच गया था । आये दिन इनका सामना भालू व बाघों से होता रहता है ।

कुछ बनरावत जौलजीबी क्षेत्र में भी पाए जाते हैं ।आज जरूरत है कि इस जनजाति का संरक्षण व सम्बर्धन किया जाय । इनकी जनसंख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है । कुमाऊं मण्डल की जनजातियों में सबसे कम जनसंख्या बनरावतों की है । जब मैं सन् 2005 में मिर्थी से ट्रांसफर हो के मसूरी आया तो उस समय डीडीहाट में बनरावतों का कोई MLA था । नाम मुझे याद नहीं ।

बनरावत समुदाय हमेशा जंगलों पर आश्रित रहा, जंगल कटे तो इनका ठौर भी गया। इनके पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा रहा। अभी ये उस बच्चे की तरह हैं, जो साफ पानी को गंदा किए जा रहा है । बकौल दुष्यंत कुमार -

एक बच्चा था हवा का झोंका ,

साफ़ पानी को खंगाल आया है .

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