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"यहां अकेले जी नहीं लगता...

Bhola Tiwari Jul 05, 2020, 6:57 AM IST मनोरंजन
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दिनेश श्रीनेत

नई दिल्ली  : प्रतीक्षा की रातें बहुत लंबी होती हैं... बहुत बार एक उम्र जितनी लंबी। उनमें जिंदगी की थकन भी जुड़ती जाती है। इस इंतजार के एक सिरे पर यादें होती हैं तो दूसरे सिरे पर उम्मीद। मगर यादों और उम्मीदों के बीच का फासला इतना लंबा होता जाता है कि संभाले नहीं संभलता। "आप की याद आती रही रात भर / चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर..." ऐसी ही तासीर की ग़ज़ल है। लालटेन की धुआं देती कांपती लौ की तरह... जहां तय करना मुश्किल है कि इसमें यादों चुभन ज्यादा है या बस एक अंतहीन इंतजार से छुटकारा पाने की अकुलाहट।  

रात भर दर्द की शम्अ जलती रही 

ग़म की लौ थरथराती रही रात भर 

मुजफ्फर अली की इस फिल्म में दो अलग-अलग संसार हैं। एक तरफ अवध की धुआं-धुआं शामें हैं तो दूसरी तरफ नमकीन हवाओं वाला मुंबई शहर। इनके बीच फासला बहुत ज्यादा है, तभी तो पिंजरे में बंद किसी परिंदे सा गुलाम हसन (फारुख शेख) सोचता है, "आधे से ज्यादा पैसा तो आए-जाए में लग जइहे... बचिहे का हाथ में फिर?" दूरियों को तो फिर भी मिटाया जा सकता है मगर इस अंतहीन प्रतीक्षा का क्या होगा? 

इस इंतज़ार में एक बेबसी है। मुजफ्फर अली का कैमरा इस इंतज़ार को रात के उदास बिंबों की भाषा के जरिए बयान करता है। रात को मुंबई की सड़कों पर भागती टैक्सी के शीशे पर स्ट्रीट लाइट फिसलती रहती है। इंतज़ार के दूसरे छोर पर कैमरा सीलन से चटकी दीवारों, बकरियों, जमीन पर बैठे बच्चों और बिजली के तारों के बीच भटकता है। 

खैरून (स्मिता पाटील) की लिखी चिट्ठी से आवाज़ आती है, "बहुत हो गया बंबई... नहीं चाहिए बंबई की कमाई। आप पैसों का इंतज़ाम करके फौरन चले आइए।"

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा 

याद बन बन के आती रही रात भर 

"यहां अकेले जी नहीं लगता... हम लोगों को बंबई क्यों नहीं बुला लेते? यहां कब तक अकेले रहेंगे हम? अब बहुत याद आती है..." खैरून का एक और ख़त बड़ी सीधी-सपाट भाषा में बेबसी बयान करता है। 

याद के चाँद दिल में उतरते रहे 

चाँदनी जगमगाती रही रात भर  

ये मख़दूम मुहिउद्दीन की ग़ज़ल है। एक बाग़ी शाइर। जिनके सिर पर निज़ाम ने पांच हजार का ईनाम रखा था। जिनके बारे में ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने कहा था, "मख़दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूंदे भी। वे क्रांतिकारी छापामार की बंदूक थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।" जब वे लिखते हैं 'याद के चाँद दिल में उतरते रहे...' तो मुंबई की स्याह रात में सड़कों पर जलती स्ट्रीट लाइट और प्रतीक्षा की थकन लिए स्मिता एक कंट्रास्ट रचते हैं। ठीक वैसा ही कंट्रास्ट जो 'चश्म-ए-नम के मुस्कुराने' में है। 

फिल्म में एक जोड़ा मुंबई के किसी बीच पर रेत में बैठा हंसते-खेलते लोगों को देख रहा है। पुरुष एक बच्चे को देखकर कहता है कि उसे बिल्कुल वैसा ही बच्चा चाहिए। स्त्री पलटकर पूछती है, "पन वो बच्चा रहेगा किधर?" इसके तुरंत बाद हम देखते हैं कि माथे पर चिंता की शिकन लिए एक शख़्स (फारुख़ शेख) चाय की दुकान पर बैठा नोट गिनकर उन्हें एहतियात से तह कर रहा है। ठीक इसी वक्त ये मुखड़ा हवा में तैरता है। 

आप की याद आती रही रात भर 

चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर 

'आलाप' और 'घरौंदा' जैसी फिल्मों का यादगार संगीत रचने वाले जयदेव की संगीतबद्ध की गई इस ग़ज़ल में 'रात भर' की टेक एक लंबी रात का फैलाव देती है। सपनों और हकीकत के बीच डोलती भीतरी और बाहरी दुनिया को छाया गांगुली ने अपनी आवाज़ दी है। उनकी आवाज़ जैसे एक दर्द भरी पुकार बन जाती है। दर्द भी ऐसा ठहरा हुआ कि मानों पूरा वजूद ही उस दर्द और इंतज़ार की परछाईँ बन गया हो। छाया ने बहुत कम फिल्मों के लिए गाया है, मगर 'ग़मन' और 'थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ' के गीत हमेशा इतिहास दर्ज रहेंगे। मख़दूम का लिखे शब्द, मुजफ्फर अली की दृश्य परिकल्पना, स्मिता की आँखें, फारुख शेख के चेहरे की मायूसी और छाया गांगुली की आवाज़ मिलकर स्क्रीन पर एक गहरी तड़प को रचते हैं। एक ठहरी हुई तकलीफ... धूसर-काले रंगों वाली किसी पेंटिंग की तरह। यह तड़प सुनने वाले के भीतर एक बैचैनी पैदा देती है। इसी अजीब सी बेचैनी के साथ मख़दूम की यह ग़ज़ल खत्म होती है। वे कहते हैं - 

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा 

कोई आवाज़ आती रही रात भर 

रात भर आने वाली इस आवाज़ ने बहुतों पर असर किया और उसमें मुजफ्फर अली के अलावा कई बड़े शाइर और संगीतकार थे। इन शाइर में से एक थे पुरुषोत्तम अब्बी आज़र, जिन्होंने एक ग़ज़ल 'आपकी याद आती रही' की बहर पर ही लिखी है। वो कुछ इस तरह से है - 

अक्स दीपक का दरिया में पड़ता रहा 

रौशनी झिलमिलाती रही रात भर 

चाँद उतरा हो आँगन में जैसे मेरे 

शब निगाहों को भाती रही रात भर 

मैने तुझको भुलाया तो दिल से मगर 

याद सीना जलाती रही रात भर

बात यहीं खत्म नहीं होती। मशहूर शायर फैज़ ने मख़दूम की याद में दो ग़ज़लें कहीं और दोनों ही कहीं न कहीं 'रात भर' से प्रभावित हैं। पहली ग़ज़ल का शे'र है - 

याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब 

दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब

दिलचस्प यह है कि सन् 1978 में आई 'गमन' फिल्म में मुजफ्फर अली ने इस ग़ज़ल का इस्तेमाल किया तो उसी साल मास्को में फैज़ ने मख़दूम की याद में एक और ग़ज़ल रची। इसमें भी 'रात भर' का ज़ादू है और वो सर चढ़कर बोलता है। जब आप इस ग़ज़ल को सुनते हैं तो मन में एक इच्छा उठती है कि अगर इसे भी छाया गांगुली ने फिल्म में गाया होता तो कितना अद्भुत प्रयोग होता। दुबई की रहने वाली एक भारतीय गायक निशिता चार्ल्स ने पिछले दिनों यह कमी पूरी करने की कोशिश की है और फैज़ की ग़ज़ल को उसी धुन पर गाया है जो 'गमन' फिल्म में थी। निशिता फ्यूज़न शैली में अर्ध-शास्त्रीय संगीत रचती और गाती हैं। इसे यूट्यूब पर भी सुना जा सकता है - 

आपकी याद आती रही रात-भर 

चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा 

इक तमन्ना सताती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन 

कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

वैसे उर्दू स्टूडियो पर दीपाली सहाय ने मख़दूम की ग़ज़ल को बिना किसी संगीत के एक बहुत ही नए और मार्मिक अंदाज़ में गाया है। इसे भी सुना जाना चाहिए।

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